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( 13 )

भोर में सरवन अइलन त सँवरी आ पमली के बइठले अउघांत देखि के पूछले, ‘‘तू लोग अइसे काहे सूतल बाड़ू जा ?

‘‘भइया, बारली राति में जागि जात बाड़ी । कवनो नीन के दवाई दे दीहऽ ।’’ पमली कहली ।

सरवन के बोली सुनि के बारली उठल चहली त ऊ उनुकर कपार प हाथ ध के कहले, ‘‘तू सूत हम जात बानीं ।’’ कहि के ऊ चलि गइले ।

सँवरी आ पमली के एगो छोट लइकी लेखा बारली के सम्हारे के पड़ी गइल रहे । राति में पमली बारली के हल्का पावर के नीन के गोली खिया के सूता देली । दवाई के असर जब तक रहल बारली सूतली । असर खतम होते ऊ जागि के लगली रोये। सँवरी उनुका के कसहूं चुप करवली । पमली उहे राति के सरवन लगे नीन के गोली मांगे गइली ।

सरवन आ जीतन जागल रहन ।

पमली सरवन से दवाई लेत पूछली, ‘‘भइया, तू लोग अभी जागले बाड़ऽ जा ?’’

‘‘जेकर बहिन के जवरे अइसे हो जाई त कवन भाई के नीन आई । घर के लोग नीन के गोली खा – खा के सूतल बा । बारली अभी ठीक बिया नू ?’’ सरवन के बदला जीतन पूछले ।

‘‘हँ ।’’ कहि के पमली चलि गइली आ बारली के दवाई खिआ के दोबारा सूतवली ।

‘‘ऊ कुतवा अपना मेहरारू जवरे सूतत रहे तबो बारली के ई हाल क देलस । जब ऊ हमरा सामने आई त हम ओकरा के घींच के मरती । एगो बलतकार से बारली के सभ बल खतम हो गइल ।’’ सँवरी बिलिख पड़ली ।

‘‘एगो ई रोवत बाड़ी । अब तू मत रोअ s ।’’ सँवरी के चुप करवली पमली ।

उहो रात दूनों जानी जागले रहल ।

बिहान भइला बारली के बांहि में जहवां सूई पड़ल रहे पमली ओकरा के नून आ गरम पानी से सेंकली । सँवरी, बारली के बार खोलि के झरली ।

ओहिजे अयनक राखल रहे । बारली अयनक में आपन मुंह देखली त आंखि भरि गइल,  ‘‘ऊ डोमवा हमार मुंह बिगाड़ि देलस । कतना खराब लागत बा ।’’

‘‘मत रो बारली, ई बहुते जलदी ठीक हो जाई ।’’ लोर पोंछते कहली लता ।

‘‘फुआ, ई त ठीक हो जाई बाकिर जवन चोट हमार आत्मा प लागल बा ऊ कइसे ठीक होई ?’’

‘‘समय सभ ठीक क दीही…।’’ केहूं कहल ।

ई आवाज के दिशाई में बारली घुर के देखली ।

चउखट प पांच गो लइकी खाड़ रही जा ।

लता ऊ लोग के देखि के कहली, ‘‘अरे तू लोग । आवऽ भीतरे । बारली, ई हमार सखी हई जा ।’’

ऊ लोग के देखि के बारली के रोआई छूटि गइल । सभ जानी उनुका के चुप करवली ।

एक जानी कहली, ‘‘बारली, तू जेतना रोअबू ओतने कमजोर हो जइबू । देह से ना बलुक मन से । अब ई लोर पोंछि के नेयाय आ इंसाफ मांगऽ ।’’

‘‘देखऽ, एहतरे रोये से काम ना चली । तू आपन आत्मा जगावऽ ।’’ दोसर लइकी बोलली ।

‘‘तोहरा जेतना रोये के रहे तू रोअलू । अब उठऽ आ कदम बढ़ावऽ ।’’ तीसरी बोलली ।

‘‘तू लोर के पी के आगि के गोला बनऽ आ जे तोहरा जवरे अइसे कइलसा ओकरा से बदला ल ।’’ चउथी बोलली ।

‘‘तू ई मत सोचऽ कि ई खाली तहरे जवरे भइल बा । आजु कतने लइकी जवरे ई घटना घटत बा बाकिर ऊ सभ लाज आ डर के मारे कुछ ना कहेलिसन चाहे मरि जालीसन बाकिर तू जी के नेयाय मांगऽ मत, बलुक छिनऽ ।’’ पांचवी लइकी कहि के बारली के लोर पोंछली ।

एतना हिम्मत के बाति सुनि के बारली कहली,  ‘‘अब ना रोवब हम ।’’

फेरू ऊ लोग लता के दोसरा जगहा ले जाके बिटेसवा के बारे में पूछली । लता बतवली कि ऊ कतहूं भागि गइल बा । सभ जानि चली गइली ।

सांझि खा पिताजी ड्यूटी से आवते बारली के काजू – किसमिस के पाकिट देत कहले,  ‘‘ले बारली, ई खइहे आ जल्दी से पुलिस बनि… ।’’

पिताजी के बाति प बारली उनुका के एक टक देखते रही गइली जइसे ऊ कहत होखस, ‘पिताजी, अब हम का पुलिस बनब ।’

बारली के नजर पिताजी के करेजा में तीर लेखा घोंपा गइल । ऊ घवाहिल करेजा लेके बहरी भगलन आ उनुकर खून के लोर गिरे लागल ।

बारली के गते – गते ठीक होखल चाहत रहे बाकिर ऊ आउरी दुख में डूबल जात रही । सरवन उनुका के आपन जान से बढ़ि के मानत रहन । उनुकर दुख देखि के उनका रोआई छूटे ।

दोसरा दिन भोर में सँवरी बारली से कहली, ‘‘बारली, चार दिन हो गइल । हम घरे जात बानी तनी ।’’

‘‘बारली, हमहूं जात बानीं । दासू आ सुगनी का जाने कइसे होइहें स ? साँझि खा आ चाहे काल्हु हम जरूर आ जाइब ।’’ पमली कहली ।

बारली दूनों जानी के घरे जाये दिहली ।

पिताजी, सरवन आ जीतन थाना में पूछताछ करे गइलन ।

दरोगा कुरसी प बइठि के आपन एक हाथ के डंटा से कान के खोट निकालत रहन ।

पिताजी उनका के परनाम करत पूछले, ‘‘सर, बिटेसवा के पता चलल ?’’

‘‘जब चली त हम बता देब ।’’ दरोगा ओइसही कहले ।

‘‘रउआ एहिजा खइनी मलत आ कान साफ करत रहत बानीं आखिर ऊ बिटेसवा के पता कब लागी ? रिपोर्ट लिखवइला पांच दिन हो गइल । बाकिर जब हमनी के पूछत बानीं जा त एके जवाब मिलत बा, अभी पता नइखे लागल । तब कब पता लागी ? रउआ आपन करतब भूला गइल बानीं त काहे के दरोगा बनल बानीं ?’’ सरवन खीस में कहले ।

‘‘सर, आपन कान में से डंटवा निकालि के हमनी के बाति त सुनि लीहीं ।’’ जीतन कहले त दरोगा खिसिया के कान में से डंटा निकालि के टेबुल प मरलन जोर से,  ‘‘हम आपन कान में डंटा घुसाईं चाहे बनूक तोर का जात बा ? हमार कर्त्तव्य के बात करत बा तोर भाई आ तू सभ के कर्त्तव्य ओह घरी कहवां गइल रहे जब आपन जवान बहिन के भेजि देलसन इजति लुटवावे । आ जब – तब हमरा लगे मुंह उठा के चलि आवेलसन बिटेसवा के पता लगावे । हम सभ पुलिस – दरोगा के जीयल मोहाल कर देले बाड़सन तू सभ । जो भाग इहां से । बिटेसवा जब पकड़ा जाई त हम खबर भेजि देब । अइसे ऊ पकड़ाइये जाई त का होई ? तोर बहिन के लूटल इजति आपस आ जाई ?’’

सरवन के देहि के खून खउल गइल । ऊ दरोगा के कालर पकड़ि लेले, ‘‘साला, मुंह बंद कर ना त अभिये तोरा के मारब हम…।’’

हाली से पिताजी आ जीतन, सरवन के हाथ से दरोगा के कालर छोड़वलन ।

कालर छुटते दरोगा माई – बहिन के लगा के गारी देत मरलन जोर से चमेटा सरवन के,  ‘‘मादर… तू पुलिस वाला प हाथ उठइबे । ठहर, अभी हम तोरा के जेहल में बंद करत बानी ।’’  हाथ जोरि देलन पिताजी, ‘‘माफ क दीहीं साहेब एकरा के । हम एकरा देने से माफी मांगत बानीं ।’’

‘‘ए बुढ़ऊ, समुझा द आपन छवड़ा के । पुलिस – दरोगा से मत जूझे । जा भागऽ इहां से ।’’ कालर सोझ करत बोललन दरोगा ।

तीनों जना थाना से लवट आइल । बीच राही से पिताजी ड्यूटी चलि गइले ।

सरवन आ जीतन आवत रहन त राही में दू – चारि गो बदमाश लइका भेंटा गइलन सन । दूनों जाना के देखि के हंसे लगलेस,  ‘‘कारे सरवनवा, थाना से आवत बाड़े ? मिलि गइल बिटेसवा ? कइसे तोर बहिन के इजति लूटलस ऊ…?’’

ई बाति कवनो भाई कइसे सुनित ? दूनों जना के बहिन परेम जागि गइल । खूब बढ़िया से ई लोग ओहनी के हजामत बना देलस ।

पिटइला का बाद ऊ सभ आउर बोले लगलेस, ‘‘बहिन घूमे गली – गली आ भाई बनत बा बजरंग बली । अरे, हमनी के तू दूनों का मारत बाड़ लोग । मारे के बा त बिटेसवा के जाके मार । जवन तोर बहिन के मटिया मेट कइलस । तू दूनों आपन मरदांनगी हमनी प का अजमावत बाड़ सन । मरद बाड़ स त जाके ओकर बहिन, मतारी आ मेहरारू के इजति लूट लसन ।’’

‘‘हमनी के आतना गिरल नइखी जा ।’’ कहलन जीतन ।

‘‘एह में गिरे के का बाति बा ? खून के बदला खून त इजति के बदला इजति ।’’

‘‘त हमनी आ ओकरा में फरके का रहि जाई ? रावन सीता जी के अपहरन कइले रहे त राम जी ओकर मेहरारू मन्दोदरी के अपहरन ना नू कइले रहन । हमनी के माई – पिताजी हमनी के आछा संस्कार देले बाड़े जा । लइकी आ अवरत के इजति करे के सीखवले बाड़े जा ।’’ सरवन बोललन ।

‘‘अरे, जो बड़ा आइल बाड़े लइकी के इजति करे वाला । ऊ नून – तेल बेचे वाला तोर बहिन के इजति तेल में मिला के पानी लेखा बहा देलस । हमरा से कहित हम ओकर आछा से इ…।’’

एतना बाति प सरवन दू झापड़ आउर देलन ओह लइका के ।

फेरु ऊ मुंह बवलस, ‘‘तू दूनों के आपन आ बहिन के पढ़ाई के ढेर घमंड आ गुमान रहे । सभ तूरि देलस बिटेसवा ।’’

सरवन मारे खातिर फेरू हाथ उठवलन त जीतन रोकि लेले, ‘‘भइया, छोड़ि द । ई छोटकन के मुंह मत लागऽ ।’’

‘‘एगो छोटके तोर इजति प डकइती डललस ।’’ माथा से खून पोंछत एगो बोलल ।

जीतन खीस में बोललन, ‘‘अगर तोर बहिन के इजति लूटा जाइत त तू का करतीस…?’’

‘‘खबरदार ! ई बाति बोलले त जीतन, का तू चाहत बाड़े कि जवन घटना हमनी के बहिन के जवरे घटल ऊ सभनी के बहिन के जवरे घटे ? आजु के बाद भुलाइयो के ई बाति मत कहिहें ।’’ सभनी के सामने खीस में एगो चटकन जीतन के मारि देलन सवरन ।

जीतन के आंखि भरि गइल । फेनु ऊ कसहूँ सरवन के ओहिजा से पकड़ि के लिअवलन । एक जगहा बइठि के सरवन रो पड़ले, ‘‘जीतन, हमरा के माफ क दीहे । हम तोरा के मार देनी हा ।’’

‘‘छोट भाई गलती करेला तबे बड़ भाई ओकरा सुधरे खातिर मारेला । रोअऽ मत भइया, हमनी के दूनों भाई मिलि के बारली के इंसाफ दिआवे के । अब घरे चलऽ ।’’ जीतन पोंछले उनुकर लोर ।

‘‘तू घरे जो हम बाद में आइब ।’’

‘‘ना । पिताजी कहनीं हा सीधे घरे जाये के । चलऽ उठऽ ।’’ जीतन सरवन के उठवलन ।

सरवन हाथ छोड़ा के डांटि के जीतन के घरे भेजि देलन । उनुका के जलदी से घरे आवे के कहि के चलि गइलन जीतन ।

सरवन रोअत रहन । ओही राही से पमली के भाई मूरती आपन बाबूजी के टिफिन में खाये ले जात रहन । सरवन के देखि के ऊ उनुका भिरी बइठते पूछले,  ‘‘सरवन, बारली ठीक बिया नू ?’’

बारली के नांव सुनते सरवन आउर बिलिख पड़लन, ‘‘मूरती, अब बारली एह हाल में कइसन हो सकत बिया । कतने ऊ रोवत रहत बिया । सँवरी आ पमली बाड़ी सन कि ओकरा के सम्हरले बाड़ी सन ना त ऊ अउरी टूटि जाइत ।’’

‘‘हमनी दूनों संघतिया के बहिन के जिनिगी खराब हो गइल । कहवां हम पमली के बिआह भइला का बाद मामा बनती आ आजु…।’’ मूरती के आंखि में लोर आ गइल ।

‘‘एह में पमली के त आधा गलती रहे बाकिर हमार बारली के त इचिको गलती ना रहे ।

बिटेसवा का जाने कहवां भागि गइल । अगर ऊ पकड़ाइये जाई त होई का हमार बहिन बरबादे नू भइल । हम खाली फिलिम में देखले – सुनले रहलीं बाकिर आजु आंखि के सोझा देखत बानीं ।’’ सिसिकत रहन सरवन ।

‘‘देखऽ, तू ढेर रोअ मत । घरे जा ।’’ मूरती उठवलन उनुका के ।

‘‘तू जा, हम बाद में जाइब ।’’ सरवन कहले त चलि गइलन मूरती ।

ऊ आपन कान्हा में से झोरा उतारि के ओंह में से डायरी निकललन । तारीख आ दिन समय लिख बारली के बरबाद भइल जिनिगी लिखे लगलन । आंखि से ढर – ढर लोर गिरत रहे आ ऊ फाटत करेजा से आपन दुख – दरद आ तकलीफ उतारत जात रहन । लिखते – लिखते अचके उनुकर हाथ थथम गइल । मन में आइल कि एह डायरी के फाड़ि दीहीं । जवना में उनुकर पेयारी बहिन के बरबाद जिनिगी के सच लिखाइल बा । बाकिर ओह डायरी के फड़ला से का मिली ? डायरी के त चिंदी – चिंदी उड़ि जाई बाकिर जवन घाव नासूर बनि के उनकर करेजा प भइल बा। उहे करेजा जहरीला तीर से एक – क गो बाति ताजा – ताजा खून से लिखाइल बा, का ऊ ओकरा के मेटा सकत बाड़े ? आपन करेजा फाड़ि के हर अक्षर के हर घटना के गंगा के पानी से धो के बहवा सकत बाड़े ? ना ।

खुशी आ हंसी में लेपटाइल आजु उहे अक्षर दरद आ लोर से भरल कागज प उतर त्राहि – त्राहि मचवले बा ।

सरवन दिल कड़ा क के फेनु लिखल शुरू कइले । हाथ कागज प चलत जात रहे बाकिर मन के भाव दिमाग प हावी हो जात रहे, का ई सभ लिखला से बारली के नेयाय मिली जाई ? ओकर हेतना बदनामी सुने से अच्छा बा कि हम आत्महत्या क लीहीं…।

ना, ना, आत्महत्या कइल पाप ह ! हमरा अइसन आदर्शवादी अगर आत्महत्या करे लागी त फिरू निराशा में डूबल बारली के हम का संदेश देब । अक्षर आ शब्द परब्रह्मा ह आ परब्रह्मा कबो ना चाहिहें कि उनुकर देबल मन के भाव के व्यक्त करे वाला ई अस्त्र से कोई के नोकसान होखे । हम एहमे अइसन – अइसन आशापूर्ण बात लिखब कि बारली के एहसे प्रेरणा मिले । ऊ उठ के चले के कोशिश करे ।

आशा आ निराशा के भंवरजाल में डूबत उतरात सरवन आपन मन के भाव शब्द में बान्धत कलम घसिटत रहन । लिखे के त बहुते बात रहे बाकिर फिरू बारली के लोर से भरल चेहरा उनुकर आंखि में उतिर गइल । ऊ कलम के खोपी में डाल डायरी झोला में रखि देलन ।

उनुकर मन एतना भारी हो गइल रहे कि जवन रोअल शुरू कइले लगातार घंटाभर रोअते रहि गइलन । ऊ पहिले से जानत रहन कि लिखे आ रोए से मन हलुक हो जाला बाकिर उनुकर मन प त हिमालय पहाड़ के जइसन बोझ दरद बनि के छटपटा – छटपटा के कहरत रहें ।

ऊ उहे बेचैन हालत में बिना सोचले – समुझले सड़कि पर चलि गइलन ।

सड़क प दूनों देने से तेज रफ्तार से गाड़ी के आवाजाही होत रहे । दुनिया भर के भीड़ समान खरीदे, देखे, खाये आ तरह – तरह के उतजोग में लागल रहे । चील…पो…पी…हो कतने आवाज चारों देने से शोर मचवले रहिस स । बाकिर उनुकर कान में बस बारली के रोआई सुनात रहे । उनुकर दिमाग कुछ छन खातिर सुन्न हो गइल । सड़क प खाड़ ऊ अपना आप के कवनो दोसर ग्रह के परानी समुझत रहन जेकरा से केकरो मतलब ना रहे । ऊ अपना आप के एकदम अकेला समुझत रहन जेकरा दुखी बहिन के सिवा एह दुनिया मे केहूं ना रहे । दुख के गहिरा सागर से ओह बहिन के निकाले के रहे ।

अचके उनुकर नजर सड़क ओह पार खाड़ एगो लइकी प पड़ल । जवन एह पार आवे के कोशिश करत रहे । ऊ एक डेग आगे बढ़ावे कि तले सर्र से कवनो गाड़ी आ जाए । ऊ लइकी डेग पीछे माहे घींच लेबे । सरवन के अइसन बुझाइल कि ऊ लइकी बारली हियऽ जवन सड़कि पार कइल चाहत बिया । ऊ आपन अगल – बगल के भीड़ के परवाह कइले बिना चिचिया के कहलन, ‘‘मत घबरो बहिन, हम तोरा के एह चउड़ा सड़कि से, एह दुखी संसार से पार करवाइब…।’’

कहते ऊ उहे बदहवासी में बिना आगा – पाछा तकले बीच सड़क प ओह पार दउड़ पड़लन । बाकिर तेज रफ्तार से आवत एगो ट्रक से उनुका जोर से अइसन धक्का लागल कि ऊ गेंदा लेखा उछिल के फेंका गइलन ।

जहां के तहां बस, गाड़ी रूकते हल्ला मचि गइल, ‘‘एगो लइका के चापा पड़ल …चापा पड़ल …।’’

सरवन के फाटल कपार से खून के नदी बह गइल रहे,  ‘हम तोरा के सड़कि पार करवाइब बहिन… एह दुखी संसार से तोर दुख मेटाइब बहिन…।’ कहते ऊ ठंडा पड़ि गइलन ।

देखते – देखते लोग के भीड़ जुटि गइल । ट्रक वाला भागत रहे कि ट्रैफिक पुलिस ओकरा पकड़ि लेलस ।

कुछ दूरी प गिरल उनुकर झोरा एगो आदमी उठा के सरवन लगे राखि देलस । डाक्टर उनुका के मृत घोषित क देलस । पुलिस झोरा चेक क के लोचन बाबू के अस्पताल बोलवलस ।

हांहे – फांहे पिताजी के जवरे जीतन भी गइले । चट्टे – पट्टे चारे – पांच घंटा के भीतर जिंदा सरवन के मरल सरवन देखि के ऊ लोग के आंखि प विश्वास ना भइल । खूब चिचिया – चिचिया के ऊ लोग रोये लागल ।

पोस्टमार्टम भइला का बाद पुलिस सरवन के लाश के ऊ लोग के हवाले क देलस ।

घर में सभ केहूं जानत रहे कि सरवन के दुर्घटना भइल बा । ऊ लोग रोहत रहे । बाकिर जब गाड़ी से उजर कपड़ा से तोपाइल सरवन के लाश दुआर प उतरल त पूरा हहकार मचि गइल । घर के सभ लोग अछो धार रोये लागल । सगरो पड़ल हचकाल ! भर टोला के मेहरारू – आदमी बारली के दुआर प दउड़ल । सरवन – सरवन ना होके खून से तर – बतर लास बनि गइल रहन आ घरे के सभ केहूं ओह माटी के देहि पकड़ि के चिचिया – चिचिया, लोट – लोट के रोअत रहे । ओहिजा खाड़ हर लोग के लोर गिरे लागल ।

भोला हांफते घरे अइलन, ‘‘सँवरी दिदिया… सँवरी दिदिया.., सरवन भइया मरि गइले…।’’

‘‘का सरवन भइया मरि गइले ? कइसे ?’’ सँवरी के करेजा प जोर से चोट लागल ।

‘‘उनुका सड़िक प चापा पड़ि गइल हा । अभी – अभी उनुकर लास दुआरी प आइल हा ।’’ भोला बतवलन त सँवरी रोवते बारली के घर देने दउड़ली । पाछा रहन उनुकर माई – बाबू ।

एने मूरती पमली से कहे अइले । ऊ ना रही । त ऊ सुगनी से कहले, ‘‘सुगनी, पमली से जाके कहि दे कि ओकरा सखी के बड़का भइया सरवन के ट्रक से धाका लागि गइल हा आ ऊ मरि गइलन ।’’

सुगनी एतना बाति कहे में भुला जात रही । ऊ कहली, ‘‘भइया, तू ही कह द । हम भुला जात बानीं ।’’

‘‘हम ओकरा से ना बोलींला ।’’

‘‘बाकिर तू दीदिया के बनावल रोटी खालऽ नू ।’’ सुगनी के बात के जवाब मूरती लगे ना रहे ।

फेनु ऊ सरवन के बाति कहले तबहीं पमली ओहिजा आ गइली । पूछली । मूरती कवनो जवाब ना देलन ।

पमली फेनु पूछली, ‘‘भइया, भले तू हमरा से मत बोलऽ बाकिर सरवन भइया के का भइल बा ?’’

मूरती सभ बाति कहलन । पमली के जोर से झटका लागल । ऊ रोवते बारली के घरे दउड़ली । मूरती पाछे गइले रोवते ।

 

छाती पीटि – पीटि के रोअते माई आ नानी के बारली के ऊपरे खीस चहरि गइल । दूनों जानी आंखि से गंगा – जमुना बहावते बारली के लगली मारे ।

‘‘एकरे चलते आजु हमार नाती मरि गइल । ना इ आपन इजति लूटवाइत आ ना हमार बबुआ मरित । ओकरा बदले इहे मरी जाइत ।’’

‘‘ई कुलनसनी के चलते आजु हमार कोखि उजड़ि गइल । ई कुल बउरी के चलते आजु हमार छब्बीस साल के जवान बेटा मरि गइल । इहे हमार बेटा खा गइल । हाय रे सरवन बेटा, अब हम तोरा बिना कइसे जीयब ? तू हमरा के छोड़ि के काहे चलि गइले ? जइसे ई तोर जान अखरेरे लेलसिया ओइसही तूंहू ई बदमसिनिया के जीऊ अखरेरे लेके अपना लगे बोलाले ।’’

लता बोलली रोवते, ‘‘भउजी, एगो त सरवन मरि गइल आ अब तू बारली के मरे के कहत बाड़ू । का तू एके हाली दू गो मउत बरदास करबू ?’’

सँवरी – पमली अइली । सरवन के देखि के लगली रोये ।

तबहीं नानी बारली के आउर एगो चमेटा मरली, ‘‘हमार अगदिअउआ बबुआ इहे नटिनिया के चलते मरि गइल रे दादा…।’’

‘‘नानी, तू अइसे बारली के दोस मत द ऽ ।’’ सँवरी कहली ।

‘‘हँ… हँ…, इहे हमार नाती के मुअवलसिया। इहे इजत लू…।’’ नानी कहते रहि कि लता उनुका के ओहिजा से हटवली ।

बारली भइया – भइया कहि के रोये लगली खूब, ‘‘भइया, तू काहे मरि गइल ? मरे के त हमरा चाहत रहे । तू काहें हमरा के छोड़ि गइल ? देख ऽ, सभ केहूं हमरे के दोस देत बा । तू उठऽ उठऽ…।’’

सँवरी आ पमली उनुका के चुप करावस बाकिर ऊ आउर रोवस ।

बारली के भीरिये ऊ झोरा उल्टा गिरल रहे । भइया के झोरा पहिचान ऊ हहुआ के ओकरा के उठवली । सोचली खोल के देखी तले उनुकर कपार घूमे लागल आ आंखि तोपाए लागल ।

दूनों जानी उनुका के पकड़ि के घर में लियवली जा । पानी पीया के पंखा हंकली । कुछ देर बाद ठीक होते बारली फेरू रोये लगली ।

पमली ऊ झोरा उठा के भीतरे लिआइल रही । बारली सरवन के मउत के सुराग खोजे खातिर झपटि के झोरा खोलि के एक – क गो कापी – किताब निकालि के देखे लगली ।

तबहीं उनुकर हाथ में उनुकर देवल मोटका डायरी आ गइल । उनुका इयाद पड़ल भइया जरूर एह में कुछु लिखले होइहें । ऊ धड़कत करेजा से एक – क  गो पन्ना हाली – हाली पलटे लगली । अचके ओह दिन के तारीख 9 – 7 – 1999, दिन शुक्रवार, समय 11 बज के 10 मिनट प उनुकर नजर ठहरि गइल ।

कुछ बात हाली – हाली पढ़ि के बिलिख पड़ली ऊ, ‘भइया, हमार दुख से तू एतना दुखी हो गइल रहऽ कि आत्महत्या करे के भी सोचले रहऽ । हमार बदनामी से तू एतना परेशान रह । कहीं तू हमरे चलते त गाड़ी के सोझा ना आ गइल हा…।’

पहिले त माई आ नानिये बारली के दोस देत रही बाकिर अब त भर टोला – मुहल्ला के अदमी उनके के दोस देबे लागल कि बारली के चलते जवान भाई आत्महत्या करि लेलस । इहे आपन भाई के मुअवलसिया ।

ई सुनि के बारली कहली, ‘‘सुनत बाडू जा दूनों लोग । ई सभ अदमी का कहत बाड़े स ।’’

‘‘बोले वाला बोल बे करी । केकर – केकर मुंह छेकल जाई ?’’ पमली कहली ।

‘‘अब ई सभनी के मुंह बंद करे के पड़ी ।’’ बोलली बारली ।

‘‘केहूं के मुंह ना बंद होई ।’’ असहीं लोग के चिचिआये द । तू ई सभनी के चिल्हट मत सुनऽ ।’’ समुझवली सँवरी ।

बारली ऊ डायरी के शांति से दू – चार बेरि पढ़ली । आत्महत्या के पाप बतावत सरवन अपना आप से आ भगवान से माफी मंगले रहन । ई पढ़ि के उनुकर मन शांत भइल । ना त कबे से ऊ अपना आप के कटघरा में खाड़ कइले रही ।

सरवन उनुका के संबोधित करत लिखले रहन कि हमार बहिन, कबो अइसन समय आई जब हम तोरा भीरी ना रहब बाकिर हमार लिखल ई एक – क गो बात तोरा के ई समाज से लड़े खातिर प्रेरना दीही । तू अब आपन नेयाय लेबे खातिर ई मरदन के समाज से लड़िहे । तू अब आपन लोर पोंछि दे आ जवन बिटेसवा तोर जिनिगी तबाह कइले बा ओकरा से बदला ले । तोरा लेखा आजु कतने लइकी बाड़ी स बाकिर ऊ सभ गनुहगार के सजा दिअवले बिना, खुदे मर जात बाड़ी स बाकिर तू जी के आपन आ सभ लइकी के अधिकार आ नेयाय देस, समाज, सरकार आ कानून से मंगिहे मत बलुक छिनिहें । अपना जवरे संवरी आ पमली के भी लड़ाई तोरे लड़े के पड़ी । काहे से कि तू ऊ दूनों खातिर एगो डेग बढ़इबे तब ऊ दूनों अपना खातिर दू गो डेग बढ़इहेंस । हम तोर करेजा प चोट करत तोर आत्मा जगावल चाहत बानी । तू अब लोर पोंछ आ ई मरदन के समाज से लड़े खातिर कमर कस । हम सोरहो घरी तोरा जवरे रहब ।

हेतना बाति पढ़ते – पढ़ते बारली के बुझाइल कि उनुका भितरे कवनो अनजान शक्ति पैदा हो गइल । ऊ कई – कई बार चार – पांच गो बाति खूबे पढ़ली आपन लोर पोंछ । बिटेसवा से बदला ले । मरदन के समाज से लड़ ।  सभ लइकिन के अधिकार मंगिहे मत बलुक छिनिहें आ हम तोर आत्मा जगावल चाहत बानीं  ।

जब – जब ऊ ई बात पढ़ली बुझात रहे उनुका भीतरे एगो आग पैदा होता । ओइसन आग जेहमे एह संसार के सभ अनाचार आ व्याभिचार जरि के राख होत रहे ।

ऊ आपन लोर पोंछि के आत्मविश्वास से कहली, ‘अब हम मरदन के समाज से लड़ब । अब अपना खातिर कबो ना रोअब । भइया मरि के हमरा के एगो नया राह देखा के हमार दिल – दिमाग जगा देलन । उनुकर ई सभ बाति हम हरमेशा इयाद राखब आ उनुकर बतावल राहि प चलब ।’ फेरू ऊ डायरी के आपन बक्सा में आछा से राखि देली आ जाये लगली बहरी ।

सँवरी उनुकर हाथ पकड़ि लेली, ‘‘कहवां जात बाड़ू…?’’

‘‘सभनी के कपार प से बलातकार के भूत उतारे ।’’ डट के कहली बारली  ।

‘‘केकरा – केकरा के जवाब देबू ? तू ऊ लोग के बीच मत जा अभी बेमार बाड़ू । बोखार से देह जरत बा तोहार ।’’ पमली बारली के दोसर हाथ पकड़ि लेली ।

‘‘सभ दुनिया के जवाब देब । अभी त हम आपन देहि से बेमार बानीं बाकिर एहिजा सभ लोग आपन दिल आ दिमाग से बेमार बाड़े स । तू लोग हमार हाथ छोड़ द ।’’ बारली कस के बोलली त सँवरी – पमली डरे उनुकर हाथ छोड़ि दिहली जा ।

बारली बहरी जाये लगली उहो दूनों जानी उनकर पाछा रही कहीं ऊ खीस – पीत में कुछु करस मत ।

दुआरी प एगो लइका चिचिया – चिचिया के कहत रहे, ‘‘बारलिये के चलते सरवन मरि गइल । इहे गइल रहे आपन इजति लुटवावे । बिटेसवा बारली के इजति नइखे लूटले बलुक बारलिये बिटेसवा से इजति लुटले बिया…।’’

ई सुनि लेली बात बारली । अब उनुकर सवसे देहि में चहरि गइल खीस के भूत । एगो त उनुका बोखार लागल रहे । ऊ बोखार उनुकर माथा प चहरि गइल । उनुकर भेजा आउट हो गइल । सवसे देहि में लागि गइल आग । लोर में तितकी गइल भर । कपार में खीस, माथा प बान्हल मउत के कफन, पूरा देहि में एगो अन्जान शक्ति, ओंठ प शेर के दहाड़ आउर भइया के बाति, ‘मरदन के समाज से लड़ ।’

जवन लइका बारली के बारे में चिचिआत रहे । बारली आपन दहिना हाथ से पकड़ली ओकर नरेटी आ पाछा माहे ओकरा के धंसोरते ले जाये लगली । बुझात रहे कि उनुका प काली जी आइल बाड़ी । जवन ऊ गोदाम में देवी – दुरगा के बोलावत रही आजु बिना बोलवले सभ देवी – दुरगा उनुका प आइल रही ।

बारली ऊ लइका के धंसोरते बहरी ले जाते कहते गइली, ‘‘बोल, तू हमार इजति लूटबे ? करबे बलतकार ? खोली कपड़ा कि सीखा दी । बिटेसवा हमार इजति लूटलस कि हम ओकर, कि हमनी के एक दोसरा के लुटनी जा एह में तोर बाप के का जात बाड़े साला ? बोल जवाब दे…?’’

एहि तरे कहते ऊ एकदम बीच सड़क प आ गइली । एतना जोर से ऊ लइका के नरेटी पकड़ले रही कि ओकर परान पीपर के पाता प लटकल पानी के बूंद जइसन अब निकले कि तब भइल रहे । लइका आपन दूनों हाथ से बारली के हाथ जोर – जोर से छोड़ावत रहे बाकिर ऊ ना छोड़त रही ।

ई देखि के सभ आदमी ‘छोड़… छोड़…’ कहते बारली का पाछा आ गइल । बारली ऊ लइका के टेटुआ दबावे के फेर में रही । एक – दू गो मेहरारू उनुका के पाछा से मरबो कइलिस बाकिर उनुका प कवनो असर ना भइल ।

जब बारली सभ मरद – मेहरारू के बीच में आ गइली त ऊ लइका के नरेटी  छोड़ि के भूइंया प ढ़केल देली । भूइंया प गिरते लइका के जीऊ में जीऊ पडल़ । ना त उहो अपना मरे के सोच लेले रहे । काहे से कि बारली ओकरा मउत के रूप लागत रही । भूइंया से उठि के ऊ आपन गरदन सोझ कइलसि ।

एगो मेहरारू कहलस, ‘‘हई देखऽजा, एगो त ई जाके आपन इजति लूटवलसि अब हुमर के हमनी सभ के मारे आइल बिया ।’’

‘‘एकर बदमासी के चलते एकर भाई आपन जान दे देलस ।’’ एगो आदमी कहल त सभ केहूं हं में हं मिलावे लागल, ‘‘हं, हं, इहे आपन भाई के हत्यारिन हिय ।’’

लोग के ई बोली बारली के करेजा प गोली लेखा लागे लागल । ऊ जोर से गरजली, ‘‘चुप रहऽ तू लोग…।’’

शेर अइसन गरजल सुनि के सभ केहूं चुप – चाप खाड़ हो गइल । जे – जे सरवन के मउवत प रोये आइल रहे ऊ सभ बारली लगे चलि आइल ।

लइका, मरद आ मेहरारू के भीड़ के बीच में खाड़ बारली खीस में बोलल शुरू कइली,  ‘‘तू लोग कहत बाड़ऽ जा कि हम आपन इजति लुटवावे बदमसवा बिटेसवा के पास गइल रही । का कवनो लइकी, मेहरारू आ खराब से खराब कोठा प के नाचे वाली नचवनिया आपन इजति लुटवावे कवनो लइका, मरद आ हिंजड़ा के पास जा लीसन ? बलुक ऊ सभ आपन मरजी से लुटेलसन । तूही सभ के सभ लइका आ मरद राह चलत लइकी के देखि के सीटी बजावले सन, गाना गावले सन, उरेब बोलेलसन आ धाका मारेलसन । का कवनो लइकी लइका के देखि के ई काम करे लीसन ? जवाब द लोग ।

मंदिर में जाके दुर्गा आ काली के पूजा करि के आरती गावे ल आ राह चलत लइकी के बदनांव आउर बलातकार करेलऽ । तूही सभ लइका आ मरद । लइकी आ मेहरारू के अपमान करेलसन । शुरूये से नारी के अबला समुझले बाड़ बाकिर इहे नारी अब सभ नर खातिर एगो बला बनीं, शेर, आंधी आ तूफान बनी । नारी अब नारायनी आ अबला अब जगदम्बा बनीं तब तू सभ मरद लोग के मानसिकता के घमंड के चूर – चूर करी ।

आन्हर धृतराष्ट्र के सभा में द्रौपदी के चीरहरण माने दुस्सासन उनुकर खाली साड़ी खोलले रहे त महाभारत के लड़ाई भइल एहिजा त हमार पूरा इजति लूटा गइल ओह हिसाब से का होखे के चाहीं ? तोहार ई गांव – मोहल्ला के लइकी के इजति लुटा गइल ओकरा प बलातकार के मोहर लागि गइल बाकिर तू लोग हमार लोर पोंछे के बजाये हमरे के दोस देत बाड़ऽ जा । ई कहवां के नेयाय ह ? हमार पूरा भविष्य चउपट हो गइल । हमार सभ सपना टूटि के छितरा गइल । एगो बलातकार के चलते । ई उहे नू गांव – मोहल्ला ह जब हम आई0 एस0 सी0 में राज्य भर में सबसे जादे नंबर लिआइल रहलीं त तू लोग कहत रह कि बारली हमनी के सान हिय, रौनक हिय, भविष्य हिय आ आजु बारली एगो बदनांव लइकी हो गइल ।

नवरात में तूहीं लोग दुर्गा सप्तसती के पाठ करेलऽ । नव गो छोट – छोट लइकी के पूजा करि के गोड़ पूजि के ऊ लोग के पूड़ी – खीर खिया के दान – दक्षिणा देबऽ । इहां तक कि नवो कन्या के जूठ खइबऽ । ओकर गोड़ प आपन माथा राखि के आसिरबाद लेबऽ कि हमरा चारों पुरुषार्थ मिले – धर्म, अर्थ, काम अउरी मोक्ष ।

जवन धर्म में पैदा होलऽ ओकरा के त माने लऽ । अर्थ में चोरी, ठगी, डकइती, बेइमानी – ईमानदारी आ अपहरण करि के खूब रुपया कमा लेल । मोक्ष खातिर त कुछु करबऽ जा ना बाकिर काम, काम खातिर त तू लोगिन के कुछु करही के नइखे । जब कवनो लइकी के देखलऽ तोहरा लोग प काम के भूत चहरि गइल । अब ऊ लइकी सुन्नर, आन्हर, लंगड़ चाहे टिबिआहो काहे ना होखो । ऊ लइकी दू साल के होखे भा पांच भा पनरह साल के । इहां तक कि ऊ पचहत्तर साल के बूढ़ मेहरारू काहे ना होखे ओकरा प भुखाइल बाघ – सियार लेखा टूटि जइबऽ जा । बस लूटऽ, लूटऽ, लूटऽ । ओकर कपार से लेके गोड़ तक लूटत रहऽ । जब मन भरि जाई त ओकरा के मुआ द चाहे असहीं छोड़ि दऽ। दुनिया के बात सुनि – सुनि के ऊ खुदे आत्महत्या करि लीहीं ।

बस वासना के दइंत (भूत) कपार प चहरल कि कवन बेटी, बहिन, साली, माई , चाची, दादी, नानी, भउजाई, नोकरानी चाहे दोसर लइकी – मेहरारू सभ भुला जालऽ ।

जवन लइकी के इजति लूटाला ओकरा प का बीतेला ई हमरा से पूछऽ । हम कतने सहनी आ सहत बानीं । ओह दिन से लेके आजु तक हमार आंखि से खून के लोर गिरत बा । हमार पूरा जिनिगी तबाह हो जाये के । आपन सभ सपना माटी में मिलि जाये के आ दुख – दरद के लोर से हमार ई आत्मा जारे – जार भइल बा…।’’ कहते बारली बिलिख पड़ली ।

सभ आदमी उनुका प नजर गड़वले उनुकर बात धेयान से सुनत रहन । माई आ नानी के रोआई बारली के सुनाइल । सरवन के इयाद क के उनुकर आंखि फेरु गइल भर ।

बाकिर ऊ आपन पोंछली लोर आ दिल के सभ भड़ास निकाले लगली, ‘‘हमार ई देहि प बिटेसवा कतने घाव देले बा । ई त भरि जाई बाकिर जवन घाव हमार करेजा प भइल बा ऊ कइसे ठीक होई ? अगर ऊ हमरा सामने आ जाई त हम ओकरा के जिन्दा जरा देब । ओकरा के गुरिये – गुरिये काटि के चील – कउआ के खिआ देब तब हमार आत्मा ठण्डा होई । ओकरा आपन मेहरारू से मन ना भरल कि ऊ हमरा के बरबाद क देल स । हम कतना ओकरा गोड़ पड़नी, हाथजोरी कइनीं बाकिर ऊ हमार एक ना सुनलस आ हमार इजति के बखिया उघाड़ के आपन आगि बुझवलस । हमरा के तारे – तार क देलस ऊ । कल्पना करऽ ओह घरी के समय । सोचऽ ओह घरी हमार का हाल भइल होई ?

आपन ऊ छटपटाहट आ चिलाहट आजु तक हमार आंखि में घूमेला । हम उहे नीन में सपनानी । ऊ घटना के इयाद क के राति में उठि – उठि के कतने रोयेनी । दिने – राति हमरा के नीन के गोली खिया के सूतावल जाला । 21 – 22 बरिस के लइकी के बिटेसवा इजति लूट लेलस ओकर सजा ओकरा का मिले के चाहीं ? ऊपर से तू लोग हमरे के देत बाड़ऽ जा दोष । बलत्कार खाली हमारे नइखे भइल बलुक सभ लइकी के जवरे भइल बा । आजु हमार भइल बा काल्हु दोसर के होई एहि तरे परसो, तरसों आ बरसों सभ लइकी के बलात्कार हो जाई आ दुनिया के बानी सुनि – सुनि के ऊ अपने मरि जइहें स । अगर आजु एकरा के ना रोकल जाई त ई एगो बड़हन बेमारी आ महामारी के रूप धर लीही फेरू कवनो लइकी अइसन ना बचिहेंस जवना के इजति ना लुटाइल होखी । सभ लइकी – मेहरारू बलात्कार के शिकार भइल रहिहें स ।

तू हमार आपन गांव – मोहल्ला के नू बाड़ जा, त जाके बिटेसवा के खोजि के हमरा सामने लिआवऽ । हम देब ओकरा के सजा । जरूरी बा जब आपन बेटी – बहिन के इजति लुटाई तबे सभ केहूं के आंखि खुलि दोसर के देखि – सुनि के आंखि नइखे खुल सकत ? दरद – तकलीफ ना होई ?

जब हमार इजति लुटा गइल त हमार माई आ नानी हमरा से छुआत ना रही जा । फेरू बोलल छोड़ि दिहली जा हमरा से । ऊ लोग मेहरारू होके हमार दरद ना समुझल । आजु हमार माई आ नानी हमरा खातिर गैर हो गइल बाड़ी जा। जवन हमरा से सौतेला अइसन करत बाड़ी बेवहार ।’’ बारली अपना बारे में सभ भड़ास निकाल देली तब उनुका दिल तनी हलुक भइल ।

सरवन पमली आ सँवरी के भी नेयाय दिलावे के बात चिट्ठी में लिखले रहन । बारली के मन में जवन बात ऊ दूनों जानि खातिर रहे उहो बोल पड़ली, ‘‘हमार सखी पमली माधव से पेयार कइली । माधव उनुका के पेयार में आगा बढ़ा के माई बना देलस । खूब भइल बदनामी पमली के । सभ केहूं उनुका के कुंआरी आ बिन बिआहल माई कहे लागल । बाकिर माधव के केहूं ‘कुंआर बाप’ भा ‘बिना बिआहल बाप’ काहे ना कहल ? ऊ लइका ह एही से ? ई देश के ऊ अभिन्न अंग ह । त का पमली मतलब लइकी ई देश के अभिन्न अंग ना होली सन ?

पमली के बाप – भाई माधव से कुछु पूछे ना गइले बलकु आपन सभ खीस पमलिये प निकालि देलन जा । इहे भीड़ में कतने लइका होइहें स जवन लइकी से पेयार करत होइहें स आ ओकर सभ लूट के धोखा देके हो जइहें स नव दू एगारह ।

परेम करे के त राधा आउर कृष्ण परेम कइले रहले बाकिर कवनो किताब के कवनो पाना में ई लिखल ना मिली कि राधा कृष्णा जी के बाचा के माई बनल रही भा कुंआरी माई बनल रही । कहे के त सभे केहूं कहेला कि हम परेम, पेयार, इश्क आ मोहबत करत बानीं बाकिर एहमें से केहूं  कुछु ना करेला बलकु ई नावं के सहारा लेके वासना करेला । लइका – लइकी दूनों एक – दोसरा के वासना के भूखल होला । जहवां हम – बिस्तर भइले कि सभ पेयार खतम ! का इहे पेयार ह ? का राधा आउर कृष्णा इहे पेयार करे के सिखवले रहन जा ?’’ बारली तनी देर खातिर चुप हो गइली । उनुकर नजर भीड़ में खाड़ पमली के बाबूजी आ मूरती प गइल । दूनों जना सोच में पड़ल रहन जा ।

फेरू बारली सँवरी के ऊपर दहेज खातिर भइल अत्याचार के सभ बाति कहते आगा कहली, ‘‘का सभ पति केसर जइसन होला ? मरद आपन मेहरारू से पेयार आ विश्वास करेला बाकिर आजु के मरद बेदरद हो गइल बाड़े स ।

सोना के अंगुठी, टी0 वी0, राजदूत, साइकिल, रूपिया इहां तक कि एगो गाय आ भइंस खातिर आपन मेहरारू के रोज पीटत चाहे जिंदा जरा देत बाड़े स ।

लइकी त खुदे अपना आप में दहेज बाड़ी स । का लइकी के पढ़ाई- लिखाई आ खाये – पीये में रूपिया ना लागेला ? ऊ सभ फिरिये में बी0 ए0, एम0 ए0 पढ़े लिसन ? चाहे कवनो लूर सिखेली सन ?

कबीर एगो दोहा कहले रहन – ‘सहज मिले ऊ दूध सम, मांग के मिले सो पानी, कहत कबीर ऊ रक्त सम जे में एँचातानी ।’

लइकी के माई – बाबू अपना मन से लइका वाला के सर – समान देलन ऊ दूध के लेखा होला । लइका वाला जब मांगि के समान लेबेला ऊ पानी जइसन होला बाकिर जब आपन पतोहि आ मेहरारू के मारि – पीटि के कुछु लेबल जाला त ऊ खून के समान होला । पीये के सभ केहूं दूध आ पानिये पीयेला खून केहूं ना पीये ।

शंकर जी, राम जी, कृष्णा जी आ चाहे दोसर भगवान बिआह कइले रहन जा त ऊ लोग आपन – आपन मेहरारू के मारि – पीटि के आपन ससुरारी से बढ़िया – बढ़िया त्रिशुल, धनुष – बाण, कमल के फूल, बंसुरी चाहे दोसर समान मांगत रहन जा ?

कवनो धरम – ग्रंथ में ई नइखे लिखल कि दहेज खातिर आपन मेहरारू के मारऽ पीटऽ चाहे छोड़ि दऽ । पेयार करि के लइकी के माई बना के भागि जा आ कवनो लइकी के इजति लूटऽ । का ई लिखल बा ? जवाब द ।

बड़ जाति वाला छोट जाति वाला के हाथ से छुअल पानी पीयल त दूर ओकरा साथे एके खटिया प ना बइठि काहे से कि ऊ अशुद्ध हो जाई । बाकिर बड़े जाति वाला छोट जाति के लइकी के इजति लूटत बा । ओह घरी ऊ अशुद्ध ना होला ? बलुक ई कहिह स कि ई मरद – मेहरारू के बीच के अनोखा मिलन ह ।

जब – जब ई धरती प दहेज खातिर पेयार में धोखा मिलला का बाद आ इजति लूट जाये प कवनो लइकी रोयेले त ओकरा जवरे सभ देवी – देवता रोयेलन जा । ओह घरी ऊ लोग सोचेला कि हमनी के इंसान बना के बहुते बड़ गलती क देनी जा । दहेज, पेयार आ बलात्कार के शिकार लइकी के लोर के पोंछी ? आजु के सभ इंसाने नू आछा काम करि के पोंछिहें जा ।

हम पूछत बानीं कि लइकी होखल पाप ह कि जुरूम ? भले ई भारत देश गुलामी से आजाद हो गइल बाकिर आजु के एहिजा हर लइकी आ मेहरारू गुलाम बाड़ी स आपन आस – पास के लइका आ मरद से । ई सभनी के आजाद के करीं ? का राम, कृष्ण आ गांधी दुबारा ई धरती प जन्म लीहें ? आजु सभ पुरुष जात के ही राम, कृष्ण आ गांधी बने के पड़ी तब सभ लइकी आ मेहरारू खुलल हवा में सांस ले सकिहें स । हटावऽ आपन दिल – दिमाग प के पड़ल अहंकार के । मरदाना होखे के घमंड के चूर-चूर करऽ ।

‘‘आपन मानसिकता के एगो नया राह प ले चलऽ। आपन देह ना बलुक आपन मन – दिल बदलऽ । ओकरा साफ करऽ । दिल के हर देवार प नारी के ऊंचा आसन लगावऽ। उनुका के गोड़ के जूता – चपल ना बलुक माथा के टीका समुझऽ । मत करऽ कवनो पूजा – नमाज बाकिर हर धर्म – जाति के नारी के सम्मान से देखऽ । उनुकर आदर आ इजति करऽ ।’’

बारली आपन बात जारी रखते आगा कहली कि ऊ एहिजा गीता के उपदेश नइखी सुनावत बलकु सच्चाई कहत बाड़ी  । नारी रूप – यौवन से भरल खाली हाड़ – मांस के पुतरी नइखे जेकरा के बस खाली भोगे के बा । बलुक ओकरो में मन – दिल आ आत्मा बा । उहो सम्मान से बिना डर – भय के इंसान होखे के जिनिगी ई धरती प जीयल चाहत बिया ।

हमार भाई के लास पड़ल बा आ तू लोग हमरा के बदनाम करत बाड़, दू बून लोर गिरावे के बजाये हमरा प छींटा कसत बाड़ऽ । पता ना हमार ई सभ बात तू लोग के समुझ में आइल कि हवा में उड़ि गइल ।’’  ऊ चुप हो गइली ।

ओहिजा जेतना लोग खाड़ रहे सभे के मूड़ी नीचे हो गइल । केहूं – केहूं के आंखि लोरा गइल रहे । नारा लगावे वाला लइका भरले आंखि बारली के सोझा आइल, ‘‘हमरा माफ क द बारली, हम तोहरा के गलत बुझनी । तू सभे के दिल – दिमाग प के पड़ल एक – क गो गलत विचार के जरा के राखि क देलू । हमनी के गलत सोच के लइका ही सभ खुराफात के जड़ बानी जा । हम बिटेसवा के पकड़ि के तोहरा लगे लिआइब । तोहरा जवन सजा ओकरा देबे के होई, दीह ।’’

बारली के मन तनी शांत भइल, ‘भइया, एगो लइका त हमार बात समझु ल ।’

तबहीं एगो लइकी भीड़ के चीरत ओहिजा आके कहलसि ‘‘बारली, हम तोहर लड़ाई में साथे बानी । हमहूं तोहरे के बदमास बूझत समुझत रहलीं बाकिर जब तू बलात्कार के हकीकत बतवलू आ हम ऊ कल्पना के सागर में डुबकी मरनी हा तब पता चलल कि इजति लुटाइल केतना घिनवना आ लाज के बाति बा । तू ठीक कहलू हा जवन तोहरा जवरे घटल बा ऊ सभ लइकी – मेहरारू के जवरे घटी । तोहार सभ बाति हमरा के झकझोर देलसा । हम छत प खाड़ होके तोहार सभ बाति सुनत रही । आ हमार गोड़ तोहरा लगे खुदे चलि के आ गइल । हम मुसलमान हईं बाकिर अपना भारत देश के आपन खुदा – अल्लाह मानेनी । हम तोहार हर कदम प जवरे बानीं ।’’

‘हमार लड़ाई में एगो आउर लइकी शामिल हो गइल, भइया ।’ बारली बंद कइली आंख ।

तबहीं नानी छड़ी पकड़ले ओहिजा आके उनुकर हाथ पकड़ उनुका से माफी मांगत घरे चले के कहली । ऊ उनुकर हाथ पकड़ि के गते – गते ले जाये लगली । बारली के बड़ा आछा लागल ।

ऊ आपन दरद आ भइया के मउवत के दुख आपन आंखि के गंगाजल से सरवन के दूनों गोड़ पखार देली ।

माई पहिला बेर उनुका के अपना ममता के अंचरी से लगवली, ‘‘चुप हो जो बबी, आजु हमरा मालूम भइल हा कि जब अपना प दुख पड़ेला त का हाल होला । आजु हमार गोदी उजरि गइल । अंगना सून हो गइल । सरवन के रूप में हमरो आजु मरि गइल इजति । हमहूं तोरे के दोस देत रहली । माई होके भी हम तोर दरद के ना समुझ पवनी । अब कबो तोरा के अपना छाती से अलगा ना राखब ।’’

‘‘साँचो माई !’’

‘‘हँ, हमार बुचिया, आपन भइया के तुलसी गंगाजल दे दे । सभ केहूं देलस ।’’ माई बारली के कटोरी देली ‘‘तोरा हाथ से सरवन तुलसी – गंगाजल पी के तिरीपत हो जइहें ।’’

बारली सरवन के मुंह में पांच हाली तुलसी – गंगाजल के तरपन देली । तरपन देत समय उनुकर लोर सरवन के मुंह में चलि गइल जवन गंगाजल के साथे मिलिके उहो गंगाजल बनि गइल ।

सरवन के देहि में हरदी लगा के ‘राम नाम सत्य है’ के साथे विदाई दिआइल । सभे एक दोसरा के पकड़ि के छछनत रहे । पिताजी मुखाग्नि देलन । भइया के चिता जरल देखि के जीतन पिताजी के पकड़ि के बिलख पड़ले आ ऊ जवान बेटा खातिर तड़पत रहन, ‘हे भगवान, ई कहवां के नेयाय कइल ह । हमार बेटा हमरा के जराइत बाकिर आजु हम आपन ई हाथ से आपन जवान बेटा के जरवनी । ओह ! कवन जन्म के बदला तू लेलऽ ।’

रोते – रोते कमजोर बारली सूत गइल रही । माई छाती पीट – पीट के चिचिआत रही, ‘हे शिव बाबा, कवन तोहार हम पूजा कइली अधूरा कि हमार बबुआ के ले ले लऽ परान पूरा । कतने बड़का पहाड़ हमरा प गिरव लऽ, हमार ई कोखिया में मार देलऽ छूरा ।’ ऊ केहूं के सम्हारे से ना सम्हरत रही ।

बारली के आंखि में कहां नीन रहे ? ऊ त बस थाक गइल रही । ऊ गते – गते माई लगे अइली आ उनुका लगे बइठते सिसिक पड़ली । उनुकर मुरझाइल चेहरा, सूखल ओंठ, बड़का – बड़का  लाल भइल आंखि से झरत लोर आ दुबर – पातर देहि देखि के पता ना ऊ काहे चुप हो गइली आ उनुकर पोंछ ली लोर,  ‘‘बबी, आराम कर । एहिजे सूति जो ।’’

बारली ओठंग गइली त ऊ उनुकर हाथ गोड़ दाबे लगली । माई के ई बेवहार से उनुकर करेजा जुड़ा गइल । ओह घरी उनुका बस भइया के चलि जाये के ही दुख रहे । उनुकर करेजा कुहुंक पड़ल । माई – पिताजी के पागल के दसा हो गइल रहे । ऊ सड़कि प के कवनो – कवनो लइका के पकड़ि के कहत रहन जा कि इहे हमार सरवन बबुआ ह । जब ऊ लोग के सच्चाई बतावल जात रहे त ऊ लोग फेनु छाती पीटे लागत रहे ।

 

( 14 )

 

बारली आ जीतनो के रोअला के ठेकान ना रहे । लता दूनों जना के समुझवली । जीतन के जिमेदारी के एहसास करवली कि अब उहे घर के सहारा बाड़े । उनुके बारली के नेयाय दिवावे के बा । उनुकर भविष्य बनावे के बा ।

‘‘फुआ जब हमार भाई – बहिन के सपना ना पूरा होखल त हम आपन भविष्य कइसे सुनहला बना सकत बानी । हम तू लोग के सहारा बनब ।’’ भरोसा देलन जीतन ।

बारलियो वादा कइली कि अब ऊ ना रोइहें ।

बिटेसवा अभी तकले ना पकड़ाइल रहे पुलिस के खोज बिन जारी रहे ।

सँवरी आ पमली बारली से भेंट करे अइली जा । उनुकर हाल समाचार पूछल लोग । ओह दिन ओतना आदमी के बीच में बारली जेतना बात बोलले रही ओकरा इयाद करत पमली अचम्भा में पड़ल रही । बारली कहली कि ऊ सभ बात सरवन भइया अदृश्य रूप से कहत रहन । भइया के इयाद करत उनुकर आंखि लोरा गइल । फेनु ऊ कहली, ‘‘घर में रहत – रहत मन उबिया गइल बा । गुलाब लगे चले के घूमे, बड़ा ओकर इयाद आवत बा ।’’

दूनों सखी भी जाये के तइयार हो गइली ।

जब ऊ लोग जाये लागल त माई चेतवली,  ‘‘बारली, ठीक से जइहे ।’’

‘‘काहे ? कहीं फेरू से हमार इजति….।’’

‘‘भूलाइयो के ई बात मत कहिहे ।’’ माई बारली के ओंठ प हाथ राखि देली ।

‘‘आछा ।’’ बारली सड़की प आ गइली । कहली, ‘‘अब माई हमरा के हरमेशा अपना जवरे रखेली ।’’

‘‘सही समय प उनुकर आंखि खुलि गइल ।’’ पमली कहली ।

राहता में सभ केहूं बारली से हाल – चाल पूछल । अब केहूं तीनों जानी के देखि के हंसल चाहे गाभी ना मरलस । बीच राही में ऊ मुसलमान लइकी जुमा भेंटा गइली । कहली,  ‘‘बारली, हम तोहरा से कहले रही नूं कि हम तोहर लड़ाई में साथ बानीं आ हमार अम्मी, अब्बा आउर भइयों बाड़न जा । अब्बा कहले हा कि हमनियो के धर्म ग्रंथ कुरान शरीफ में मेहरारू सभनी के आछा नजर से देखे आ मदद करे के लिखल बा ।’’

बारली के ओंठ प तनी मुसकी आ गइल । ऊ उनुकर हाथ पकड़ लेली, ‘‘जुमा, हमरा खुशी बा कि तू आ तोहार घरे के लोग आछा बुधी – बिचार के बाड़े जा । हमार बात के तू लोग दिल से समुझल। तू हमार सखी बनबू ?’’

‘‘ई त बड़ा खुशी के बात बा हमरा खातिर ।’’ कहते जुमा बारली के अंकवारी में भर लेली फेनु सँवरी आ पमली से भी अंकवारी लागि के घरे चल पड़ली ।

तीनों लोग आगा बढ़ल  । एगो मेहरारू पमली के रोकत पूछलसि, ‘‘पमली बबी, अभी तोर कवन महीना चलत बा ?’’

‘‘दोसरा । काहे खातिर ?’’

‘‘असहीं । तू जादे काम धान्हा मत करिहें आ भारी चीज मत उठइहें । खाये – पीये प धेयान दिहे । कुछु दिकत बुझाये त हमरा से कवनो बात पूछ लिहे ।’’

‘‘ठीक बा ।’’ पमली आगा बढ़त बारली से कहली, ‘‘बारली, तोहार ऊ दिन के बात सभे प जादू अइसन काम कइले बा  ।’’

‘‘ना ।’’

तीनों जानि बतियावते जात रही । नारा लगावे वाला ऊ लइका चाह के दोकान प खाड़ होके चाह पीयत रहे । बारली के देखि के उनुकर नांव पुकरलसि । ऊ ना सुनली । फेरू तीन – चारि बेर पुकरलसि । तब बारली पाछा तकली । देखली ऊ दू – चारि गो लइकन जवरे उनुके देने दउड़ल आवत रहे ।

जब ऊ भीरी आइल त ऊ खिसअइली,  ‘‘बीच सड़कि प असहीं लइकी के नांव चिचिआइल जाला ।’’

‘‘गलती हो गहल । अब अइसे ना करब । तोहरा से एगो बात कहे के रहे ।’’ ऊ लइका हांफत कहल ।

‘‘हाली कहऽ ।’’ बारली झझुअइली ।

‘‘हम आ हमार सभ संघतिया बिटेसवा के सगरो खोजनी हा जा बाकिर ऊ ना मिलल ह । पुलिस के पता लागल बा अभी ऊ एने – ओने लुकाइल चलत बा ।’’

‘‘आउर कुछु ।’’

‘‘तू एतना खीसियात काहे बाडू ? सभ लइकन के बिटेसवे बूझत बाड़ू ? सभ केहूं ओइसने ना होला । तोहार सभ बाति हम आपन संघतिया से कहिला । तोहार लड़ाई में हमनी के साथ बानी जा ।’’

बारली आपन खीस नेवर कइली, ‘‘आछा तोहार नांव का बा ?’’

‘‘विश्वजीत । आछा नोकरी के जोगाड़ में सगरो फारम भरत बानी ।’’

‘‘तोहार नांव त बढ़िया बा । आछा – आछा काम क के विश्व के जीतऽ । अब तोहरा के समुझावे के पड़ी । बीच सड़कि प का बात होई । चलऽ ऊ फेड़ लगे ।’’ बारली सड़क के किनारे मोटहन नीम के छायादार फेड़ के देखते कहली ।

सभ केहूं ओहिजा गइल ।

‘‘देखऽ विश्वजीत, हमार लड़ाई में तोहरे अइसन लइकन के काम बा । पढ़ल – लिखल अनपढ़ – गंवार सभ । काहे से कि एगो लइका ही लइकी के आबाद आ बरबाद करेला । लइका, लइकी के आछा नजर से देखी त आबाद करी आ खराब नजर से देखी त बरबाद करी । लइकी के आबादी – बरबादी बस लइकने के हाथ में बा । ज्यादेतर लइका अदमी कवनो लइकी – मेहरारू के आछा नजर से ना देखेलेस बस हमरा ऊ सभनी के नजर आ दिल – दिमाग बदले के बा । हमरा तीन – गो चीज से लड़ाई बा ।’’

विश्वजीत कहलन कि उनुकर लड़ाई में ऊ शामिल होखिहें । ऊ लड़ाई के पूछले ।

बारली कहली कि उनुकर लड़ाई दहेज, पेयार आ बलात्कार से बा ।

दहेज – जब ऊ बिआह करिहें त दहेज मत लिहें । लइकी वाला अपना मन से जे दिही ऊ खुशी से राखि लिहें । बाकिर बाद में मेहरारू के मार – पीट के ससुराल से कवनो चीज ना मांगिहें । एगो आछा पति बनि के आपन मेहरारू से पेयार करिंहें । उनुका के माथ के टीका समुझिहें । ई उनुकर पहिला जीत होई ।

पेयार – तू लइका बाड़ऽ त तोहरा प पेयार के नसा चहरबे करी । पेयार करिह बाकिर एके लइकी से, दू – चारि गो से ना । लइकी के जादे पेयार पावे खातिर पहिले बिआह कर लीह । बाकिर जब अइसन ना होखे त पेयार में आगे मत बढ़िह । आ जदि बढ़ गइलऽ त मालूम चलि कि तू बाप बने के बाड़ऽ । ओह घरी लइकी के धोखा देके भगिह मत । चाहे ओकरा अस्पताल के राह मत देखइहऽ । बलुक आपन छाती ठोंक के समाज के सामने कहिहऽ कि एह होखे वाला बाचा के बाप हम बानीं । फेनु ओह लइकी से बिआह क के उनुकर जिनिगी खुशी से भर दीहऽ । ई हमार दोसर जीत होई ।

बारली रूक के फेनु आगा कहली – ‘‘बलात्कार जइसन नीच आ घिनवना काम कबो मत करिह । कवनो नारी जात के इजति मत लूटिह । ऊ सभनी के खराब नजर से मत देखिह । अगर तोहरा कतहूं साधारन से सुंदर कइसनो लइकी मिलि जाए त ओकरा के आपन सुरक्षा में राखि के ही सलामत घरे पहुंचा दीह । लइकी के देखि के अपना ऊपर काम – वासना चढ़े मत दीहऽ। ई हमार अंतिम आ सबसे आछा जीत होई । ई तीनों तू काम आछा आ ईमानदारी से करबऽ त तू हमार लड़ाई के पहिलका आ साचा सिपाही होखबऽ। हमरा तोहरा से धन – दउलत ना चाहीं  बलुक सभ नारी – जात खातिर चाहीं मान – सम्मान आदर आ इजति । तू ई सभ नारी के देबऽ ?’’

‘‘हं बारली हं, हम तोहरा के आ सभ नारी जात के मान – सम्मान आ इजति देब । जवन तू तीन गो लड़ाई बतवलू हा हम ओह प चलब जवरे आपन संघतिया के चलाइब ।’’ विश्वजीत कहि के आपन संघतिया से ई लड़ाई में साथ निभावे के पूछले ।

सभ हं – हं कहले स । बारली बड़ा खुश भइली । ऊ आगा बढ़ली ।

‘‘बारली, तू पहिले लइकन से बोलत ना रहू बाकिर आजु…।’’

‘‘जरूरत के हिसाब से बोलही के पड़ी । आखिर इहे लइकन त हमार लड़ाई आगा बढ़इहें स ।’’

सँवरी लड़ाई के बारे में पूछली ।

बारली दूरे से गुलाब के पौधा देखली ।

भिरी आके संवरी – पमली जब गुलाब देखली जा त उनुका काठ मार देलस । लाल – पीयर गुलाब के दूनों  पौधा सूख के लकड़ी हो गहल रहे । सभ पतई झर गइल रहे । दूनों जानी रो पड़ली बाकिर बारली के हंसी आ गइल,  ‘‘हम जानत रही कि ई गुलाब के पौधा सूखा गइल होई । एहि से त आजु एकरा देखे अइनी हा ।’’

सँवरी – पमली के माथा ठनक पड़ल,  ‘‘तू कइसे जानत रहू कि ई पौधा सूखा गइल होई । बड़ा अगमजानी मियां भइल बाड़ू । लइकाई में तू ही नू कहले रहूं कि ई हमनी के सखियारो के निसानी पौधा ह ।’’

बारली आपन पक्ष रखली कि सच में ई पौधा ऊ लोग के सखिआरो के निसानी बा । जब ऊ लोग हंसत – खेलत रहे त ई पौधा हरिआइल रहत रहे बाकिर आजु तीनों जानी के जिनिगी दुख – लोर में डूबल बा त कुछ त असर पड़बे करी । नेव हिली त का देवार खड़ा रह पाई ? सँवरी,  पमली आ बारली के जिनिगी बीच दरिया में फंसल बा जहंवा से निकले के कवनो राह नइखे ।

‘‘हमनी के सखियारो ठीक ना रहे । तीन टिकट महाविकट ।’’ पमली आपन सखियारों के दोस दिहली त सँवरी भाग्य – किस्मत के दोसी ठहरवली ।

बारली गुलाब के सूखाइल पौधा के भीरी बइठते कहली,  ‘‘हमनी के सखियारो आ किस्मत – भाग्य खराब नइखे बलुक ई सभनी के जिम्मेदार केसर, माधव आ बिटेसवा बा ।’’

सँवरी – पमली भी ओहिजा बइठ गइली । दूनों उनुकर बात से एकमत रही ।

सँवरी, पमली से उनुकर बाचा खतम करे के कहली । पहिलहीं खा पमली छछनि के बाचा ना गिरावे के डहकि पड़ली । सँवरी बेरि – बेरि पमली के होखे वाला बाचा के नजाइज आ आपन होखे वाला बाचा के जाइज कहि के समुझावत रही ।

बारली दूनों केहूं के बतकही सुनत रही । जब उनुका से नजाइज शब्द बरदास ना भइल त ऊ सँवरी से पूछली,  ‘‘सँवरी, तोहर बाचा होई त ओकरा लिलार प जाइज आ पमली के बाचा के लिलार प नजाइज लिखल रही ?’’

‘‘ना ।’’

फेनु ऊ पूछली कि उनुकर बाचा क महीना प होई ?

सभ मेहरारू के बाचा पूरा नव महीना प होला । 15 दिन भा 1 महीना के घटती – बढ़ती हो सकेला ।

‘‘हूं । पमली के नजाइज बाचा क महीना प होई ?’’

‘‘कहनी ना सभ बाचा नवे महीना प होला ।’’

‘‘ई कइसे होई ? पमली के बाचा नजाइज बा ओकरा त पांचे महीना प हो जाये के चाहीं । भले तोहार जाइज बाचा नव महीना प होखे ।’’

‘‘ई का बिना माथा के बात करत बाड़ू । कवनो बाचा पांच महीना प पूरा ना बनेला । भगवान पूरा नव महीना गर्भ में राखि के ओकरा धरती प भेजेलन ।’’

बारली फेनु सवाल दगली कि पमली के बाचा होखे के समय उनुका प्रसव पीड़ा ना होई । उनुकर बेटा में लइकी के सभ गुन दोस रही ।

सँवरी ना में जवाब देली । बारली जानत रही बाकिर उनुकर मुंह से सुनल चाहत रही । ऊ बोलली,  ‘‘सँवरी , तू खाली समाज के बखान करत बाड़ू । समाज समाज ना होके पान आ चाह के दोकान हो गइल बा । समाज साचों के झूठ कहि त सभ केहूं झूठे कही । समाज पमली के ‘कुँआरी माई’ कहलसि त माधव के ‘कुँआर बाप’ काहे ना कहलसि ? जब समाज वाला जानल कि पमली कुँआरी माई बने के बिया त सभ समाज वाला माधव के घींच के लिआइत आ पमली जवरे ओकर बिआह करवाइत । तब नू समाज आछा कहाइत । समाज में लइका – लइकी दूनों रहत बा बाकिर एकर मतलब ई नइखे नू कि समाज खाली लइकिये के दोस देबे आ लइका छाती तान के चले । एगो लइकी बदनाम का होले कि सभ केहूं ओकरा के चाह के पिआली आ पान के थूक समुझेला । चाह पीय आ पिआली घुमा के फेंक द । पान खा थूक द । सभ केहूं बस इहे फेर में रहेला कि कवन लइकी बदनाम आ नांव – गांव कर सन कि हमनी के खइनी ठोंक – ठोंक के ओकर सिकाइत बतिआईं जा ।’’

ऊ एक सुर में आगा कहली कि सँवरी बड़ा समाज के गुन गावत बाड़ी ।

अगर उनुकर समाज वाला बड़ा आछा भा दयावान बाड़े स त काहे ना सभ केहूं मिली के एगो राजदूत दे देलसा ऊ ससुरा चलि जइती । समाज वालन के खाली सई हाथ के जीभे बा चपर – चपर करे के । एक बीता दतुअन लेखा बढ़िया हाथ नइखे आछा काम करे के ?

पमली के जब बाचा होई त ओकरा प भगवान नजाइज लिखि के भेजबे ना करिहें तब समाज के लोग काहे एक मुंह से नजाइज कहत बा कि माई – बेटा  दूनों सुनि – सुनि के मरि जइहें स । समाज के नियम कानून  बा । सभे के ओकरा हिसाब से चले के पड़ेला । बाकिर जे गलती करि के सुधरल चाहत बा, ओकरा हाथ पकड़ि के गहिरा में से निकाले के नू पड़ी । जब पमली बाचा के जन्मावल चाहत बाड़ी त सँवरी काहे के गिरावे के कहत बाड़ी । भगवान पमली के माई बने के आसिरवाद देले बाड़े त काहे ऊ बाचा के गारी दिआत बा ? गारी बाचा के ना बलुक भगवान के दिआता । एहिसे त कबो ऊ एतना खिसिया जालन कि कवनो – कवनो मेहरारू के बांझ बना देलन । पमली के होखे वाला बाचा के पाप, हरामी के अवलाद आ नजाइज कहात बा ।

जब कवनो मेहरारू के शादी के आठों – दस साल बाद बाचा ना होला त ऊ सभ मंदिर – मस्जिद में नाक रगड़ेलीसन । डाक्टर के गोड़धरिया करेली सन कि कसहूं ऊ माई बन जाओ । चाहे जेतना पइसा लागि जाओ । बाकिर ऊ लोग अनाथ बाचा गोद ना लीही । उनुकर आपन कोख के जन्मल बाचा चाहीं ।

एकर फायदा साधु आ ओझा गुनी उठावेल सन। पहिले त खूब रूपिया ठगिहेंसऽ, बाद में आपन चमत्कार देखावेल सन । ओकरा भिरी अनपढ़ गंवार का पढ़ल – लिखलो मेहरारू जालीसन ।

‘‘आखिर ओझा – गुनी आपन जादू – मंत्र से मेहरारू के माई बना देबेलसन नू । कतना आछा ऊ लोग काम करेला ।’’ सँवरी खुशी से बोलली ।

‘‘बुझाता तूहूं साधु – ओझा के फेर में रहेलू ।’’ बारली हंसली, ‘‘बाकिर कबो रहबो मत करिह । ओझा – गुनी कवनो जादू – टोना भा चमत्कार ना करेलसन बलुक मेहरारू के प्रसादी के जरिये बेहोस क के हमबिस्तर बनावेलसन । जब ऊ मेहरारू माई बनि जाई त ओझा के बड़ा चमत्कारी बाबा कही बाकिर भीतरे के खीसा केहूं जानते नइखे । बाचा ऊ ओझा आ साधु के आ बाप कहइहें ऊ ओह मेहरारू के मरद ! ओह घरी ई ‘समाज’ कहवां रहेला ?’’

‘‘का अइसन होला ?’’ सच्चाई सुनि के सँवरी के करेजा मुंह में आ गइल ।

‘‘चार सौ चालीस के भोल्टेज से मत चिहा । जवन साधु बाचा हो जाये के गारंटी देबेलसन उहे ई सुध राह अपनावेलसन । ऊ सभनी के करेजा जुड़ा जाला आ मेहरारू के गोद भर जाला । दूनों देने हिसाब बराबर आगे के काम असहीं चालू ।  सँवरी, तू बहुते आपन होखे वाला बाचा के जाइज नू कहत बाडू़ अगर हम कहीं कि ई बाचा तोहार देवर मनेस के ह त…।’’

बारली के अइसन गंदा बात प संवरी के काठ मारि देलस । ऊ हेतना बड़का लगानी उनुका प लगा देली । ऊ अधमुअल सांप लेखा फुंफकरली, ‘‘बारली, आपन जबान सम्हार के बाति करऽ । अगर तू हमार सखी ना रहतू त अभी हम राख लगा के तोहार जबान घींचि देती ।’’

‘‘काहे हमार बात हरियर मिरचाई जइसन तीत लागल । लऽ घींच द हमार जबान । अगर हमरा अब मालूम चले कि जेकरा हम पिताजी कहेनी ऊ हमार पिताजी ना होखस तब ? हमार माई कहे कि तू हमार परेमी के लइकी हइस तब का होई ? का हमरा लिलार प लिखल बा कि हम लोचन बाबू के लइकी हईं कि माई के परेमी के ? जवन बीया से हमार जन्म भइल बा ऊ केकर ह हमार पिताजी के कि माई के परे…।’’

‘‘सटाक…।’’

बारली के गालि प सँवरी के एगो जोरदार चमेटा पड़ल,  ‘‘धिधिकार अइसन बेटी आ सखी प जवन आपन माई आ सखी प एतना खराब लगानी लगावत बिया । छीः अइसन खराब आ गंदा बोले वाली लइकी के । अइसन सखी हमरा ना चाहीं ।’’

‘‘का हम जानत बानी कि हम केकर पइदाइस बानी फिर भी जाइज बानी ।’’ बारली भुखाइल बाघ नियन गरजली, ‘‘अगर तू आपन देवर से फंसल रहतू त का केसर ई कबो जनते कि ई बाचा केकर ह ? हमरा तोहरा, पमली आ सभ दुनिया वाला के लिलार प लिखल बा कि ऊ जाइज बाड़े स ? त फेरू पमली के बाचा के काहे नजाइज कहात बा ? तोहार बिआह के बाद बाचा होखे के बा त जाइज हो गइल । पमली के बिआह के पहिले होखे के बात त नजाइज हो गइल । अगर इजति लुटाये के घरी हमार गर्भ ठहरि गइल होखे त उहो नजाइज आ बलात्कार के पैदाइसे कहाई ।’’ बारली के करेजा में ज्वालामुखी धधकत रहे ।

ऊ बिना थूक घोंटले अइसन – अइसन बात कहत रही कि दूनों सखी उनुकर टुकुर – टुकुर मुंह ताकत – सुनत रही । ऊ धारा में बहत आगा कहली कि अगर पमली आ सँवरी के एके लेखा कपड़ा पहिरा दिइल जाई आ कवनो अनजान आदमी से पूछल जाए कि बताव कवन जाइज बाचा पएदा करी आ कवन नजाइज ? सँवरी  ओह घरी टिकुली सेनुर ना लगवले रहस । ऊ आदमी धोखा खा जाई । बाचा पएदा होला का बाद कवनो डाक्टर भा वैज्ञानिक ओकरा जाइज भा नजाइज नइखे साबित कर सकत । अगर ऊ लोग जवरे बारली भी खाड़ हो जास त कवनो अनजान अदमी ई नइखे बता सकत कि कवन लइकी के इजति लुटाइल बा । ई सभ खाली देखे आ सोचे के नजर आ भरम बा । सँवरी के दिमाग प के पड़ल भरम वाला पर्दा के हटावे खातिर ई उदाहरन देके ऊ समुझवली ।

सँवरी चट से पूछली कि उनुका ई सभ बात के बतावल हा ।

बारली के जवाब रहे कि ई सभ ऊ आपन दिमाग लड़ाके सोचली हा । ऊ केहूं से पूछबो करिहें त लोग कहि की ई लइकिया बड़ा खराब – खराब बाति पूछत बिया । लोग गंदा – गंदा फिलिम आंखि फारि – फारि के देखेला ऊ त खाली एगो गंदा बाते बोलली हा । आजु के जमाना में त दस – बारह साल के लइकी – लइका सभ जान जात बाड़े स फेरू ऊ त चेतगर बालिग लड़की बाड़ी ।

‘‘बिआहो त शारीरिक संबंधे नू बा तबे त एक – आधा दर्जन बाचा पएदा हो जाले स ।’’

सँवरी फेरु ई सुनि के उखड़ गइली आ ओहिजा से जाये लगली । बारली झट से उनुकर हाथ पकड़ लेली कि जब तकले ऊ आपन मन के सभ बात ना कह दीहें ऊ लोग के जाये ना दीहें । बारली सँवरी के करेजा में फेरू मुक्का मरली,  ‘‘इजति त हमनी तीनों के लुटाइल बा ।’’

ई बाति बिआहल सँवरी आ परेम करे वाली पमली कइसे बरदास करती ? दिल दिमाग में जोर से करेंट मरलस । बारली के गोर – गोर गाल प बरियार दू गो चमेटा पडल़ ।

‘‘तू हमनी के एतना खराब बात बोलत बाड़ू । तू सखी हऊ कि दुश्मन ?’’ पमली गरजली ।

‘‘बारली, तोहार सोच कतने खराब हो गइल बा ।’’ सँवरी थूकली, ‘‘आक थू ।’’

‘‘काहे सच नीम आ करइला जइसन कड़वा लागत बा…।’’ सँवरी – पमली के फेनु तरवा चटक गइल । ई हाथ धरते – धरते पहुंचा धरे लागल । फेरू ऊ लोग हाथ उठवलस तले बारली कस के दूनों जानी के हाथ पकड़ लेली,  ‘‘जा मारे के बा त आपन मरद आ परेमी के मारऽ । जवन तू लोग के जिनिगी दुखदाई कइले बा । हमरा जइसन कमजोरे प हाथ उठी । असही नू मरद सभ कमजोर आ बेबस पर आपन मरदानगी देखावेलसन । ऊ सभ आपन दिमाग आ बुधी से केहूं के ना हरइहें सन बलुक आपन देहि के शक्ति से हरावे लसन । अब तू लोग हमरा के एक चमेटा मरबू जा त हम दस मुक्का मारब । तू लोग के चाहे दुनिया के हम गारी – बात मार ना सहब ।’’ उनुका खीस में खउलत देखि के दूनों सखी डेरा गइली । निहोरा करि के आपन – आपन हाथ सोझ कइली जा ।

बारली हाथ जोरि के सँवरी से कहली कि ऊ उनुका साथे – साथे सभ बिआहल मेहरारू से माफी मांगत बाड़ी, काहे से कि ऊ कुछु अइसन उरेब बोलिहें जेकरा से हर बिआहल मेहरारू के दुख लागी । बाकिर ऊ लोग  दिमाग से सोची त उनुकर बात गलत ना होई ।

सँवरी हामी भरली ।

बारली कहली, ‘‘सँवरी, हम तोहरा से आ सभ बिआहल मेहरारू से माफी मांगत आपन बात कहत बानीं । बिआह बहुते पवितर आ अनोखा रिश्ता होला । जब एगो लइका – लइकी सभ पूजा, पाठ, मंत्र, हवन, आगि के सात गो फेरा आ सातों वचन निभा के हर सुख – सुख के साथी बनेलन । लइका आपन घरे के आ अपना नांव के सिनहोरा के सेनुर लइकी के मांगि में पहिरा के ओकरा के आपन धर्मपत्नी आ अर्धांगिनी बनावेला । दूनों  केहूं के जिनिगी सुख से बीते एकर आसीरबाद सभे के साथे भगवान जी भी देबेलन ।

अब बिआह बाद लइका ऊ लइकी के चाहे जइसे उपयोग करे । सभ केहूं ओकरा सभ कुछ करे के छूट देले बा प्रमाण पत्र देले बा।

बिआह गंगा लेखा पवितर आ पावन बा । पेयार जमुना लेखा प्रसिद्ध बा बाकिर बलात्कार नाली के पानी जइसन अशुद्ध बा । सभ केहूं गंगा नहाये आछा – आछा दिन जाला । दू – चार लोग जमुनो जी नहाला । बाकिर मोरी के पानी में केहूं नहाये के ना कहे ।

जब गंगा जी से लोग नहा के आवेला त घर भर के लोग उनुकर गोड़ छुवेला । जमुना जी से नहा के अइला प केहूं – केहूं गोड़ लागेला बाकिर जब नाली के पानी में डूब के चाहे गिर के आवेला त सभ लोग सई कोस के दूरी से भाग – भाग चिचिआला । ठीक असहीं सभ लइका – लइकी बिआह करेलसन गंगा जी लेखा । जमुना जी लेखा दू चारि गो पेयार करेलसन बाकिर बलात्कार हो जाए के बात केहूं ना कहेला । नाली – मोरी के पानी लेखा । दुष्कर्म के हर केहूं अशुद्ध आ अपवित्र मानेला ।

गंगा – जमुना एके में मिलि जाई बाकिर मोरी के पानी ना मिली । ऊ दूर से महकेला । पानी त तीनों ह बाकिर फरक बा । एही तरे बिआह, पेयार आ बलात्कार एके बा बाकिर एहनी में फरक बा । ई तीनों एक में  कबो ना मिली । बाकिर आपन नया विचार से एक कइल जा सकत बा । हम ई नइखी कहत कि तीनों पानी एके में फेंट द । खुद देखऽ एक बाल्टी पानी में अगर एक बूंद गंगा जल डाल दिहल जाला त पूरा बाल्टी के पानी शुद्ध हो जाला । असहीं हमार इजति लुटाइल बा । अगर बटेसवा से हमार बिआह हो जाई त हमहूँ शुद्ध हो जाइब । फेरू केहू हमरा के अशुद्ध – अपवित्र ना कही । ना मानी । बाकिर हम त अइसन कबो ना करब । जवन हमरा के बरबाद कइलस ओकरा के आपन मरद मान के हम ना पूजब । ओह हाल में हमरा मरल जादे पसंद बा ।

बिआह, पेयार आ बलात्कार तीनों सेक्स प आधारित बा । एह में एगो स्त्री – पुरुष के मिलन होला । बिटेसवा कहले रहे कि ई अनोखा मिलन आ संगम ह । हम ई गहिरा खाई में उतरि के सोचले बानी । बारली हाथ जोरि करत कहली, ‘‘सँवरी, एहिजा हमरा माफ – छमा करिह । बिआह के बाद केसर तोहार इजतिये नू लूटत रहले बाकिर उनुका ई करे खातिर तू, तोहार आ उनुकर घरे के लोग आ सभ समाज छूट देले रहे । ई सरकारी बलात्कार ह । ई करे से पहिले केसर तोहरा से बिआह कइले तब उनुका ई अधिकार मिलल । ई सई प्रतिशत बा ।

पमली के प्राइवेट बलात्कार ह । एकरा में घर आ समाज के अनुमति ना रहे । पमली आ माधव आपन मन के मुरचा मेटावे खातिर ई काम कइले । एह काम में पमली के रजामंदी रहे । ई पचास प्रतिशत बा जब बिआह हो जाई त सई में मिलि जाई ।

आ हमार बलात्कार जबरदस्ती के बलात्कार ह । एकरा में घर, समाज आ ना हमार मरजी शामिल रहे । एह में खाली बिटेसवा के मरजी रहे । ई ना सरकारी कहाई आ ना प्राइवेट । ई त नली आ जवन गूह – मूत साफ कइल जाला ओकरा से महा खराब बा । ई बालू के कवनो कन के बराबर प्रतिशत में नइखे । सँवरी, जब तू केसर से मिललू त ऊ मरद – मेहरारू के रिश्ता भइल । कुल – खानदान चलावे के धरम कहाइल ।

पमली जब माधव से मिलली त ऊ प्रेमी – प्रेमिका के पेयार – मोहब्बत कहाइल । आमतौर प सभ केहू एकरा के हमबिस्तर कहेला ।

आ जब हम बिटेसवा से मिलनी त ऊ एगो अइयास दरिन्दा के भूख, हवस, वासना, बलात्कार, दुष्कर्म आ इजति लूटल कहाइल ।

बारली आपन बात आगा बोलते रहली कि ऊ तीनों लोग अलग – अलग नावं प सवार बीच दरिआ में फंसल बाड़ी जा । फंसावे वाला केसर, माधव आ बिटेसवा बा । बिआह शुद्ध आ पवित्र बा । तन के पेयार झूठा भा मन के पेयार सचा । बलात्कार त नली में चले वाला आ गुह मूत में रेंगे वाला पोंछी लगवा पिलुओ से बड़का पिलुआ बा । ऊ आजु पिलुआ बनि गइल बाड़ी । नानी आ माई उनुका से छुआत ना रही त ठीक करत रही जा । उनुका अपना से घिन हो गइल बा । ऊ चाहत बाड़ी कि आपन सउँसे देहि के बलेड से काटि के खून बहवा देस । ताकि अशुद्ध खून बहरी निकलि जाओ । चाहे आगि में जरि के स्वाहा हो जास कि उनुकर सभ पाप जरि के राख हो जाए ना त पानी में डूबि के मरल चाहत बाड़ी जेकरा से उनुकर अशुद्धि धोआ जाए।

ऊ आपन तुलना पमली से करत कहली कि उनुका से लाख दरजा आछा ऊ बाड़ी । कम से कम उनुकर देह शुध बा । माइयो बने के बाड़ी त अमनिया आ निरउठ बाड़ी । पमली आजु बाचा गिरा देस त ऊ शुद्ध हो जइहें । उनुका प लागल दाग मेटर जाई । साल दू साल बाद उनुकर बिआहो हो जाई । बाकिर ऊ लाखों – करोड़ों बार सगरो के प्रसिद्ध – प्रसिद्ध गंगा भी नेहा लीहे त ऊ शुद्ध ना होइहें । उनुकर हाथ राह चलत फटेहाल भिखारियो ना थामी । बिटेसवा उनुकर जिनिगी काहे तबाह क देलस ? उनुकर सुनर देहि के ऊ काहे आपन वासना के आगि में झोंकि देलस… ? ऊ अछोधार पुकाफार के रोये लगली ।

सँवरी उनुका के चुप करवली बाकिर उनुकर त रोंआ – रोंआ छटपटा – छटपटा के रोअत रहे ।

पमली भी रो पड़ली । सँवरी उनुका के रोये के कारन पूछली ।

ऊ रोते बतवली, ‘‘बारली अपना बारे में हर बात ठीक कहली हा । हम जदि ई बाचा गिरा दिही त लुका छिपा के दू – चार साल बाद हमार बिआह हो जाई बाकिर बारली के जिनिगी त जड़ से ही खतम हो गइल । इनिकर घटना पूरा देश – विदेश जानत बा । आन्हरो – लांगड़ लइका इनिका से बिआह ना कर पाई । इनिकर सभ भविष्य राखी में मिल गइल । लोग के कपार प जतने बार रही ऊ लोग इनिका से ओतने सवाल करी । हर केहूं कवनो झगरा में ई कहते इनिकर मुंह बंद कर दीही कि हमरा से का बाझत बाड़े । देखले तोरा कवनो गतरी में लाज बा तोर त खुदे इजति लुटाइल बा । ओह घरी बारली मउत मंगिहें त उनुका ना मिली । हम चाहे तू इनिकर नइखी जा पोंछ सकत लोर । नदी के पानी सभ केहूं रोक दीही बाकिर समुन्दर के पानी केहूं से ना रोकाई । बारली के आंखि में आजु सातों समुन्दर हिचकोला मारत बा । लोग के आनी – बानी आ गाभी सुनत – सुनत इनिकर कान में बड़का – बड़का घाव हो जाई बाकिर करेजा के फारे वाली बात इनिका सुनही के पड़ी आ आंखि फोर के रोवही के पड़ी ।’’

बारली के दरद जब बह गइल त उनुकर मन थिर गइल । ऊ पमली के चुप करवली । सँवरी से बारली पूछली कि एक बेर उनुकर देवर मनेस उनुकर बेलाउज प हाथ राखि देले रहन नू । ऊ खूब रोअले रही ।

‘‘हं, बाद में केसर से मनेस के डंटववले रही ।’’ सँवरी अंचरी से आंखि पोंछली ।

‘‘संवरी, अगर ओह दिन मनेस तनी आउर आगा बढ़ित त तूही कहतू कि हमार देवर हमार इजति लूट लेलस ।’’

‘‘हं, कहबे करती । जब हमनी दूनों के मरजी से संबंध बनी त पेयार कहाइत अगर खाली मनेस के मरजी से बनी त बलात्कार कहाइत ।’’

बारली सभ लइकिन मेहरारू के आपन देहि के शक्ति बढ़ावे के सलाह देली । जवन बल के प्रयोग लइका सभ करेलसन उहे बल लइकी अपना भीतरे जगावऽ सन । आपन सुरक्षा खातिर कराटा सीखल आ सोरहो घरी ललका मिरचाई के पावडर आ ब्लेड जवरे राखे के कहली ।

दूध में सभ केहूं चीनी डाल के पीयेला त कहेला कि हम दूध पीयत बानीं । अगर ओकरा में एक चुटकी चाह के पत्ती डाल दियाव त ओकर रंग बदलि जाला, कहाई कि हम चाह पीयत बानीं । असही दूध आ चीनी लेखा लइका – लइकी मिलेला त कहेला कि हम पेयार करत बानीं । अगर ऊ कुंआर लइका, लइकी के मांग में एक चुटकी सेनुर डाल देबे चाह के पत्ती लेखा लइकी के जिनिगी रंगीन हो जाला । कहिहेंस कि हम बिआहल बानी । अब दूध में चीनी आ चाह के पत्ती दूनों बा आ ओह में ऊपरे से एक चम्मच नून डाल दिआओ त ऊ नून वाला चाह केहूं ना पीही । खड़े उठा के फेंक दी । थू कइसन नूनछांह चाह लागत बा । असही लइकी पेयारो कइलस आ फेनु बिआहो कइलस बाकिर कवनो दोसर लइका नीमक लेखा ऊ लइकी के इजति लूट लेबे त खुद ओकर मरद हाथ पकड़ि के ओकरा के घर से निकाल दीही । छीः कवन अइसन लूटल – पीटल मेहरारू के घर में राखी । ओह घरी ऊ लइकी के हालत सड़क प गिरल ऊ नूनछांह चाह लेखा हो जाला जेकरा प सभ केहूं  थूके ला आ चहरि के जाला ।

एहिजा केहूं लइकी – मेहरारू के बाँझ , विधवा आ तलाक लेबल पसन आ बरदास करेला बाकिर कवनो लइकी के कुंआरी माई आ बलात्कार के शिकार बरदास ना करे । सभ केहूं ओकरा के ‘जूठ’ समुझेला । बासी भात प केहूं बेनिया ना डोलावे ।

एहिजे से जाइज आ नाजाइज के शुरूआत होला । सधवा, विधवा आ तलाक लेबल मेहरारू के बाचा के जाइज आ पेयार आ दुष्कर्म से भइल बाचा के नाजाइज के उपाधि मिलेला ।

जब कवनो लइकी ई सुनेली सन कि ऊ बिआह के पहिलहीं माई बने के बाड़ी स त सीधे आत्महत्या कर लेबेलि सन आ ना त अस्पताल जइहें स । बाकिर पमली ई कुछु नइखी कइले । ऊ आपन अजन्मल बाचा के धरती प लियावल चाहत बाड़ी । देश – कानून के उनुकर साथ निभावे के चाहीं । उनुकर होखे वाला बाचा के जाइज ‘प्रमाण पत्र’ मिले के चाहीं । ऊ बाचा के नांव के साथे उनुकर माई पमली के नांव जोड़े के चाहीं ।

‘‘चलऽ, ढेर भाषण देलू अब तू चुप रहऽ । ई देश आ कानून तोहरे इहे उल्टा – सीधा बात मानी आ जाइज प्रमाण पत्र बनी । साचो, अब तोहार दिमाग पूरा फेल हो गइल बा ।’ सँवरी हंसली ।

‘‘बारली, अइसन हो जाई त बड़ा आछा रही ।’’ पमली के हाथ पेट प जाके आपन बाचा के चलत अनुभव करत मन सरसों के पीयर फूल लेखा खिल गइल ।

‘‘अरे, जब समलैंगिक के आपस में रहे के बिआह करे के कानून बन गइल । दू गो लइकी आ दू गो लइका जिनिगी भ साथे डंका के चोट पर रहे लगलेस त जाइज प्रमाण पत्र बनि जाई त कवन पहाड़ टूटि जाई । एकरा में त माई आ बाचा के जिनिगी मिले के बात बा ।’’

‘‘बारली, तू बड़ा भोली बाड़ू ।’’

‘‘एहिसे हमरा प बलात्कार नांव के गोली लागल बिया । कवनो लइकी ना कहेली सन की ओकर इजति तारे – तार हो जाओ । जइसे मच्छड़ बिना इजाजत के काटेला ओइसही लइका – मरद बिना इजाजत के लइकी – मेहरारू के इजति लूटेलसन । केहूं ई ना कहे कि आऊं बैल हमरा मार । आऊ सांप हमरा काट, आऊ मच्छड़ हमार खून पी…।’’

बारली आपन बात एकदम ऊ दूनों जानी के सुनावे के कमर कसले रही । एहीसे उठत सँवरी के हाथ पकड़ि के बइठा देली । कहली, ‘‘कवनो बेद – पुराण, कुरान, गुरूग्रंथ साहिब आ बाइबिल में नारी के ऊपर अत्याचार करे के नइखे लिखल त फेरू ई काहे होत बा ? भगवान के सभ भक्त आउर अल्लाह के बंदा के आंखि प गंधारी लेखा पट्टी काहे बन्हाइल बा ? छोड़ ई हमार जाति धर्म के लइकी थोड़े हिय लोग ई सोचत बा । जब मुसलमान के लइकी प अत्याचार होत बा त हिन्दू लोग के आगा बढ़ि के ओह लइकी के बचावे के चाहीं, तब नू ईश्वर – अल्लाह कहिहे कि हमनी के ‘इंसान’ बना के आछा काम कइनी जा ।

‘एक पाट पे गीता दूजे पे कुरान

बोलऽ बोलऽ अल्लाह जय राम

एके कलम से लिखल सभ ग्रंथ महान

हर नारी बाड़ी आपन – आपन देश के शान ।

पमली डेराते बारली से पूछली कि ऊ जवन हेतना भाषणबाजी कइली हा अगर एकरा प बवाल हो जाए त ?

‘‘बवाल करे से पहिले लोग सोची समुझी ना कि एके लाठी से सभ हांक दीही ।’’

‘‘बुझाता तू ई भाषण आ उपदेश कवनो पुरस्कार लेबे खातिर देलू हा ।’’ सँवरी टोह लेबल चहली ।

‘‘हमरा कवनो इनाम भा पुरस्कार ना चाहीं । हम बस ई सूतल समाज के जगावल चाहत बानी । हर नारी शांत आ सुरक्षित माहौल में रहे, चले । इहे हमरा खातिर सबसे बड़का पुरस्कार बा ।’’

उनुकर जवाब सुनि के संवरी लजा गइली । फेनु ऊ कहली कि बिटेसवा पकड़ा जाई त बड़ा आछा रहित । सात बरिस जेहल में रहि के सोझ हो जाई ।

‘‘ऊ डोमवा सुधरी कि आउर बिगड़ जाई । जेहल से छुटी त रोज एगो बलात्कार करी ।’’

‘‘बारली, आपन खीस काबू में राखऽ ।’’

‘‘काबू, हूं । हम ओकरा गोली से भूंजे के फेर में बेकाबू होत बानी आ तू…। ओइसन पापी के त बीच चउराहा प फांसी प लटकावे के चाहीं आ ना त ओकरा के आन्हर भा नपुंसक बनावल जाओ । सभ दुष्ट सोचत बाड़े स कि चलऽ सात साल के सजे नू मिली बाकिर बलात्कार करे के मजा त मिल जाई । ऊ मजा ऊ सभनी के अंतिम सांस तक के सजा बन जाए । जइसे लइकी भर जिनिगी छटपटात लोर में लपेटाइल रहेली सन । कानून आ सरकार बस अतने भ दुखी होला कि बड़ा खराब भइल, अपराधी के सजा बहुते जल्दी मिली जाई । बाकिर होला का ? कब सजा मिली ? कवनो पते नइखे । बस, तारीख पड़त रहो वकील के पाकिट गरम होत रहो । केस पूरा करे में वकीले बुढ़ा जालन ।’’

‘‘अरे बाप रे । सांझि हो गइल ।’’ पमली उठि गइली ।

हरवाहा सभनी के आपन गाय – भइंस घरे ले जात देखि के ऊ चिंहुक पड़ली । सिन्दुरिया रंग के सूरज भगवान आपन रोशनी समेटत दूर आकाश में डूबत रहन । चिरईं चहचहात दिन भर के थाकल – माँदल आपन – आपन घोंसला के देने गते – गते उड़ान भरत रह स । थोरकी दूरिया प सड़क किनारे टंगाइल पियरकी बल्ब के टिमटिमात रोशनी में बारली के आंखि में अभी ढेर सवाल देखि के ऊ काल्हु सभ बात कहे के आ अभी घरे चले के निहोरा कइली ।

तीनों जानी अभी अधे दूर अइली जा त पमली तनी दूरे से आपन भइया आ बाबूजी के आवते देखली । ऊ लोग कवनो लइका के घसीटते आ पीटते दूसरकी गली में ले जात रहन । ऊ हाली से भिरी पहुंचली त पिटात लइका के देखि के उनुकर करेजा धक से करि गइल ।

आपन फुलल थोबड़ा से पमली के देखते माधव दउड़ के उनुकर गोड़ छानि लेलन – ‘‘पमली,  हमरा के बचा ल । तोहार बाप – भाई हमरा के मुआ दीही ।’’

धोखेबाज प्रेमी के देखि के उनुकर जीऊ लहरत रहे । इहे भगोड़ा प्रेमी के कारण ऊ खून के लोर रोअत बाड़ी आउर अपमान के नदी में रोजे हजार डुबुकियां लगावत बाड़ी । मुंह से कुछु उरेब बोलल चहली बाकिर जाब लागि गइल रहे मुंह में ।

‘‘साला, तू अभी के अभी हमार बहिन से बिआह कर । सोचत बाड़े कि एकर बाप – भाई मरि गइल बा आ तू खुला घूमत बाड़े ।’’

‘‘हं… हं, हम बिआह करब बाकिर बाद में । तू लोग हमरा के मत मारऽ जा ।’’

‘‘ससुर, हमनी के चरावे चलत बाड़े ।’’ बाबूजी के चटकन पड़ल गाल प माधव के,  ‘‘अभी ई देबी जी के मंदिर में हमार बेटी से बिआह कर ।’’

बगले में काली माई के मंदिर रहे । बाबूजी घसीटते माधव के मंदिर में लिअवलन । पमली के कुछु बुझाते ना रहे कि ई अचके कवन जादू भा चमत्कार होत बा ।

सँवरी – बारली सभ तमासा देखत रही ।

मूरती फटाफट पंडी जी से काली माई प के चढ़ल दू गो अरहुल फूल के माला देबे के कहले  । ऊ कैमरा वाला के भी बोला लेलन । फिल्मी इस्टाइल में पमली के ना हरदी लागल ना मेहंदी इहां तक कि ऊ साड़ियों में ना रही । समीजे सलवार पहिनले काली माई के सोझा आपन जिनिगी के बड़का जंग जीते जात रही । पंडी जी मंत्र बोललन आ माधव – पमली एक दोसरा के माला पहिनावल । काली माई प के चढ़ल सेनुर उठा के माधव पमली के मांग बहोर देलन, ‘‘तू आजु हमार प्रेमिका से मेहरारू हो गइलू । ई होखे वाला बाचा के हम आपन नांव देत बानी ।’’

सेनुर पड़ते पमली के आंखि से खुशी के फूल झरे लागल । दूनों जना भइया – बाबूजी के गोड़ छुअल । खूब – खूब आसीरबाद मिलल । सँवरी – बारली अंकवारी भरि के पमली के बधाई दिहली जा ।

ई अनोखा बिआह देखे खातिर मंदिर में ठेलम ठेल भीड़ भइल रहे । बारली सँवरी के कान में फुसफुसइली, ‘‘पमली के होखे वाला बाचा अब जाइज हो गइल नू ।’’

‘‘हं, हो । इहे त एक चुटकी सेनुर के कमाल बा जेकरा आगा सभ धन – दउलत बेकार बा । आजु पमली आ उनुकर होखे वाला बाचा के एकरे चलते जीवन दान मिलि गइल । बहरी जवन ई भीड़ बिआह देखत बा इहे गवाह ह ई अनोखा बिआह के । एकरे के समाज कहल जाला । मूरती भइया से कहि के पूरा भीड़ के मुंह मीठा करवा द ताकि पमली के बिआह के खबर सभ लोग के कान तक चहुंप जाए ।’’

मिठाई, बतासा, लकठो आ गुड़ के जलेबी खा के सभ केहूं बाह – बाह करे लागल ।

पमली के माधव के जवरे डेग भरत आ उनुकर मांग में चमकत पियरका सेनुर देखि के सभ केहूं अचरज में पड़ल रहे ।

‘‘चाचाजी, ई रवा बहुते आछा काम कइनी कि माधव के लिया के पमली के जिनिगी संवार देनीं ।’’ घरे पहुंच के सँवरी खुशी से कहली ।

‘‘ई सभ बारली के वोजह से भइल हा । उनुकर कहल बाति कि लइकी कुंआरी माई बनेले त लइका भी कुंआर बाप बनेला । ई सुनि के हमनी बाप – बेटा के दिमाग खुलल । अगर इहे बात हम पहिले बुझ जइती आ आजु वाला काम पहिलही कइले रहती त हमार मेहरारू आजु जिंदा रहित ।’’ बाबूजी डबडबा गइले ।

बारली के करेजा हुलस पड़ल, ‘‘चाचा जी, रउआ अभी माधव के घर जमाई बना के इनिकर खातिरदारी करीं । जब लइका – फइका हो जाई त माधव के घरवाला बेटा – पोता के मोह में पड़ि के पमली के अपना लीहें ।

तब माधव, एहिजा पमली के जवरे रहब कि दोसर बिआह करे खातिर भागबऽ ?’’

‘‘बारली, अइसन कहि के तू हमरा के आउर जमीन में मत गाड़ऽ । हम सभ लोग से खास क के पमली से माफी मांगत बानी कि हमरा से बहुत बड़ गलती हो गइल रहे, जवन माफी मांगे लायक नइखे फिर भी हमार देहल धोखा के ई माफ करसु । ई हमार हथजोरी बा ।’’ माधव के दूनों हाथ पमली के आगा जुड़ गइल, ‘‘अब हम कवनो उल्टा काम ना करब जे से तोहार बदनामी होखे । पहिले हम हर लइकी के दू रूपे खिली पान समुझत रहीं,  इस्तेमाल करऽ आ फेंक द बाकिर लइकिन दू रूपे खिली पान ना होलीसन बलुक चलत करेजा के सांस होलीसन । हम आपन गलती सुधारल चाहत बानीं ।’’

उनुकर डबडबाइल आंखि में पछतावा देख पमली के मन भर गइल ।

दोसरा दिन सँवरी – बारली दूनों जना के उपहार दिहली जा । सँवरी, पमली के साड़ी पहिरे के सिखावत रही ई देखि के सुगनी कहलसि,  ‘‘दिदिआ, साड़ी के फनगा में लपेटा के गिरिहे मत…।’’

सभे के साथे मूरती भी ठठा के हंस पड़ले ।

पमली के चरचा अपना घर में सुनि के जात बारली केवाड़ी के ओट के पीछे थथम गइली । नानी आ माई अपने में पमली के बिआह होखे से बड़ा खुशी से उनुकर भइया आ बाबूजी के सराहत रही जा । नानी इहां तक कहली कि ई बारली बबी के कहल बात के असर भइल हा । सोच में डूबल पिताजी के मुंह से निकलल कि कम से कम एगो बेटी के जिनिगी त बनल । अब देखी हमार बेटी के का होत बा ? कहते उनुकर लोर बहे लागल । बारली भी फफक के अपना कमरा में भाग चलली ।

सँवरी आपन घर के काम धान्हा में लागल रही । का जाने कहवां से भुलाइल भटकल केसर के आपन सोझा देखि के उनुकर होसे गुम हो गइल ।

ऊ उनुकर गोड़ छानी लेलन, ‘‘सँवरी, हमरा छमा क द । हम तोहरा के बहुते दुख देले बानी । चलऽ घरे । तोहरा के लिआवे आइल बानी । हमरा कवनो रूपिया भा राजदूत ना चाहीं । बस तू जवरे चलऽ ।’’

‘‘ई रउआ का करत बानीं ? छोड़ीं हमार गोड़ । हमरा के नरक में का भेजब ?’’ सँवरी आपन गोड़ छोड़ावे लगली ।

‘‘तोहार गोड़ पकड़ि के त हम वैतरणी पार होखल चाहत बानीं । जब तकले तू हमरा के छमा ना करबू हम तोहार गोड़ ना छोड़ब ।’’

‘‘आछे – आछे ठीक बा । हम रउआ के माफ कइनीं । हमार गोड़ छोड़ीं ।’’ सँवरी हाली से कहली ताकि केसर उनुकर गोड़ छोड़स ।

केसर के विश्वास ना भइल, ‘‘ना, तू झूठ बोलत बाडू़ । तू हेतना जल्दी हमरा के माफ ना करबू । हम तोहरा के कतने दुख तकलीफ देले बानीं ।’’

‘‘हम रउआ से कबो झूठ बोलले बानी कि आजु बोलब । हम माफ कइनीं… माफ कइनी रउआ के ।’’ सँवरी आपन गोड़ छोड़ा लेली  । पुछली, ‘‘रउआ जेहल में रहनी नू ?’’

केसर बतवलन कि दहेज के मोमिला में माई – बाबू पहिलही पकड़ा गइल रहले । भागत – भागत में ऊ धरइलन । जब पुलिस के डंटा उनुकर कपार प पड़ल त दहेज नांव के डाइन जवन  कुंडली मार के सांप लेखा बइठल रहे ऊ लहुलुहान भइल आपन लुगा सम्हारत भागल । दू – चार बेंत में ऊ बेराम पड़ि गइलन । कसहूं बेल प छूटल बाड़े ।

सँवरी के हाथ पकड़ि के ऊ आगे कहले, ‘‘हमार दहेज त तू हऊ, सँवरी । मति मारल गइल रहे, अपना माई –  बाबूजी के उसकवला में पड़ि के तोहरा प जुलुम ढ़हनी । उहो लोग के हम काहे दोस दीही । पढ़ल – लिखल होके भइंस चरावे वाला बुधी रहे हमार । चलऽ, जवन भइल से भइल भूला जा । अपना घरे चलऽ । हमार बाचा अपना घरे होई ।’’

सँवरी पिघिलली ना । हाथ छोड़ा लेली, ‘‘बिना सभे से राय – सलाह कइले हम रउआ जवरे ना जाइब ।’’

पमली – बारली अइली । माई – बाबू आ दूनों जानी सलाह देलस कि ऊ ससुरा जास । केसर के रंग – ढंग देखस ।

‘‘अगर रउआ लोग के हमरा प विश्वास नइखे त हमरा नांव से सनहा लिखवा दीही ।’’ केसर कहले ।

‘‘सनहा त पहिले लिखाई । बाकिर अब सँवरी के कवनो दुख ना होखे के चाहीं ।’’ बारली चेतवली ।

‘‘रउआ लोग निहचिंत रहीं ।’’

दोसरा दिन केसर बिना राजदूत आ रूपिया ले ले सँवरी के एगो साड़ी में ले गइले । ऊ सच में बदल गइल रहन । सँवरी केस आपस लेके सास – ससुर के छोड़ा देली । ऊ सुख से ससुरा में रही बाकिर हर घरी उनुकर धेयान बारली प रहत रहे । हरमेसा फोन प उनुकर हिमत बान्हस । पमली माधव के साथे हरमेसा बारली से भेंट करे आवत रही ।

बारली एकदम घर में बंद रहत रही । उनुकर डेग बहरी निकलते ना रहे । पुलिस के मेहरबानी रहे कि दू महीना बादो बिटेसवा पकड़ाइल ना रहे ।

*****

भादो के हरतालिका तीज आवे के रहे । पमली आपन सुहाग के रक्षा खातिर तीज करे के तइयारी में रही । बगल के चाची से पवडुकिया बनावे के सभ विधि पूछ लेले रही । बाबूजी साड़ी कीने के पइसा देले रहन । ऊ माधव के जवरे बारली के घरे गइली कि ऊ बाजार चलि के उनुका खातिर साड़ी पसन क देस । उनुकर करेजा खुदे कुहुंकत रहे बाकिर उनुकर जिद का आगा जाये के तइयार भइली । लता फुआ भी उनुका जवरे गइली ।

बाजार चार किलोमीटर दूर रहे । सभ जना टेम्पू से गइल । अचके टेम्पू हड़हड़ात बाजार से आधा किलोमीटर एनिये रूकि गइल । बीच राही कवनो मिस्त्री रहे ना । सभ जना उतरी गइल सड़क के दूनों ओर आम – इमली के पेड़ आ दूर तकले खेत लउकत रहे । हलुक घाम रहे आ मीठ – मीठ बयार बहत रहे । सभे के मन खुश भइल आ पैदल चले के फैसला लिआइल । चारों केहू बतियावत चलल जात रहे ।

अचके लतरी हाथ के खेत के देने से पकड़ – पकड़ के सोर सुनाइल जवरे हवा में ठांय – ठांय के आवाज होखे से पेड़ प के बइठल चिरईं डेरा के चिचिआते एने – ओने उड़े लगली स ।

कवनो चोर भागत रहे ओकरा पकड़े खातिर पुलिस आ दू – चारि गो अदमी धान के खेत में दउड़त रहे ।

ऊ चोर भागते –  भागते सड़कि प आ गइल ताकि रिक्सा – टेम्पू प चढ़ि के दूर भाग जाईं तले ओकर नजर पड़ल बारली प । ऊ ओकरा देखते चिचिआ पड़ली ‘बिटेसवा…’ सभ जना के हड़कंप मचि गइल ।

पुलिस के अपना भिरी आवत देखि के ऊ फटाक से बारली के पकड़ उनुकर गरदन से एगो तेज धार वाला बड़का छूरा सटा देलस ।

‘‘अरे दरोगा, जदि हमरा पकड़े बदे गोली चलइबे त ई बरलिया के नरेटी चीर देब।’’

बिटेसवा के छुरी के नोंक प अइले बारली के देखि के सभ केहूं के हक्का – बक्का टंगा गइल । पमली लता के पकड़ि के थरथरात रही । हदसे लतो के मुंह से आवाज गुम हो गइल रहे । पुलिस के जवरे जीतन, विश्वजीत आ दू – तीन गो आदमी रहसन ।

‘‘बिटेसवा, तू बारली के छोड़ि दे । तोरा केहूं कुछु ना करी ।’’ विश्वजीत डेराइले कहलन ।

‘‘हमनी के तोरा प कवनो केस ना करब जा । हमार बहिन के छोड़ि दे ।’’ जीतन बारली के मउत के सोझा देखि के कांपत रहन ।

‘‘बाह रे ललचवे मरलस जान । हमरा के लालच में फंसा के तू हमार जान लेबसन ।’’ बिटेसवा बारली के गरदन में आउर छूरा गड़ा देलस ।

उनुकर करेजा धक – धक करत रहे । साँस ऊपर नीचे टंगाइल रहे । हाथ – गोड़  जोर – जोर से थरथरात रहे, ‘कहीं ई हमरा मुआवे मत…।’

बिटेसवा कहलस बारली से, ‘‘साला भगवानो आजु हमरा प खुसे बा जवन हमरा राह में तोरा अइसन सुनर लइकी के हमरा बाचे खातिर आ तोर दोबारा सुनरई लूटे खातिर भेजि देलस ।’’

‘‘छोड़बे कि ना रे हमरा के कुतवा, पिलुअहवा, निस्तनिया, तोरा के गुह में झडुआ भींजा के मारलो जाई त कम होई रे, मूतपियना ।’’ बारली आपन पूरा देहि के शक्ति से बिटेसवा के हाथ छोड़ावत रही ।

‘‘हम तोरा के छोड़ब ? ओह दिन तोरा के छोड़ि के गलती कइनी जवन हमरा पीछे पुलिस दरोगा के कुता नियन छोड़ देले बाड़े । हम ओह दिन से मारल – मारल फिरत बानीं । अब जहवां जाइब तोरा के संगे ले जाइब । ओह दिन तोर अन्हरिया गोदाम में नू इजति लुटले रही बाकिर आजु सभन के सामने दिने – दुपहरिया में तोर हम बलात्कार करब ।’’ ऊ बारली के कान्हा प के कपड़ा फाड़ देलस आ उनुका पकड़ले पाछा माहे घसके लागल ।

बारली के करेजा एक छन खातिर रूकि गइल, ‘का ई हमार दुबारा इजति लूटी ? हम हर घरी एकरा हाथ से लूटात रहब । आजु हमार जान जाओ त जाओ । मरब त मरब बाकिर आजु आपन दुबारा इजति ना लूटे देब । ई हमरा के जीअते में नू लूटी, मर गइला प थोड़े हमार लास के साथे आपन आग बुझाई । आजु भा त हम मरब ना त एकरा के अइसन मुआइब कि एकरा नरको में पनाह ना मिली । एकरा के मुआ के चाहे खुदे मर के हम देखा देब कि अभी लइकी कमजोर नइखी सन । सरवन भइया, हमरा के शक्ति द कि हम ई पापी के हाथ से बची…।’

पुलिस – दरोगा के साथे सभ लोग के परान सांसत में पड़ल रहे । सांस रोकले सभे के सोझा एगो राछस मुंह बवले सवाल ले ले खाड़ रहे, ‘का अब फेरू बारली के ई…?’

लोग के करेजा उछलत बहरी त आवते रहे बाकिर पुलिस के हाथ में बनूक रहला का बादो ऊ लोग के कठमुरकी लागल रहे ।

जीतन, माधव आ विश्वजीत, बिटेसवा प कूदे के सवार रहन । बाकिर ऊ एकदम चउकस बारली के गरदन में छूरी गड़वले पीछे माहे घसकत जात रहे आ ऊ पूरा शक्ति से ओकर मजबूत हाथ छोड़ावत रही ।

पीछे पाँकी रहे आ मोरी बहत रहे । पीछे माहे चले के वोजह से बिटेसवा के गोड़ उबड़ – खाबड़  जमीन प पड़ि गइल जेकरा से बारली के नरेटी प तानल ओकर छुरी वाला हाथ तनी सुन ढीला पड़ि गइल । ढीला पड़ते बारली आपन दूनों हाथ से ओकर हाथ कस के पकड़ली आ अईंठ के ना आव देखली ना ताव ओकरे हाथ से पकड़ल छुरी धके सीधे ओकर पेट में घुसेड़ देली । पेट के भीतर तेज धार वाला छूरी घुसते फचाक से खून फेंक देलस आ ऊ ओही मोरी – पाकी में  छपाक से गिर के मारे दरद से  आह… आह… करते  छटपटाए लागल ।

‘‘हम तोरा के मुआ घालब… तोरा के ना छोड़ब… तू हमार इजति के बखिया उधेड़ले रहिस आजु हम तोर सभ अतड़ी पचउनी के बखिया उधेड़ … ।’’ बारली बकते बिटेसवा के पेट से छूरी निकाल ताबड़तोड़ पेट में घुसावत ओकर अखरेरे जान लेत रही ।

खून के छींटा से उनुकर पूरा मुंह – देहि भरि गइल ।

पाँकी खून से सना गइल आ बिटेसवा के गंदा खून मोरी में बहे लागल । पेट के अतड़ी – पचउनी सभ बहरी छितराइल रहे । बारली आपन शक्ति से एगो पापी राछस के कइल घिनावन काम के आछा इनाम देली । जमराजो बिटेसवा के अइसन मउत देखि के अपना इहां ले जाये से मना क दीहे ।

जब ऊ देखली कि एकर अब सांस नइखे चलत त छुरी फेंक देली । मुंह में जेतना थूक आ खखार भरल रहे ऊ बिटेसवा के मुंह आ देहि प पच से तीन – चारि बेर थुकली । ओढ़नी में आपन मुंह पोंछि के दरोगा के आगा आपन हाथ क देली, ‘‘दरोगा जी, हमरा के हथकड़ी पेहनाईं । हम एगो पापी के ओकर पाप से अंत कइनी हा । अइसन दुराचारी के मुआ के हम सभ लइकी के इजति के रक्षा कइनी हा । हमरा कवनो अफसोस नइखे ।’’

दरोगा आपन रिवाल्वर कमरपटी में राखि के बारली के हाथ नीचे क देलन, ‘‘तोहरा हाथ में हथकड़ी ना बलुक गरदन में गुलाब के फूल के माला पहिनावल चाहत बा । जवन आजु तू एतना हिम्मतवाला काम कइलू हा । चलऽ जीप में बइठि जा ।’’ फेनु ऊ सिपाही के कहले, ‘‘फोटोग्राफर से फोटो खिंचवा के ई लास के पोस्टमार्टम खातिर भेज द लोग ।’’

दरोगा बारली के लेके चलि गइलन । पाछा से सभ केहूं थाना दउड़ल ।

सभ कागजी कार्यवाही भइल । बारली के जेहल से छोड़ावे खातिर पूरा

गांव एड़ी – चोटी के जोर लगा देलस । बिटेसवा के मरे से सभ केहूं खुश रहे बाकिर बारली के जेहल में जाये से लोग चिंता में पड़ल रहे कि पता ना अदालत उनुका के कवन सजा दीही ।

अखबार में बारली के हाथे बिटेसवा के मउत के खबर प्रमुखता से छपाइल ।

सँवरी बीस दिन के भइल आपन बबुआ के लेके केसर जवरे जेहल में अइली । उनुका के देखि के रो पड़ली, ‘‘सखी, ऊ पपिया के मार के तू ठीक काम कइलू हा बाकिर तोहरा कपार प फांसी के तलवार लटकत बा ।’’

‘‘अरे, त का भइल ? फांसी मिली त मिली ।’’ बारली एकदम लापरवाह रही ।

‘‘बारली तू… ।’’ सँवरी फफक पड़ली । टुकुर – टुकुर उनुका के ताकत रही ।

ऊ एकदम शांत आ खुश होके उनुकर बबुआ के खेलावत रही, ‘‘तब हो सँवरी के बेटा सुरूज, का हाल बा ? आपन ई बारली मउसी के चिन्हत बाड़ऽ ? तू त अभिये से गोर हो गइल बाड़ऽ हो । हमार गोरइपन चोरा लेले बाड़ऽ । सँवरी, हम तोहार बेटा के नांव राखि देनी सूरज । आछा काम करि के हमनी सभ के नांव चमकइब नू सूरज… ।’’

‘‘हूं…।’’ ऊ हुंकारी परलन ।

माई, नानी, फुआ, सँवरी आ पमली उनुका छूटे खातिर सभ देबी – देवता आ छोट – बड़ सभ मंदिर में सोना के आंख चढ़ावे के मनता मनले रही जा काहे से कि बारली सभे के आंख के पुतरी रही ।

रोजे ऊ लोग उनुका से जेहल में भेंट करें आवस । माई – नानी  ढ़रऽ – ढ़रऽ रोअस जा, ‘‘बबी, तू काहे आपन हाथ खून से रंग लेलीस । पता ना तोरा कवन सजाये होई ?’’

‘‘तू लोग रोअ जा मत । अगर फांसी के सजाये हमरा मिलि जाई त हम शहीद कहाइब । एकरा से बढ़ि के आउर का इनाम हो सकत बा हमरा खातिर । ओइसन राछस के मारे खातिर त हम हर जन्म में बारली बनल चाहत बानी ।’’ उनुकर अइसन बाति सुनि के ऊ लोग के करेजा आउर ककड़ी लेखा फाटत रहे ।

पिताजी बड़का से बड़का वकील कइलन । केस शुरू हो गइल ।

पमली के भारी देहि से हाली कवनो काम ना होत रहे बाकिर ऊ कसहूं हाली – हाली घर के काम सुगनी के जवरे निपटावत रही । पिताजी – भइया कचहरी जाये से उनुका मना कइले रहन बाकिर ऊ आपन जिद प एक दू बेर कचहरी जाके बारली के अदालती कार्यवाही देखले सुनले रही ।

भोरे से उनुका तनी – तनी दरद होत रहे । ओही दरद में ऊ बारली खातिर घीऊ में के बेसन के हलुआ बना के मूरती से जेहल में भेजवा देले रही । जब उनुकर दरद बरदास के बहरी होखे लागल त सुगनी से कहि के बाबूजी के कान में चहुंपवली । उनुकर दरद के खबर सुनि के बिना बोलवले मोहल्ला के दू गो मेहरारू दउड़ली सन ।

बाबूजी आ माधव बिना देर कइले जीप में पमली के लाद बड़का अस्पताल भगलन ।

अस्पताल पहुंचला अभी एको घंटो ना भइल रहे कि चाची दउड़ल बाबूजी लगे अइली, ‘‘बधाई ए डाकडर साहेब, राउर नाती भइल नाती । जल्दी से मुंह मीठा कराईं ।’’

‘‘तरेगन के माई, तोहरा हाथ में जस होखे बड़ा बढ़िया समाचार सुनवलू हा । ल रूपिया, अपना साथे सभ दाई – नर्स के मुंह मीठा करवावऽ ।’’ बाबूजी से रूपिया ले ऊ चलि गइली ।

माधव दवाई लेके अइलन । बाबूजी उनुका के अंकवारी भरि लेलन, ‘‘पाहुन, रउआ एगो बबुआ के पापा बनि गइनीं ।’’

‘‘सच बाबूजी ।’’ माधव झूमि गइले ।

2 – 3 घंटा बाद पमली के होश में आ गइला प उनुका जनरल वार्ड में लिआवल गइल । कपड़ा में लेपटाइल गोल – मटोल, करिया – करिया बार, ओठ एकदम गुलाबी, छोटी – छोटी आंख, फुलल गाल, माधव लेखा ओंठ के ऊपर बड़का तिल आपन पेयार के चिन्हासी बेटा के देखि के पमली के मन जुड़ा गइल ।

चाची बाबूजी के गोदी में लइका थमा देली, ‘‘देखऽ बबुआ, तोहार ई नाना हवन ।’’

‘‘अले ले ले बबुआ, हम तोहार नाना…।’’

उनुकर चमकत नोह आ रोआं से भरल बन्हाइल मुठ्ठी के माधव गते से छुअलन त उनुका मन में झुरझुरी समा गइल । बाचा के मुठ्ठी खोलि के आपन एगो अंगुरी पकड़वलन त ऊ कसके पकड़ि लेले, ‘‘बबुआ, हम पापा हईं ।’’

ऊ आपन नन्हीं – नन्हीं आंखिन से मुलु – मुलु पलक खोलत बंद करत ई अंजोर संसार के देखत रहन । करिया – करिया आंख चारों तरफ घुमावत जइसे माधव से कहत रहन, ‘देख, लीहीं पापा, आजु हम आपन माई के हिमत के कारन ही ई धरती प गोड़ रखले बानीं । ई मैदाने जंग में हमार आ माई के बहुते बदनामी भइल बा । हम रउआ से वादा करत बानी कि राउर परछाईं हमरा प कबो ना पड़ी । ई जिनिगी के राह में राउर ना बलुक माई के अंगुरी पकड़ के चलब हम ।’ बबुआ, माधव के अंगुरी छोड़ पमली के ओर आंखि घुमा देलन ।

बाबूजी बबुआ के आपन गरदन में के पहिनल सोना के सिकड़ी पहिना देलन, ‘‘बबुआ, तोहरा अइला से हमार घर – दुआर सभ रोशन हो गइल । तू आपन अच्छाई के महक से ई संसार में सुगंध फैलइहऽ । हम तोहर नांव चंदन राखत बानी । पमली, चंदन बढ़िया नांव बा नू ?’’

‘‘ह बाबूजी !’’ खुशी से उनुकर आंख लोरा गइल । ऊ माधव से गते से कमजोर आवाज में कहली, ‘‘बारली से चंदन के भइला के खुशखबरी दे दऽ ।’’

‘‘सूखले – सूखले थोरे देब । मिठाई के जवरे नू दिआई ?’’ ऊ चंदन के गोदी में ले लेलन ।

*****

पाँच – छव बेर के सुनवाई के बाद केस के फैसला हो गइल । जज आपन फैसला सुनवलन कि दुबारा आपन इजति आ जान बचावे खातिर बारली एगो अधम के मारि के कवनो अपराध ना कइली हा । अदालत उनुका के बा इज्जत बरी करत खुशी महसूस करता ।

सभे के मुंह प खुशी के लहर दउड़े लागल । सभ एक दोसरा से खुशी बांटे लागल ।

जीतन फोन करि के माई के खुशखबरी देलन । बारली के रिहाई खातिर नानी घर में महामृत्युंजय के जाप करवावत रही । खुशी के मारे माई आ नानी भोले शंकर आ घर के मनुष्य देव – सोखा बंदी के मूड़ी पटक – पटक के धन्यवाद देबे लगली ।

अदालत के बहरी सभे के साथे बारली एगो बेंच प बइठल बस के असरा में रही । सँवरी आ पमली अपने में मजाक करत रही जा कि दूनों जानी फेरू से माई बने के तइयारी करस ताकि आवे वाली बहिन सूरज आ चंदन के राखी बांधस ।

केसर  – माधव पान खाये चलि गइलन । पिताजी बाथरूम । जीतन चाह – नास्ता लेबे गइले ।

बारली के मन में पता ना कवन खिचड़ी पाकत रहे । ऊ एकदम गंभीर बइठल कवनो सोच में पड़ल रही ।

बगले में एगो ठेला वाला बड़का – बड़का पपीता आ तरबूजा बेचत रहे । ऊपरे से हरियर आ भीतरे लाल तरबूजा के देखि के गहकी खूब कीनत रहन ।

बड़का छूरा से पपीता – तरबूजा काट पतईं के ठोंगा में रख ओह प नीमक छिरिक – छिरिक ऊ दोकनदरवा कहत जात रहे, ‘पांच रूपिया में पपीता आ तरबूजा खा लऽ सस्ते में पेट भर लऽ ।’

एगो आउर छूरा तरबूजा में खोंसल रहे । बारली बड़ा धेयान से ऊ कटत तरबूजा के देखते सोच में डूबल रही,  ‘असहीं हमरो जिनिगी हो गइल बा । हमहूं हर छन हर पल ई तेज धार वाला छूरा से कटात रहनी – छटपटात रहनी । जजो साहेब के पता ना का सूझल कि उहां के हमरा के छोड़ि दिहनीं । हम त फांसी मिले के सोचले रही । ताकि ई दाग लेबल देहि से हमरा मुक्ति मिली जाइत । सच में हमरा छुटला के इचिको खुशी नइखे । का केस जीतला का बाद हम समाज में मूड़ी उठा के चल सकत बानी ? जेतने हम राम के नांव नइखी ले – ले ओतने बलात्कार के नांव ले – ले बानी । कइसे हमार भविष्य सुधरी ? कइसे हम आगे पढब़ …? ओह ! … सोचते – सोचते बुझाता हम पगला जाइब । चलऽ फांसी ना मिलल ना सही, बाकिर हम ई जिनिगी काहे ना अपना हाथे खतम क दी ।’ मन के हहरत दरद में ऊ जिनिगी खतम करे के सोच लेली ।

तले दोसर मन कहल, ‘ना सरवन भइया आत्महत्या के पाप बतवले बाड़े । हम आत्महत्या ना करब । बाकिर हमार जिनिगी में अब कुछु बांचलो त नइखे…।’

तबहीं विश्वजीत उनुका लगे अइलन । उनुकर मन में चलत विचार के ऊ था लगा ले ले रहन । एही से ऊ बड़ी देर से उनुका के एकटक देखते जात रहन । पता ना कवन झोंक में आके ऊ बारली से एगो अइसन बाति कहले कि ऊ एकदम खाड़ होके चिचिया पड़ली, ‘‘तोहार दिमाग खराब हो गइल बा ? हाथ धरते – धरते पहुंचा धरे के कोशिश करे लगलऽ….।  हम तोहरा के आछा लइका समुझत रहीं बाकिर तू…तू हो बिटेसवे के जाति – भाई निकल लऽ ? दूर हो जा हमार नजर से….।’’

‘‘का भइल बारली, का भइल….?’’ सँवरी – पमली दउड़ के उनुका भिरी अइली ।

पिताजी आ जीतन एकदम सकेत में पड़ि गइलन जा कि अइसन कवन बात विश्वजीत कहि देलन कि बारली उनुकर तुलना बिटेसवा से करे लगली । अभी तकले उनुकर बेयवहार से अइसन ना लागल रहे कि उनुका मन में बारली के प्रति कवनो गंदगी बा । ऊ त हर घड़ी उनुकर साथ निभवले रहन ।

आधा – आधा राति तक वकील के जवरे बइठि के सलाह – मशवरा करत रहन कि कसहूं बारली छूट जास । फिरू ई का कह देलन ?

पिताजी आगा बढ़ि के विश्वजीत से पूछले, ‘‘बबुआ, तू कवन बात बबी से कह देल हा कि ई एतना खिसिआ गइल बिया ?’’

‘‘रउआ इनिके से पूछ लीहीं ।’’ विश्वजीत कहले ।

पिताजी बारली के देने मूड़ी घुमवलन । ऊ खीस में अपने खउलत रही । ओही खीस में बकली, ‘‘ई कहत बाड़े कि तू हमार जीवनसाथी बनबू ? बताईं पिताजी रउए…।’’

‘‘बबी…।’’ पिताजी के आंखि में बुझाइल दुनिया के हर खुशी समा गइल । उनुकर आंखि मोती अस चमके लागल, ‘‘बड़ करेजा वाला ही ई बात कह सकत बा ।’’

‘‘बाकिर पिताजी…।’’

तबहीं विश्वजीत में पता ना कहवां से एगो अलोपित शक्ति आ गइल आ ऊ बारली के दूनों कान्हा पकड़ि के खूब झकझोर देलन, ‘‘हं, हम तोहरा के आपन जीवनसाथी बनाइब । हम तोहरे से बिआह करब । हम माँगत बानी तोहार हाथ । तोहर जान सभे खातिर बहुते कीमती बा । आजु हर लइकी – मेहरारू के तू प्रेरणा स्रोत बाड़ू । तोहार हर शब्द आ बात में ऊ शक्ति बा जेकरा से लोग अब जाग गइल बा । आजु तू आपन हौंसला आ विश्वास से जितलू हा । तू हमार संगिनी बनऽ, ई हमरा खातिर बहुते गर्व के बात होई । ई नेयाय के मंदिर में हम सभे के सामने तोहरा के स्वीकार करत बानी । ई समाज में तोहरा के मूड़ी उठा के हम चलाइब । तोहार बहत लोर हम पोंछब । तोहार सिसिकत जिनिगी में हम भरब खुशी के रंग । हम विश्वजीत । हमार माई – बाबू तोहरा के अपनावस भा ना बाकिर हम तोहरा के अपनावत बानी । हम तोहरा के आगे पढ़ाइब, आगे बढ़ाइब ।’’

सँवरी – पमली, बारली के पीठ प हाथ फेरली जा, ‘‘सखी, तोहरा प्रति विश्वजीत के मन में खूबे आदर आ इजति भरल बा । अइसन ऊँचा सोच के आदमी सई में से एके मिलेला । ई जानत – बूझत तोहार हाथ पकड़त बाड़े एह से ई कबो तोहरा के धोखा नइखन दे सकत । इनकर अच्छाई  आ सच्चाई सभ तोहरा सोझा बा । तू दू कदम आगा बढ़ि के इनिकर हाथ थाम लऽ । आपन बरबादी भुला के एह आवे वाली खुशी के आपन अंचरी में भरि लऽ ।’’

कबे से दिल – दिमाग के बीच मचल घमासान में बारली के कुछु बुझाते ना रहे । सभे केहूं हं में मूड़ी डोलवलस । उनुकर चेतना लउटल आ हिम्मत बढ़ल, ‘‘विश्वजीत, हम तोहरा के पति रूप में स्वीकार करत बानीं । तू हमार सपना, हमार कैरियर बनइबऽ एकरा से बढ़ि के हमरा खातिर कवनो खुशी नइखे । आजु ई दिन के हम ‘जीत पर्व’ के रूप में मनाइब  ।’’

‘‘ना बारली, हमनी के आजु ई दिन के ‘विजय पर्व’ के रूप में मनावल जाई । अइसे जीत पर्व कहऽ भा विजय पर्व बात एके बा । तोहरा जरिए आजु पूरा नारी समाज आ सारा मनुष्यता के विजय भइल बा । तू आपन मजबूत इच्छा शक्ति से सपना पूरा करे में जुटऽ । हम तोहार हर डेग प मदद करब । हमरे लेखा एगो लइका तोहार जिनिगी बरबाद कइलस बाकिर हम तोहरा के अब आबाद करे के बीड़ा उठवले बानी ।’’ विश्वजीत के आंखि में बारली खातिर बेपनाह इजत झलकत रहे ।

पिताजी उनुकर हाथ पकड़ि के बिलख पड़लन, ‘‘बबुआ, हमार बेटी के नया जिनिगी दे के तू हमार सातों पुस्त के तार देलऽ । तू बहुते महान बाड़ऽ ।’’

‘‘अइसन मत कहीं बाबूजी, आजु हर लइकी के होंठ प अपना बरबाद होखे के सिसकी सुनात बा । ई काम हमनी सभ लइका के करे के पड़ी तबे हमनी पुरूष के जन्म लिहल सार्थक होई ।’’ कहते विश्वजीत उनुकर लोर पोंछ देलन ।

खुशी से जीतन उनुका के बांहि में भरि लेलन ।

मुसुकाते बारली, सँवरी आ पमली के करेजा से लागि गइली । सँवरी आ पमली भी वादा कइली जा कि आजु ई दिन के उहो लोग विजय पर्व के रूप में मनाई काहे से कि उहो लोग आपन जिनिगी में विजय हासिल कइले बा ।

आसमान से बूंदा – बांदी होखे लागल । जइसे लागत रहे सभ देवी – देवता आपन खुशी के लोर फूल नियन आसमान से धरती प बरसावत होखसु कि आजु हर नारी जीत गइली सन । आपन मन के इच्छा शक्ति से !

एने सूखाइल लाल – पीयर गुलाब के पौधा प हरहरात बूनी बरसे लागल । ऊ आपन झोरी में आशीर्वाद समेटत फेरू हरिआए खातिर तइयार होखे लगले स ।

 

*****  समाप्त  *****

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