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– नीतू सुदीप्ति ‘नित्या’

गतांक से आगे …

( 4 )

 

केसर पंडीजी से दिन देखवा के सँवरी लगे खबर भेज दिहले कि ऊ दस दिन बाद दोंगा करवावे आवत बाड़े ।

सँवरी के माई – बाबू सँवरी के दोंगा में देबे खातिर सभ सामान पलंग, कुरसी, अलमारी, खाजा, मिठाई आउर सभ लटर – पटर जुटावे लगले ।

केसर सँवरी के लेबे अइले । अपना ससुर से कहले,  ‘‘बाबूजी, काल्हु हम सँवरी के ले जाइब ।’’

‘‘ठीक बा पाहुन, हम देबेवाला सभ सामान जुटा देले बानीं । राउरे इंतजार होत रहे ।’’ बाबू कहले ।

‘‘हमरा डियूटी जाये में बड़ा देर हो जाला । एगो राजदूत मिलित…।’’ केसर जानि बुझि के बात आधा कहले ।

बाबू ना हूं कहले ना हं कहले, चुपचाप कसार वाला दउरा के रंगीन कागज से तोपि के बान्हे लगले ।

सँवरी बिमली के भेजि के पमली – बारली के बोलवली आ खुदे खुशी से आपन कपड़ा – लत्ता बक्सा में सरियावे लगली ।

‘‘काल्हु चल जइबू, सँवरी ?’’ पमली आवते पूछली ।

‘‘हँ ।’’ सँवरी हंसि के कहली ।

‘‘हमनी के इयाद करऽबू नू ?’’ बारली उदास होके पूछली ।

‘‘इहो कहहीं के पड़ी । आछा, ल ऽ लोग मिठाई खा । तोहार जीजाजी लिआइल बानीं ।’’ सँवरी मिठाई देते कहली ।

ओही घरी केसर ओहिजा अइले । दूनों जानी उनुका के परनाम कइली ।

‘‘आछे सँवरी, हमनी के जात बानीं जा, काल्हु बिदाई घरी आइब जा ।’’ पमली कहली ।

‘‘काहे ? बइठीं जा ।’’ केसर कहले ।

‘‘ना जीजाजी, जब से हमनी के सुनले बानी जा कि सँवरी काल्हु चलि जइहें त मन कुछ दुखी बा…।’’ बारली आवते आंखि के लोर पीअत कहली ।

‘‘ई आवे – जाये के त लागले रही । जब सँवरी के बिआह भइल बा त इनिका ससुरा जाही के पड़ी ।’’ केसर के बाति प पमली – बारली धेयान ना देली आ चलि गइली लोग ।

दोसरा दिन बिदाई के घरी बारली सँवरी से पूछली,  ‘‘सँवरी, कुछु छूटत नइखे नू ?’’

‘‘ना । बस तू ही दूनों छूटत बाडू ….।’’ कहते – कहते सँवरी रो पड़ली ।

रोके – रोआ के ऊ केसर जवरे चलि गइली । उनुका गइला का बाद पमली आ बारली चुप होखे के नाँवे ना लेत रही ।

‘‘मत रोव लोग हो दिदिया लोग मत रोव । तूहूं लोग बहुत जलदिये ससुरा जइबू जा ।’’ बिमली मुसुकाते कहली त पमली – बारली रोअते – रोअते हंसे लगली जा ।

सँवरी आपन सास – ससुर के गोड़ छू के घर के भीतरी चलि गइली ।

बाबूजी गते से केसर से पूछले,  ‘‘बबुआ, राजदूत ना मिलल हा ?’’

‘‘बाबूजी, तू चिंता जन करऽ । हम ससुर से कहनी हा । उनुका राजदूत देबे के पड़बे करी ।’’ केसर बाबूजी के निहचिन्त कइले ।

राति में केसर अपना कमरा में गइले । देखले सँवरी अभी तकले रोअते बाड़ी । उनुका भीरी ऊ जा के कहले,  ‘‘अब तनी रोअल बंद करऽ । सखी – सहेली आ माई – बाबू से हेतना ना दिल लगावे के । जा के खा – पी लऽ । ना त लोग समुझिहें कि तू कवनों दूसर लइका खातिर रोअत बाड़ू ।’’ केसर हंसे लगले ।

‘‘रउवा मजाक बुझाता ? हम झूठों के रोअत बानी ?’’ सँवरी आपन लोर पोछते कहली ।

‘‘ना हो हमार सजनी, ई सांचो के लोर ह । अब तनी खिआवऽ । भूख लागल बा आ अपनहूं खाये के ले ले अइहऽ ।’’ केसर मुसुका के पलंग प ओठंग गइले ।

ऊ सँवरी के मुंह में पूड़ी – खीर खिआवते कहले,  ‘‘असही कबो – कबो तनी हमरो के खियावल करिह ऽ ।’’

उनुकर पेयार पा के सँवरी निहाल हो गइली ।

ऊ नीमन पतोहि लेखा चारे बजे भोर में उठि के घर के सभ काम – धान्हा में लागि गइली । सास – ससुर आउर मरद के सेवा में तन – मन से जुटि गइली ।

एक दिन ऊ आपन छोटकी सयान ननद चनकी से पूछली,  ‘‘आछे चनकी जी, हमार बिआह आ दोंगा में होतना सामान मिलल हा त सभे कोई खुश बा नू ?’’

‘‘ना भउजी, माई – बाबूजी आ भइया सभे राजदूत खातिर बहुते खिसिआइल बाड़े जा । भइया त सोचले रहले कि दोंगा में मिली बाकिर ना मिलल हा…।’’

‘‘अगर ना मिली तब…।’’

‘‘मिली काहे ना । हमार भइया तहार बाबू से कसहूं राजदूत ले के रहिहें ।’’ चनकी कहि के टी0 वी0 देखे लगली ।

‘ओहीसे सास – ससुर हमरा के कबो – कबो राजदूत खातिर ओरहन देत बाड़े जा । बाकिर हमरा ओरहन देला से ई लोग के राजदूत थोड़े मिल जाई ।’ सँवरी अपना मन में सोचली ।

सँवरी के छोटका देवर मनेस उनुका से खूब लागल रहत रहन । उनुका से खूब मजाको करस बाकिर सँवरी के ई सभ बड़ी खराब लागत रहे । एक दिन मनेस कवनो बाति प सँवरी के खूब हंसा देले । हंसते – हंसते उनुकर माथ प के आंचल नीचे गिरि गइल । ऊ अंचरा उठावे खातिर नीचे झुकली त उनुकर छाती देखि के मनेस प पगलपन चहर गइल । आ उहे झोंक में ऊ आपन हाथ सँवरी के बेलाऊज प रख देले ।

सँवरी के करेजा कांप गइल,  ‘‘ई रउवा का करत बानीं ? हटाईं आपन हाथ । रूकीं राउर भइया से कहत बानीं ।’’ ऊ एक झटका से उनुकर हाथ हटाके गरजली । ऊ मनेस के अइसन खराब हरकत प उनुका के कस के एगो चमेटा धरावल चहली बाकिर खून के घोंट पी के रहि गइली ।

‘‘भउजी, का जाने हमरा का हो गइल हा । बाकिर ई बात भइया से मत कहि ह ऽ ना त ऊ हमरा के मारे लगिहें ।’’ मनेस कहि के ओहिजा से भगले ।

सँवरी दिन भर सोच में डूबल रहली कि मनेस अइसे काहे कइले हा ? सांझि खा ऊ केसर से मनसे के डटंववली । ओह दिन से ऊ मनसे से बतिआवल छोड़ि देली । बस काम से बोलसु ।

असही दिन चिरई लेखा उड़त गइल ।

एक दिन बाबूजी केसर से कहले,  ‘‘केसर, तोर बिआह के अब साल – माथ लागी, बाकिर अभी तकले तोर ससुर राजदूत ना देलस ।’’

‘‘अब उनुकर बेटी प लगाम कसब ।’’ केसर बोलले ।

‘‘जब एगो लइका के बाप बनि जइबे तब कसबे ?’’ माई सँवरी के मारे – पीटे खातिर केसर के उसुकवली ।

‘‘जहिया सँवरी हमरा हाथे चहर जाई ओह दिन आपन सभी खीस ओकरा प निकालि देब । एकर बाप एक लाख रूपिया का दे देलस समुझत बा कि बहुत ढ़ेर दे देनी हा ।’’ केसर अपना असली रंग में कहले ।

 

एने पमली बारली से बतियावत रही,  ‘‘बारली, सँवरी के ससुरा गइला कतने महीना हो गइल बाकिर ऊ अभी तकले हमनी लगे एगो चिट्ठियों ना भेजली हा ।’’

‘‘ऊ जीजाजी के पेयार में हमनी के भुला गइल बाड़ी । आछे पमली, उनुकर बिआह के अब एक बरिस होई नू ?’’ बारली पूछली ।

‘‘हं, होई । चलल जाओ सँवरी के लगे बिआह के साल लगला के कार्ड देबे ।’’ पमली राय देली ।

दूनो जानी शादी के सालगिरह के एगो कार्ड कीनि के, ओकरा प बधाई लिखि के सँवरी के ससुरा डाक से भेजि देली जा ।

अब केसर सँवरी के मारे – पीटे खातिर कवनो – कवनो उसकुन निकाले लगले । आ ओह दिन उनुका सुजनी मिलि गइल जब पमली – बारली के भेजल कार्ड उनुका मिलल । ऊ कार्ड पढ़ि के सँवरी लगे जाके कहले,  ‘‘सँवरी, तहार दूनो सखी बिआह के एक साल भइला प कार्ड भेजले बाड़ी जा ।’’

‘‘का पमली – बारली कार्ड भेजली हा जा ? हमार बिआह के एक बरिस हो गइल ?’’ सँवरी खुश हो के कहली ।

एने पमली आ बारली कवलेज के मैदान में बइठि के बेदाम खात रही । खाते – खाते अचके दूनो जानी के खूब सरके लागल ।

‘‘ई.. हेतना जोर से कबो …सरके …काहे … लागेला … ?’’ पमली खांसते पूछली ।

‘‘जब कोई आपन इयाद… करेला तबे एतना जोर से सरकेला…। बुझाता… हमनी के भेजल कार्ड सँवरी के…मिलि गइल… बा । ऊ हमनी के…खूबे नाँव लेत होइहें…। एहिसे हमनी दूनों कोई के एहिजा…एतना सरकत बा…।’’ बारली खांसते – खांसते कहली ।

‘‘अरे ! सँवरी के बिआह भइला आजुये नू एक बरिस भइल । ऊ जीजाजी जवरे खूबे खुश रहसु । इहे हमनी के भगवान जी से निहोरा बा ।’’ पमली मने – मने भगवान जी के गोड़ लागते कहली ।

‘‘हं । ऊ हमेशा हंसत – खिलखिलात रहसु । इहे मनाईं जा ।’’ बारली खुशी से बोलली ।

एने केसर सँवरी के बिना कार्ड देखवले ओकरा के आगि में झोंक देलन । सँवरी हइसे कार्ड जरत देखि के हाली से ओकरा के आगि में से निकाल के बुतावत केसर से कहली,  ‘‘काहें रउवा ई कार्ड के आगि में डाल देनी हां ?’’ लगनी के चीज ह ।’’

‘‘लगनी ना कपार के ह…।’’ केसर सँवरी से ओह आधा जरल कार्ड के छिनि के दोबारा आगि में डाल देले आ एगो कस के चमेटा उनुका के मरले,  ‘‘आजुये बिआह के एक साल भइल आ तोर साला बाप अभी तकले हमरा के राजदूत ना देलस ।’’

अचके चमेटा खाते आ केसर के बिछकुतिया जइसन रंग बदलत देखि के सँवरी के आंखि में लोर भरि गइल,  ‘‘हमार बाबू होतना देले कि ना ? बिआह में जेतना करार रहे रउवा सभ मिलल हा…।’’

‘‘राजदूत मिलल ह, रे…?’’

‘‘राजदूत के करार ना रहे । पूछीं अपना बाबूजी से…।’’ सँवरी रोअते – रोअते कहली ।

‘‘बाबूजी से हम ना पूछब । तू जइबे अपना बाप से पूछे…।’’ केसर आपन बेल्ट निकालि के सँवरी के बाम उखाड़े लगले ।

‘आही बाबू… आही दादा… बचाव ऽ लोग…।’’ सँवरी खूब रो – रो के चिलात रही ।

उनुकर सास आजु आपन सपूत बेटा प बड़ा खुश रही,  ‘‘आउरी मार बबुआ, एकरा के । मारते – मारते एकर देहि तूरि दे ।’’

केसर के मन सँवरी के बेल्ट से मरला के बादो जब ना भरल, त लकड़ी के आगि से उनुकर हाथ जार देले । सँवरी के आजु आपन दहेज लोभी सइंया के तरफ से शादी के पहिलका सालगिरह प बढ़िया उपहार मिलि गइल । जेके ऊ कबो सपनों में ना सोचले रही । ऊ आपन लहरत हाथ ले के खूब रोअत – रोअत सूति गइली ।

सास भोरहीं उठि के खूब हाला करे लगली,  ‘‘अरे बहोरना के जामल, दिन भर सूतले रहबे… ? काम कवन करी, तोर बा…?’’

सँवरी से उठल ना जात रहे । पिटाई के ओजह से उनुकर सभ देह दुखात रहे । ऊ कसहूं उठि के घर के काम धान्हा कइली । उनुकर जवन हाथ जरल रहे ओमे बड़का फोरा हो गइल रहे आ खूब लहरत रहे ।

केसर डियूटी जाये के तेयार होत रहले । सँवरी आपन हाथ उनुका से देखावते कहली,  ‘‘रउवा, काल्हु हमार हाथ जार देले रहनीं हा । दवाई लेते आईं ।’’

‘‘जो जाके अपना बाप से पइसा मांग । हमरा लगे नइखे ।’’ केसर कहि के उठल फोरा के ध के जान के फोरि देले आ सान से डियूटी चलि गइले ।

फोरा फूटते सँवरी दरद से चिचिआए लगली । फेनु रोअते सास लगे गइली ।

सास गारी से बात करे लगली,  ‘‘अरे मुँहझउँसी, एक त तोरा के हम पेट में खिआई आ ऊपर से दवाइयों कराई ? जो अपना भीरी से कराऊं ।’’ सँवरी के आँखि से लोर गिरे आ हाथ में दरद होखे । फेरू ऊ अपना बक्सा में से पचास रूपिया के नोट निकालि के मनेस लगे गइली । उहो पहिले टार देले । तब सँवरी आपन हाथ उनुका के देखावते कहली’  ‘‘देखीं, हाथ जर गइल रहे । आ फोरा फूटि गइल हा । ई पचास गो रूपिया लीहीं आ एकरा सुखाये वाला गोली आउरी एकरा प लगाये वाला मलहम लेते आईं जवन रूपिया बाची ऊ राख लेब ।’’

मनेस तनी भउजी के दरद से पसिजले । जाके दवाई कीनि के उनुका के दे देले । बाकी के बीस गो रूपिया अपना बगली में रखि के चल दिहले ।

सँवरी गोली खइली आ मलहल लगवली तब दरद आ लहर पटाइल ।

तीन – चार दिन बाद केसर डियूटी जाये से पहिले सँवरी से कहले कि आजु अपना बाप के भिरी चिट्ठी लिख दीहें कि हम राजदूत मांगत बानीं ।

सांझि खा ऊ डियूटी से आवते सँवरी से पूछले,  ‘‘बाप के भिरी चिट्ठी लिख देले ?’’

‘‘ना ।’’

‘‘काहे ?’’

‘‘हमरा लिखे ना आवेला…।’’ सँवरी के बात प केसर उनुकर गरदन पकड़ि ले ले,  ‘‘मैट्रिक पास बाड़े आ तोरा चिट्ठी लिखे नइखे आवत ? चल अभी हमरा सामने लिख ।’’

‘‘हम ना लिखब…।’’

‘‘ना लिखबे ? अभी हम तोरा के बतावत बानी ।’’ केसर सिगरेट जरा के पीये लगले आ धुआं सँवरी के मुंह प छोड़े लगले ।

‘‘रउवा, सिगरेट बहरी… जाके पीहीं…।’’ सँवरी खांसते कहली ।

‘‘ई तोर बाप के घर ह ? हमरा जेने मन करी ओने पीअब । चल लिख…।’’

‘‘हम ना लिखब ।’’ सँवरी जिदे प रही ।

‘‘रूक अबे बतावत बानीं…।’’ केसर कलम लेके सँवरी के दू गो अंगुरी के बीच लगा के कस के दबवले,  ‘‘अभियो ना लिखबे ?’’

दरद से छटपटात सँवरी तबो नाहिये कहली । तब केसर जवन सिगरेट पीअत रहले ओह सिगरेट से सँवरी के दूनों हाथ जरावे लगले ।

ऊ आपन हाथ छोड़ावते दरद से छटपटात कहली,  ‘‘अब मत जराईं… अब मत जराईं…।’’

दस – पनरह जगहा छोट – छोट जरि गइल । केसर सँवरी से चिट्ठी लिखे के फेनु पूछले । तब ऊ हं कहली । ऊ अंचरा से आपन लोर पोछि के चिट्ठी लिखली । जब चिट्ठी लिखा गइल तब केसर उनुका से पढ़ि के सुनावे के कहले ।

सँवरी चिट्ठी पढ़ली,  ‘‘माई – बाबू के मालूम कि तहार पाहुन राजदूत मांगत बाड़न…।’’

‘‘हरामी, असहीं चिट्ठी लिखाला रे…?’’ केसर चिट्ठी सुनि के सँवरी के जोर से चमेटा मरले । फेनु ऊ चिट्ठी के फारि देले आ सँवरी के पीठ प दू मुक्का मारते गरजले,  ‘‘काल्हु मनेसवा के जवरे नइहर चलि जइहें आ अपना बाप से राजदूत के रूपिया मांग के लेले अइहें ।’’

‘‘हम ना जाइब । हमरा बाबू लगे पइसा नइखे । ऊ त अपने हमार बिआह में भिखार हो गइल बाड़े…।’’ सँवरी भूंइया गिरते कहली ।

‘‘घर बेच के दी तोर बाप ।’’ केसर कहि के चलि गइले आ सँवरी आपन भाग्य प बिलिख – बिलिख के रोये लगली ।

केसर भोरही मनेस के जवरे सँवरी के नइहर भेजि देले ।

उनुका के ई दसा में देखि के माई – बाबू घबड़ा गइले । ऊ माई के अंकवारी में भरि के रोते -रोते राजदूत के सभ बाति कहली ।

‘‘हाय रे भगवान ! ई का भइल ? ऊ जलिमवा हमार बेटी के मारि – पीटि के भेजि देलस…।’’ माई छाती पीटि – पीटि के रोये लगली ।

‘‘बबी, तोर सास – ससुर कुछु ना कहले हा ?’’ बाबू दुखी मन से पूछले ।

‘‘सासे – ससुर त उहां के उसुका के हमरा के पिटवावेलन जा…।’’ सँवरी रोअते रोवत बतवली ।

‘‘आहे बुचिया, तनी कुछु खा ले । हमनी के सोचत बानीं जा कि का कइल जाई ?’’ माई सँवरी के लोर पोछि के उनुका सांत कइली । ऊ कल प मुंह – हाथ धोये चली गइली ।

‘‘सँवरी के माई, अभी हेतना जलदी अतना रूपिया के जोगाड़ कइसे होई ?’’ बाबू पूछले ।

‘‘कसहूं जोगाड़ करहीं के पड़ी । ना त ऊ हमार बेटी के मुआ दीही..।’’ माई रोये लगली ।

‘‘हमरा लगे अभी पचास हजार रूपिया नइखे आ राजदूत बिना पचास हजार रूपिया के एने ना मिली ।’’ बाबू आपन मजबूरी कहले ।

‘‘ओखरी में मूड़ी पड़िये गइल बा । अब रउवा घर बेचीं, दुआर बेचीं आ चाहे हमार सभ गहना बेचीं बाकिर ओतना रूपिया के जोगाड़ क के दे दीहीं …।’’

‘‘हेतना हाली त कोई घरो ना कीनी बाकिर देखत बानीं ।’’ बाबू घर के कागज लेके बहरी चलि गइले आ माई आपन सभ गहना सरियावे लगली ।

पमली आ बारली जब कवलेज से घरे अइली तब ओह लोग के सँवरी के अइला का खबर मिलल । दूनो जानी बिना खइले हाली से सँवरी से भेंट करे गइली लोग ।

ऊ उदासे बइठल रही । पमली आके पाछा से उनुकर आँखि तोप देली ।

‘‘छोड़ ऽ लोग ।’’ सँवरी गते से कहली ।

‘‘कब अइलू हा ?’’ पमली हाथ हटावते पूछली ।

‘‘आजुये अइनी हा ।’’

‘‘हमनी के भेजल कार्ड मिलल रहे ?’’ बारली खुश होके पूछली ।

‘‘हं ।’’

‘‘तब जीजाजी जवरे खूब सालगिरह मनइलू नू ?’’ पमली चहकि के पूछली ।

‘‘उहे त दिन मनहूस रहे…।’’ सँवरी रोये लगली ।

उनुका के अइसे रोअत देखि के पमली – बारली घबड़ा गइली जा,  ‘‘सँवरी, तू रोये काहे लगलू ?’’

बाकिर ऊ कवनो बाति ना बतलवली । ऊ जानत रही कि हम मारल – पीटल के बात ई दूनों जानी के बतलाइब त ई लोग के बड़ा दरद होई । तबले बिमली दूनों जानी से सभ बात कहि देली ।

‘‘का जीजाजी, तहरा के मार के भेजनीं हा ?’’ पमली चिहा के पूछली ।

‘‘सँवरी, जीजाजी हेतना बदमास बानी ? ऊ तहरा के बेल्ट से मारत रहले…।’’ कहते बारली के आँखि भरि गइल ।

‘‘जवन मरद अपना मेहरारू के हेतना मारत बा ओकरा के त तलाक दे देबे के चाहीं…।’’ पमली के आँखि से लोर गिरे लागल ।

तबहीं बारली के नजर सँवरी के हाथ प गइल जवन लकड़ी आ सिगरेट से जरल रहे । ऊ समुझ गइली । कहलीं,  ‘‘सँवरी, केसर तहरा के हाथ जारि – जारि के मारत रहले ?’’

‘‘तू जीजाजी ना कहलू हा… ?’’ सँवरी बारली के टोकली ।

‘‘जवन आदमी हमनी के सखी के ई दसा कइले बा ओकरा के जीजाजी ना कपार कहब जा…।’’ पमली रोये लगली ।

‘‘दे द ऽ सँवरी, केसर के तलाक…।’’ बारली कहि के सिसिक पड़ली ।

‘‘ना हो ई भारत देस ह भारत । एहिजा मेहरारू मरद के गोड़ के चपल रहेली सन, माथ के टीका ना । एहिजा मरद अपना मेहरारू के मारि – पीटि दीहें त उनुका कुछु ना होई । ई बिदेस ना ह कि मरद से एगो चमेटा खइला का बाद मेहरारू तलाक ले लीह ऽ सन । ई भारत ह भारत । एहिजा मरदन के राज बा । मेहरारू त ऊ सभ के गुलाम बाड़ी स । तलाको लेवल आ चाहे मरद से  अलगो रहला प लोग मेहरारू के बढिया नजर से  ना देखेला । मेहरारू के बढ़ियों बात मरदन के गारी लागेला ।’’ सँवरी समुझवली ।

‘‘त ऊ राजदूत लेला प सांत हो जइहें ?’’ पमली पूछली ।

‘‘एकदम ना । ऊ आउरी मंगिहे ।’’ बारली बोलली ।

‘‘तू दोनों जानी हमार देवर से बतिअइह ऽ जा मत’। ऊ बहुते बदमास बाड़े’। तू लोग कुंआर बार बाड़ू’।’’ सँवरी पमली आ बारली के मनेस से चेतवली ।

‘‘ऊ कुछु कइले का रहले हा ?’’ बारली पूछली ।

‘‘हं। एक दिन ऊ हमार बेलाऊजे प हाथ राख देले रहले…।’’

‘‘का ? तू डंटलू ना ?’’ पमली पूछली ।

‘‘हं, डंटले रहनी आ तोहार जीजाजी से डंटवा देले रहनी । बाकिर हम इनिका से हमेसा हरकले रहीना ।’’ सँवरी बोलली ।

घर ना बेचाइल । बाबू खाली हाथे घरे आ गइले ।

( 5 )

 

माई, बाबू के गहना आ रूपिया देते कहली,  ‘‘ई हमार सभ गहना बा, एकरा के  बेचि के आ बिमली के नांव  से रउवा से चुपके हम दस हजार रूपिया जमा कइले बानीं, ई सभ सँवरी के दे दिहल जाई।’’

‘‘तबो त कमे बा। ई कुल्हि मिला के पच्चीस हजार रुपिया ले होई  ।’’ बाबू जोड़ि के कहले ।

‘‘माई, तू हमार बिआह मत करिहे…।’’ बिमली आके माई से कहली ।

‘‘काहे बुचिया, का भइल हा ?’’ माई घबड़ा के पूछली ।

‘‘जीजाजी लेखा हमरो मरद दहजे खातिर मारी…।’’ बिमली रोअते रोवते  कहली । तबहीं भोला ओहिजा अइले आ खीस में कहले,  ‘‘बाबू, हम दिदिया से बड़ रहती नू त साला जिजवा के कालर पकड़ि के ऊ मार मरतीं कि मये रुपिया माँगल भुला जाइत ।’’

‘‘ना बबुआ, अइसे ना कहे के । ऊ तहार जीजाजी हवे ।’’ बाबू समझुवले ।

‘‘जीजाजी हवें एहिसे दिदिया के लकड़ी आ सिगरटे से हाथ जारि – जारि के मरिहें ?’’ भोला कहि के रोये लगले ।

सँवरी के ई हाल प उनुकर छोटका भाई – बहिन प बहुते खराब असर पड़ि गइल रहे ।

राति में पमली आ बारली अपना – अपना घरे बिछौना प सूति के रोवत रही जा – ‘केसर कतना बदमास बा । जवन सँवरी के जवरे सात गो फेरा लेके आपन मेहरारू बनवलस, मांग में सेनुर डललसि । उनुके के हेतना मारत – पीटत बा । का मरद मेहरारू के सात गो तरीका से मारे खातिर सातों वचन निभावेलसन ? बिआह में ऊ ओतना लेलस तबो एगो राजदूत खातिर सँवरी के जीयल मुहाल कइले बा । मेहरारू घर के सभ काम करेली सन । आपन मरद खातिर तीज – तेवहार करे लीसन आ बेटा – बेटी पैदा करेली सन । आखिर ऊ कलु – खानदान केकर चलावे लीसन, आपन भा आपन मरद के ? केसर के जेतना दिआइल ओतना में ओकरा संतोखे नइखे । का ऊ अपना कमीनी से राजदूत भा कवनो सामान नइखे कीन सकत ? कब तकले सँवरी के माई – बाबू ओकरा के दीहें ? जब तकले जीय तब तकले सीय, इहे रेवाज रही । आखिर कोई त ई रेवाज बदले ।’

बिहानो भइला तकले आउरी रुपिया के जोगाड़ ना भइल । बाबू, मनेस के पच्चीस हजार रुपिया देते कहले,  ‘‘बबुआ, अपना भइया से कहि हऽ कि कसहूं एतने रुपिया के जोगाड़ भइल हा । ऊ अपना भीरी से आउर कुछु रुपिया मिला के फटफटवा गाड़ी कीन लेस । तनी हमार बेटी के पिटाये मत दीहऽ…।’’ बाबू के आँखि भरि गइल ।

‘‘आछे माई, जात बानीं ।’’ सँवरी कहली ।

‘‘दू – चार दिन रह जइतिस ।’’ माई आपन लोर पोछते कहली ।

‘‘जवन काम से आइल रहनीं हा ऊ त हो गइल ।’’ सँवरी कहि के माई – बाबू के गोड़ लगली । पमली – बारली देखली कि मनेस बेग में रुपिया राखत बाड़े । सँवरी सभे से मिलि के ससुरा चलि गइली ।

सास दुआरे प खाड़ रही । सँवरी के देखते पूछली,  ‘‘रुपिया लिअइले ?’’

‘‘हँ ।’’ सँवरी कहली ।

तब ऊ उनुका के भीतरे जाये दिहली । केसर डियूटी से आवते सँवरी के देखि के गरम हो गइले,  ‘‘रुपिया लेके अइले ?’’

ऊ चपु चाप सभ रुपिया उनुका के दे देली । होतना रुपिया देखि के केसर खुश हो गइले,  ‘‘केतना बा ?’’

‘‘पच्चीस हजार…।’’

पच्चीस हजार के नाँव सुनि के केसर के सभ खुशी आगि में जरि गइल,  ‘‘आधा काहे बा ?’’

‘‘हमार बाबू के भिरी अब आउरी रुपिया नइखे । ई सभ रुपिया माई के गहना बेचि के आ बिमली के बिआह के रुपिया मिला के बा । रउवा अपना लगे से आउर रुपिया मिला के राजदूत कीन लीहीं ।’’  सँवरी डबडबाइल आँखि से बोलली ।

‘‘अब हम तोरा के बेचि के राजदूत कीनब…।’’ केसर खीसिया के कहले ।

ओह दिन त ऊ चुप रहले बाकिर फेनु तीन – चार दिन बाद सँवरी से नइहर चिट्ठी लिखि के रुपिया मांगे के कहले ।

‘‘पच्चीस हजार से संतोख करीं ।’’ सँवरी कहली त केसर खिसिया के सभ रुपिया घुमा के फेंक देले आ सास झट से सभ रुपिया उठा के अपना लगे राख लिहली ।

केसर राजदूत खातिर सँवरी के जबे – तबे पीट देत रहले । फेनु ऊ पिटा गइली । ऊ रोअते सास लगे रुपिया मांगे गइली ।

‘‘हम ओह रुपिया से चनकी के गहना बनवा देनी ।’’ सास जवाब देली ।

‘‘रउवा हमार रुपिया दीहीं, हम बाबू के दे दीही ।’’ सँवरी आपन रुपिया माँगे लगली ।

‘‘हम ना देब । का करबे ?’’ सास गरजली ।

‘‘रउवा लोग के एक लाख रुपिया आ होतना सामान से पेट ना भरल हा कि हमार बाबू के सभ हड़पे चलल बानी…..?’’

ई  बाति प सास लहरि गइली आ सँवरी के एक चटकन धरावते चिचिअइली,  ‘‘ठहर आवे दे  केसरा के आजु  तोर खाल नोचवावत बानी । कहत बाड़े कि हमनी के तोर बाप के सभ धन -दउलत हड़प गइल बानीं जा ।’’

सांझि खा केसर अभी घर में गोड़ राखते बाड़े कि माई फुंफकरली,  ‘‘केसरा, आपन मेहरारू के तू लगाम लगाऊ । ऊ हमनी सभ के हड़पे वाला कहत बिया ।’’

केसर के तरवा के लहर माथा पे चहरि गइल । ऊ तमतमइले सँवरी लगे गइले । ओह घरी ऊ तरकारी बनावत रही । केसर छलनी लेके दनादन उनुका के पीटे लगले । ऊ कुछु ना समुझली । बाप – बाप चिचिआए लगली । पिटाते – पिटाते उनुकर बांधल बड़का जूड़ा खुलि गइल । अब केसर उनुकर बड़का – बड़का बार के पकड़ि के घसीटते माई लगे लिअइले आ उनुका के झोंटा लेसार – लेसार के खूब मारे लगले,  ‘‘कुतिया, तू हमनी सभ के हड़पे वाला कहले हा । मांग सबसे माफी…।’’

‘‘त कवन गलती कहनी हा…।’’ सँवरी दरद से तड़पत गंगा – जमुना के लोर बहावते कहली।

एतना बाति प त सास – ससुर आ केसर मिली के सँवरी के खूब मुअनी के मार मारे लगले जा।

‘‘माई जी, हमरा के मत मारीं… बाबूजी, हमरा के हेतना जन मारीं… हमरा के छोड़ि दीहीं लोग…।’’ सँवरी ओह दुष्टन के गोड़ पकड़ि – पकड़ि के अपना हेतना ना पीटाये के रो – रो के हथ जोरि करत रही । बाकिर काहे के जे केहू उनका पर मोहावे जाव । केसर जवन सँवरी के सुन्नर बार के खूब बड़ाई करत रहले आजु ओह बार के आपन हथियार समुझले रहले ।

ऊ हांफते कहले,  ‘‘साली ई चमरचिटही, जलदी मुअतो नइखे । का जाने एकर बाप एकरा के कवन चक्की के आटा खिअइले बा ?’’

‘‘भइया, भउजी मरि जाई त तहरे जेहल में जाके गेहूंम पीसे के पड़ि जाई ।’’ चनकी चनाक से बोलली ।

‘‘हं बबुआ, एकरा के ढे़र मत मार ना त ई मर – हर जाई त अपना नइहर से खूब रुपिया कइसे लिआई ।’’ माई केसर के रोकली ।

‘‘टीबियो, फ्रिज एकर बाप खराबे देले बा । ध के इहो सभनी के तूरि देत बानीं ।’’ केसर टी0 बी0 फ्रिज तूरे चलले त बाऊजी मना क देले,  ‘‘केसर, ई सभ के तूरि के का होई ? ई सभ चनकी के बिआह में दे दिहल जाई । तुरहीं के बा त ई हरमिनिया के देहि तूर । तब ई अपना बाप से रुपिया मांगी आ ऊ एकर दरद देखि के दीही ।’’

जब सभ कोई सँवरी के पीट – पाट के ओहिजा से चलि गइल आ ऊ आपन किस्मत प आँखि फोरि – फोरि के रोवत रही त मनेस ओहिजा अइले ।

सँवरी के हाथ से जहां खून बहत रहे ऊ ओहिजा आपन हाथ राखि के कहले,  ‘‘भउजी, भइया तहरा के खूबे नू मारत बाड़े ।’’ सँवरी कुछु ना कहली । ऊ मनेस के हाथ हटाके गते –  गते उठली आ आपन कमरा में जाये लगली । उनुका से चललो ना जात रहे । ऊ देवाल ध के गते – गते जात मन में सोचली, ‘जब हम पिटात रहीं, त ओह घरी मनेसवा हमरा के बचावे ना आइल हा । अब हमदरदी देखावत बा । कहीं हमार हाथ धरते – धरते पहुंचा ना धर लेबे  ?’

अब सास – ननद के पहरा सोरहो घरी सँवरी प पड़े लागल । उनुका छत प गइल, कोई से बतिआवल सब मनाही हो गइल । ओह लोग के डर रहे कि जेतना हमनी के सँवरी के मारत – पीटत बानीं जा ऊ केहू से कहसु मत । सिकाइत मत करसु । खूब उनुका प सास – नंनदा चले लागल । ऊ घर भर के सभे लोग के कपड़ा फीचस बाकिर कपड़ा पसारे छत प चनकी जात रही ।

ऊ खाये बनावत रही बाकिर उनुका बासी – तेवासी खाये के मिलत रहे । आ जब तकले ऊ खाये बनावसु तब तकले चनकी ओहिजा बइठल रहत रही कि कहीं भउजी लुका – छिपा के दू गो रोटी दबावस मत ।

सँवरी दिन में खाये बनाके ऊ दहेज लोभियन के पेट के भूख मिटावत रही आ राति में आपन सूखल देहि से केसर के वासना के भूख । असही उनुकर जिनिगी साइकिल के पंचर टायर जइसन जइसे – तइसे घसीट – घसीट के दरद भरल लोर के सहारे चले लागल ।

एने एक दिन बारली पमली से कहली,  ‘‘पमली, सँवरी ओह दिन से ससुरा गइला का बाद अभी तलुक कवनो चिट्ठी पतरी ना भेजली हा ।’’

‘‘हं हो, का जाने ऊ कइसे होइहें ? हमही चिट्ठी से पूछत बानी ।’’ पमली कहि के ओही घरी सँवरी लगे चिट्ठी लिखली आ भेजि देली ।

चिट्ठी सँवरी के सास के मिलल । ऊ पढ़ि के फाड़ि देली ।

सँवरी के  माइयो – बाबू  सँवरी के चिन्ते में रहले । बिमली आ भोला दिदिया लगे कतने चिठ्ठी भेजले जा, बाकिर केसर सभ पढ़ि – पढ़ि के फाड़ दते रहले । सँवरी के पतो ना चलत रहे कि उनुकर नांव के चिट्ठी सास आ केसर दुआरिये प फाड़त बाड़े ।

****

 

पमली आ बारली जब कवलेज आवत – जात रही जा त दूसर कवलेज के एगो लइका दूनो जानी प खूब ताकत रहे । एक दिन ऊ पमली के देखि के हंसि देलस त पमलियो मुसुका देली । उनुकर मुसुकाइल बारली देखि लेली ।

घर आके ऊ पमली के खूब झरपेटली,  ‘‘बोका लइकी, राह चलत खानी हंसल आ मुसुकाइल जाला ? आयँ…। हंसलू त फंसलू आ मुसुकइलू त गइलू । आजु चेता देत बानीं अब कवनो लइका के देखि के हंसलू भा मुसुकइलू त । परीक्षा आवत बा, इयाद नइखे करे के ।’’

‘‘आछे हो दादा, अब हम हंसब भा मुसुकाइब ना । बाकिर ई परीक्षा हेतना हाली काहे होत बा ?’’ पमली ओंठ दाबि के पूछली ।

‘‘हाली होता । आई0 ए0 में पढ़त अब तहरा दू साल होई ।’’ बारली इयाद परली ।

‘‘तू लइका सभ से एतना हरकल काहे रहेलू ?’’ पमली पूछली ।

‘‘त का तहरे लेखा लइकन देने सरकल रहीं ।’’ बारली के जवाब सुनि के पमली के बकार बंद हो गइल ।

दूनो जानी खूब पढ़े आ इयाद करे में जीव जान से लागि गइली लोग ।

पमली परीक्षा के दिन खूब घबड़ात रही,  ‘‘बारली, हम कइसे लिखब ? हमरा बड़ा डर लागत बा ।’’

‘‘डेरात काहे बाडू ? सभ ठीक से लिखीहऽ ।’’ बारली उनुका के समुझवली ।

‘‘तू रहेलू त बतावेलू । आछा, रहित हमहूं तहरे विषय ले लेतीं…।’’

‘‘अब आछा – खराब बाद में करिह । भगवान के नांव लऽ सभ परीक्षा बढ़िया से दिया जाई ।’’ बारली कहि के आपन परीक्षा देबे चलि गइली ।

पमली सिपाही पुलिस के देखि के डेरात रही बाकिर नीमन से परीक्षा दे देली ।

दोसरा दिन इतिहास के परीक्षा रहे । पमली सभ लिखि लेले रही । बाकिर एगो प्रश्न के उत्तर उनुका ना आवत रहे । ओह बीस नंबर के उत्तर के अइसे छोड़ल उनुका बड़ा अखड़त रहे । कवनो लइकी उनुका के उत्तर ना बतवली सन । सभ अपने लिखे के धुन में रही स । ऊ कवनो दूसर लइकी से उत्तर पूछे खातिर पाछा तकली त ओहिजा उहे लइका परीक्षा देत रहे जवन उनुका प ताकत रहे । उनुकर जीऊ धक से करि गइल । ना चहलो प ऊ दू  – चार बेर पाछा ताक दिहली । ऊ लइका जानि गइले कि इनका कवनो उत्तर नइखे आवत । ऊ गते से पूछले, ‘‘ए, कवन जवाब चाहीं ?’’

पहिले त पमली कुछु ना कहली बाकिर समय खतम हाते रहे । हार – दावं के ऊ आपन पांचों अंगुरी देखा देली । ऊ लइका समुझ गइले कि इनका पांचवां प्रश्न के उत्तर चाहीं । ऊ एगो कागज मोड़ि के पमली के गोड़ लगे फेंकले । ऊ डेराते – डेराते कागज उठा के देखली आ थरथराते हाथ से हाली – हाली उत्तर लिखली । पहिले हाली चिट करे में उनुकर हाथ – गोड़ कांपत रहे ।

परीक्षा खतम भइल त पमली बहरी आके ओह लइका के धन्यवाद कहली ।

‘‘एह में धन्यवाद के का बात बा । कबो हमरा ना आई त तू बता दीहऽ ।’’ ऊ लइका कहले ।

‘‘आजु चिट करि के लिखे में हमार हाथ कांपत रहे ।’’

‘‘तहरा एगो पुरजी प हाथ कांपत रहे । हम त किताब खोल के लिखेनीं ।’’ ऊ लइका मुसुका के बोलले त पमली उनुकर जवाब सुनि के हंसे लगली ।

बारली पमली से परीक्षा के बारे में सभ पूछली । गते – गते परीक्षा खतम भइल आ पमली के ओह लइका से मेल – जोल बढ़त गइल ।

‘‘तहार नाँव का ह ?’’ पमली एक दिन ओह लइका से पूछली ।

‘‘हमार नाँव माधव ह । बाकिर तहार नाँव हम जानत बानीं पमली ह ।’’ ऊ लइका बोलले ।

‘‘का ? हमार नाँव जानत बाड़ऽ ? ई कइसे ?’’ पमली के झटका लागल ।

‘‘ई बाति छोड़ द । आगे पढ़बू नू ?’’ माधव मुसुकिया के पूछले ।

‘‘हं पढ़ब । पहिले पास त हो जाईं ।’’ पमली हंसि के कहली ।

 

(6)

सँवरी के ससुरा में आ बारली के घरे फोन लागि गइल रहे, बाकिर दूनो जानी एक दोसरा के नंबर ना जानत रही ।

ठीक समय प पमली आ बारली के रिजल्ट निकलल । पमली सेकन डिवीजन अइली । बाकिर बारली राज्य भर में सबसे जादा नंबर लिया के फस्ट अइली । सभ कोई खूबे खुश रहे । ऊ अपना आ कवलेज के नांव खूबे रौशन क दिहली । कवलेज के सर आ मैडम लोग उनुका के चमकत सितारा समुझ लेले । उनुकर पिताजी आ दूनो भइया खुशी में अगराइल सउंसे टोला -महल्ला में लड्डू बंटले जा । कालेज में शिक्षामंत्री आके उनुका के सम्मानित कइले । अखबार में उनुकर फोटो आ साक्षात्कार छपाइल ।

उनुकर ई कामयाबी देखि के पमली हवा में उड़े लगली,  ‘‘चलऽ चलऽ बारली, हमरा के दू -तीन किलो मिठाई खिआवऽ । बड़ा ढे़र नंबर लिआइल बाड़ू ।’’

‘‘तू त अपने सेकन आइल बाड़ू । तू हमरा के पांच किलो मिठाई खिआवऽ ।’’ बारली उनुकर हाथ पकड़ि के हंसते कहली ।

‘‘हम त तहार पसंगो में नइखी ।’’

‘‘अइसे काहे कहत बाड़ू । का जादे नंबर लिअवला से हम महान हो गइल बानी ? जब तकले संवरी के बारे में आछा ना सुन लेब तब तकले हम खुशी ना बांटब ।’’ बारली उदास हो गइली ।

‘‘त उनुका भीरी चिट्ठी लिखि दऽ कि हमनी के पास हो गइनी जा ।’’ पमली सलाह देली ।

बारली सँवरी लगे चिट्ठी लिखे घरे चलि गइली ।

उनुका जाते माधव ओहिजा अइले । हंसते कहले,  ‘‘तब पमली, अपना पास भइला के खुशी में हमार मुंह मीठा ना करइबू ? अरे, मिठाई ना सही कम से कम गुड़ चाहे बतासो खिआ दऽ ।’’

‘‘तू हूं त सेकन डिवीजन से पास भइला हा । अपने ?’’ पमली मुसुका के बोलली ।

‘‘लऽ मिठाई ।’’ माधव उनुका के चिमकी में बान्हल मिठाई देले ।

ऊ हंसते ठंडा – ठंडा रसमलाई मुंह में डाल लेली । फेरू उहो उनुका के छेना के टिकिया खिअवली ।

आठ दिन बाद बारली के भेजल चिट्ठी भाग्य से सँवरी के मिलि गइल ।

ऊ अछर चिन्ह के खुशी से चिट्ठी पढ़े लगली –

हमार प्रिय संवरी,

तहार दोआ से पमली आई0 ए0 में सेकन डिवीजन आ हम आई0 एस0 सी0 में फस्ट डिवीजन आइल बानीं । पूरा राज्य भर में हमरे जादे नम्बर आइल बा । तहार घरे के सभ लोग ठीक बा । हम पमली आ तहार भाई – बहिन तहरा लगे कतने चिट्ठी भेजनी जा बाकिर तू एको के जवाब ना देलू हा । बिआह होते हमनी के भुला गइलू । एकर जवाब दीहऽ चाहे हमरा घरे फोन करिहऽ । फोन लागि गइल बा । नंबर बा – 279342 । कम से कम एको हाली फोन क के हमरा के बधाई दे दऽ । जीजाजी के परनाम कह दीहऽ । ठीक से रहिहऽ ।

तोहार सखी

बारली ।

बारली के चिट्ठी पढ़ि के सँवरी बहुते खुश हो गइली । उनुकर हेतना नंबर अइला प ऊ उनुका के बधाई देबे खातिर मचलि गइली । घर में ओह घरी केहू ना रहे । ऊ धड़कत करेजा से हाली – हाली बारली के फोन नंबर मिलवली । उनुका इहो लागत रहे कि एह बीच कोई आवे मत । रहि – रहि के दुआरी देने ताकतो रही ।

बारली के घरे फोन के घंटी बाजे लागल । ट्रीन…ट्रीन…।

ऊ फोन उठवली – ‘‘हलो…।’’

‘‘हलो बारली ?’’

‘‘सँवरी तू…?’’ बारली खुशी के मारे झूमि गइली ।

‘‘हमरा पहचान गइलू हा…?’’ सँवरी पूछली ।

‘‘तहार बोली सुने खातिर त हमार कान तरसत रहे…।’’

‘‘अभिये तहार चिट्ठी मिलल हा । तू हेतना नंबर से पास भइलू हा हम बहुते खुश बानी । एही तरे तू आ पमली पास होखत जइहऽ। उनुको के कह दीहऽ ।’’

‘‘सँवरी, ओहिजा तू ठीक से बाड़ू नू ? तहरे चिन्ता लागल रहेला ।’’

‘‘हं, हो हम ठीक से बानीं । हमरो घरे फोन लागल हा । नंबर लिखऽ – 389754 ।’’

‘‘लिख लेनी ।’’

‘‘आछा राखत बानीं । फोन करत रहिहऽ ।’’ सँवरी कहली ।

‘‘ठीक बा ।’’ बारली खुशी से फोन राखि के पमली से कहे चलि गइली ।

एने सँवरी के फोन राखते में अचके सास आ पड़ली । जोर से चिचिअइली,  ‘‘अरे निसहारी, केकरा से बतियावत रहिस ?’’

‘‘अपना सखी से । हमरा लगे एतना चिट्ठी आइल रहे बाकिर हमरा एको ना मिलल हा । काहे ? पढ़ीं रउवा ई चिट्ठी ।’’ सँवरी सास के चिट्ठी देली ।

सास चिट्ठी पढ़ि के उनुके सामने फाड़ देली,  ‘‘असही हम तोर सभ चिट्ठी फाड़ दीहिला ।’’

तबहीं केसर आ गइलें । खउलल तेल में हरियरका मिरचाई जइसन फूटत माई उनुका के फोरली,  ‘‘देख ले, फोन क के अपन सब हित – नाता से हमनी के सिकाइत बतियावत बिया ।’’

‘‘हं रे, तू फोन कइले हा ? बताव का – का कहले हा ?’’ केसर कहि – कहि के सँवरी के पीटे लगले ।

ऊ पिटा गइली बाकिर बारली से बतियवला के उनुका खुशी रहे । केसर ओही घरी फोन में ताला लगा दिहले ।

बारली खुशी में निहाल पमली से सँवरी के फोन के बात कहि के उनुकर मुंह उजरका रसगुल्ला से भरि देली ।

‘‘बारली, हमरो सँवरी से बतियावे के मन करत बा ।’’ पमली बारली के रसगुल्ला खिआवते कहली ।

‘‘त कहियो हमरा घरे आ जइह ।’’ बारली मुंह चलावते कहली ।

****

 

गते – गते पमली आ माधव एक दोसरा के चाहे लगले । माधव जान बूझि के अपना कवलेज में से हटि गइले । पमली के जवरे उनुके कवलेज में बी0 ए0 में फार्म भरले । बारली उहे कवलेज में बी0 एस0 सी0 में आगे बढ़ली ।

एने सँवरी के मिजाज तनी गड़बड़ाइल रहे । रहि – रहि के उनुका हुल आवत रहे । ऊ केसर से डाक्टरनी इहां चले के कहली । ऊ माई प ओढ़ा देले ।

सँवरी अपना लगे से रुपिया ले के सास जवरे डाक्टरनी से देखावे गइली । ऊ उनुका के जांच क के माई बने के खुशखबरी सुनवली । सुनि के ऊ रोआं – रोआं ख़ुशी से खिलि गइली ।

राति में ऊ केसर से कहली,  ‘‘रउवा बाबूजी बने के बानीं । खुश बानीं नू ?’’

‘‘एहमे खुश होला के का बात बा ? बिआह भइल बा त बापे नू बनब जानवर थोड़े बनब । आजुये कहि देत बानी बाचा पैदा करे नइहर चलि जइहे । एगो त तोर बोझ आ ऊपरे से ई बोझ ।’’ केसर खीसियाते कहले ।

‘‘ई बोझ ह ? दू महीना प डाक्टरनी रउवो के बोलवले बाड़ी ।’’

‘‘चलि जइहे माई के जवरे ।’’ केसर सूतले कहले ।

एक दिन पमली बारली के घरे आके सँवरी लगे फोन लगवली । ओने से चनकी रही । ऊ सँवरी के फोन प बोलावते ना रही । पमली उनुका के खूब हथजोरि कइली । तब ऊ सँवरी के बोलवली ।

ऊ दउर के फोन उठा के कहली,  ‘‘हलो पमली….।’’

‘‘हं हम । सँवरी, तू ठीक से बाड़ू नू ? बड़ा तोहार इयाद आवेला…।’’ कहते – कहते पमली डबडबा गइली ।

‘‘हम ठीक से बानीं । पमली, तू मउसी बने के बाड़ू । बारली से आउर हमरा घरे कह दीहऽ ।’’

‘‘सचो…।’’

तले बारली सँवरी से बतियावे खातिर बेचैन हो गइली । तबहीं ओने केसर अइले आ सँवरी से फोन के चोंगा छिनि के कसके उनुका के झापड़ मरले,  ‘‘साली, फोन तोरा बतियावे के लागल बा ?’’ फेनु चनकी के डंटले ।

एने बारली हलो… हलो… कहि के दुखी मन से फोन राख देली ।

‘‘बारली, सँवरी माई बने के बाड़ी ।’’ पमली खुशी में नाचे लगली ।

‘‘अरे बाह । अब हम मउसी बनब । चलऽ उनुका घरे कहे ।’’ बारली पमली के जवरे सँवरी के घरे गइली ।

सँवरी के माई ओह लोग के देखि के ओरहन देत कहली, ‘‘सखी के गइला का बाद तू दूनो जानी चाची के भुला गइल बाड़ू जा ।’’

‘‘ना चाची, हमनी के तहरा के नइखी जा भुलाइल । अभी हम सँवरी से फोन प बतिया के आवत बानी । तू नानी बने के बाड़ू । चलऽ मिठाई खिआवऽ ।’’ पमली हंसि के कहली ।

‘‘बबी, बड़ा खुशी के बात सुनवलू हा । सँवरी ओहिजा ठीक से बिया नू ?’’ माई खुश होके पूछली ।

‘‘हँ चाची जी, ऊ ठीक से बाड़ी ।’’ बारली बतवली ।

सँवरी के घर में खुशी आ गइल ।

*****

 

कवलेज में माधव पमली के एगो खूब बढ़िया लेडिज बेग देत कहले,  ‘‘पमली, हमरा तरफ से ई छोटी चुकी तोफा स्वीकार करऽ । एकरा रोज कवलेज लेके अइहऽ ।’’

पमली हंसि के बेग ले लेली ।

दोसरा दिन उनुकर कान्हा में लटकल करिया रंग के बेग देखि के बारली पूछली,  ‘‘पमली, ई बेग बड़ा सुन्नर बा । कहवां से लेलू हा ?’’

‘‘मूरती भइया दिली से लियवले हा । कहबू त तहरो खातिर मंगवा देब ।’’ पमली पहिला हाली बारली से झूठ बोलली ।

‘‘ना हमरा ना चाहीं ।’’ बारली कहि के आपन कक्षा में चलि गइली ।

चार – पांच दिन बाद माधव पमली के हाथ पकड़ि के कहले,  ‘‘हमरा बहुते खुशी भइल हा कि तू हमार तोफा के उपयोग करत बाड़ू  एगो बात दिल से कहत बानीं तू गुलाब के फूल नियन सुन्नर बाड़ू ।’’

‘‘छोड़ऽ ना कोई देख ली । बाकिर तू हू त एकदम हीरो लेखा बाड़ऽ ।’’ पमली हंसते हाथ छोड़ा लेली । कहली, ‘‘तहार दिहल ई बेग बहुते सुन्नर…।’’

अचके ओहिजा आवते बारली ई बात सुनि लेली । ऊ तमतमइले पमली लगे अइली । माधव उनुका के देखि के भाग खड़ा भइले ।

‘‘ई लइका के रहे ?’’ बारली पमली से खीस में पूछली ।

‘‘माधव रहले । हमरे जवरे पढ़ेलन ।’’

‘‘आछा, ई बेग तू कहवां से लेलू हा ?’’ बारली पमली के झूठ पकड़े खातिर दोबारा पूछली ।

‘‘कहले ना रहीं । ई बेग भइया लिआइल…।’’ पमली के फेरू झूठ सुनि के बारली लहरि गइली ,  ‘‘तहार भइया लिआइल रहले हा कि ई लइका देले बा ? हम आवत घरी तहरे मुंह से सुननी हा । तू झूठ काहे कहलू हा ?’’

‘‘हं, हम झूठ कहनी हा । ना त लगबू भासन देबे ।’’ पमली खीसिया गइली ।

‘‘कहीं तू ओकरा से पेयार त नइखू करत ?’’

‘‘त एहमें खराब का बा ? इंसान पेयारे करे खातिर बनावल बा ।’’ पमली के बेधड़क जवाब रहे ।

बारली आपन खीस नेवर करि के उनुका के समुझवली – ‘‘देखऽ पमली, आजु- काल्हु के लइका, लइकी सभ के कुछु- कुछु सामान देके आ मीठ – मीठ बतिया के ओकरा के फंसावे लसन। लइकन खातिर पेयार बस चार दिन के साथ बा। जइसे हमनी के रोज कपड़ा बदलेनी जा ओइसहीं लइका सभ लइकी बदलले सन। एगो  लइकी से मन भरि जाई त दोसर के पटा लीहसन। हम पेयार के खिलाफ नइखी बाकिर ऊ सच्चा पेयार होखे। ई बदमास लइका बा । तू एकरा से जादा बोल-चाल मत राखऽ।’’

‘‘तहरा जतने पुलिस नइखे बने के ओतने तू सभे के सके के नजर से देखेलू …।’’

‘‘त तू ओकरा से बोलल ना छोड़बू ?’’

‘‘ना।’’

‘‘त जा हमरो से सखियारो मत राखऽ ।’’ बारली खीसिया के कहली ।

‘‘हमरो  तहरा से सखी बन्हइला के ताव नइखे जागल ।’’ पमली गरजली ।

पहिलका हाली दूनो जानी में जम के झगड़ा हो गइल ।

राति में बारली के जब खीस ठण्डा भइल त ऊ पमली के जवरे कइल झगड़ा प रोये लगली – ‘‘ई हम का करि देनी ? पमली से सखियारो तूरि देनी। का भइल ऊ झूठे कहली हा त ? हमहूं त घर में झूठ बोलीला। त का घर के लोग हमरा से रिश्ता ना रखेला ? आजु त सभ लइकी लइकन से बतियावत आ परेम करत बाड़ी स। हमरा कवनो लइका से परेम नइखे करे के त मत करी। बाकिर आपन बात हम पमली प काहे डालत बानीं ? का सँवरी बिआह नइखी कइले ? पमली हमार गुलाम बाड़ी ? हम त पमली आ सँवरी के बेगर एकदम नइखी रह सकत । काल्हु हम पमली के गोड़ पकड़ि के माफी मांगब।’

एने पमली सोचत रही – ‘हमरा बारली से झूठ ना बोलल चाहत रहे । आखिर ऊ हमार सखी हई। ऊ ठीके कहत रही कि आजु के लइका बदमाश होले सन। लइकी के पेयार में धोखा दे के भाग जालन स। हम कतने फिलिम में देखले बानी। सँवरी से हम का कहब कि एगो लइका के चलते हम बारली से आपन सखियारो तूरि देनी। ना – ना अइसे कबो ना होई। हमार सखियारो एतना कमजोर त नइखे जवन एक झटका में टूटि जाए। हम बारली के बेगर जिन्दो ना रह सकब। ऊ बहुते खिसियाह बाड़ी, हमरा से बोलबो ना करिहें। हे भगवान जी, ई हम का कर चुकनी ? काल्हु हम उनुका से माफी मांगब…।’’ पमली रो पड़ली ।

दोसरा दिन कवलेज में बारली पमली से माफी मांगे खातिर उनुकर गोड़ प झुकल चहली तले पमली उनुका के अपना अंकवारी में भरि लेली। भरले आंखि से कहली – ‘‘पागल, सखी के गोड़ छुअल जाला। तू हमरा के माफ क द। काल्हु तू सभ बात ठीक कहले रहूं।’’

‘‘पमली, तहरा जेकरा से मन ओकरा से बतियावऽ । हम ना रोकब ।’’ बारली के टपऽ – टपऽ लोर गिरत रहे ।

तबहीं बारली के खोजते ओहिजा दू गो लइकी अइली । कहली,  ‘‘बारली, तोहरा के प्रिंसिपल मैडम बोलावत बानीं।’’

ई सुनि के बारली पमली से अलग होके कहली,  ‘‘पमली, हम बारह- पनरह दिन तोहरा से ना मिलब। काहे से कि जवन सर हिसाब पढ़ाइला उहां के माई गुजर गइल बानीं । सर छुट्टी प बानीं। एहिसे अपना कक्षा के लइका – लइकी के हमरे पढ़ावे के बा ।’’

‘‘ठीक बा ।’’ पमली आपन लोर पोंछि के बोलली।

‘‘तू लोग रोवत का रहू जा ? सखियारो में रोवलो का जाला ?’’ ऊ दूनो लइकी पमली – बारली के भींजल आंखि देखि के अचरज में रही जा ।

‘‘हं, कबो – कबो सखी के रो के देखावल जाला कि हम तहरा के कतना चाहीं ला। हमनी के सखियारो असमान जेतना ऊंच आ समुन्दर जइसन गहिरा बा ।’’ पमली बारली के हाथ पकड़ि के कहली ।

‘‘आछा, पमली, हम जात बानीं।’’ बारली कहि के ऊ लइकी जवरे चलि गइली ।

प्रिंसिपल मैडम बारली से कहली, ‘‘बारली, तू गणित में बहुते तेज बाड़ू । सिन्हा जी आपन घंटी के चार्ज तहरे के दे के गइल बानीं ।’’

‘‘मैडम, रउवा आ सिन्हा सर हमरा के बड़का जिमेदारी देले बानीं । हम पूरा करे के कोशिश करब ।’’ बारली मैडम के परनाम करि के कक्षा में चलि गइली ।

अभी ऊ पढ़ावल सुरूये कइले रहि कि एगो भूसन नांव के लइका सिगरेट जरा के पीये लगले । बारली उनुका के सिगरेट पीये से मना कइली। बाकिर ऊ ना मनले ।

ऊ उनका भिरी गइली,  ‘‘भूसन, तू सिगरेट पीये के आदत डालि के आपन जवानी के तीन गो कहानी बनावे के काहे फेर में बाड़ऽ ? जानत बाड़ऽ कि ई सिगरेट कतने खराब चीज ह । एकरा से टी0 बी0 आ कैंसर होत बा । माई – बाबू के दुलरूआ बाड़ऽ त नीक से रहऽ ।’’

‘‘अरे, जा ना, का भासन देले बाड़ू ? जा – जा पढ़ावऽ ।’’ भूसन बारली के मुंह प धुंआ छोड़ले । बारली आपन हाथ से धुआं दूर करते आपन रंग बदलली,  ‘‘त ठीक बा । अब हमहूं तहरा जवरे सिगरेट पीयब ।’’

‘‘लइकी ई सभ ना पीये ।’’

‘‘तू सिगरेट पीयल छोड़बऽ कि हम पी ही…? जानत बाड़ऽ कि हम कतने खिसिआह लइकी हईं । झूठ नइखी बोलत ।’’ बारली के आंखि में खीस चढ़त देखि के भूसन गते सिगरेट जूता से कूच देले,  ‘‘ठीक बा अब ना पीयब ।’’

तले घंटी लागि गइल । सभ लइका – लइकी कक्षा में से चलि गइले ।

‘‘बारली, कइसे तू हेतना बदमास भूसन के सिगरेट कुचवा देलू हा ? हम बहुते हैरान बानी ?’’ एगो लइकी बारली से पूछली त ऊ खिलखिला पड़ली ।

कवलेज से छूट ऊ सीधे बाजार गइली । आजु उनुकर सरवन भइया के जन्मदिन रहे । ऊ कवनो आछा तोफा कीने के सोचत रही कि उनुकर नजर किताब के दोकान में रेक प राखल छोट बड़ डायरी प चलि गइल । उनुका भक से इयाद परल ‘अरे, काहे ना एगो नीमन डायरिए कीन लीहीं। भइया रोजे डायरी लिखेलन ।’

एक बेरी बारली सरवन से पूछले रही कि ऊ रोज राति खा डायरी में का लिखेलन ? ऊ डायरी खोलि के उनुका सोझा क देलन । ऊ ओह में दिन भर में कइल आपन छोट – बड़ गलती लिखले रहन । जवरे ओह में संकल्प भी कइले रहन कि आगे से ऊ ई काम ना करिहें । साथे ओह में आपन घर – परिवार के खुशी देवे के बात लिखल रहे । खास क के बारली के देखल सपना उनुकर पढ़ाई प ऊ विस्तार से लिखले रहन । आपन छोट बहिन के झोरी में  दुनिया – जहान के खुशी भरे के वादा कइले रहन ।

बारली डायरी उलटत – पलटत एगो हरियर रंग के मोटहन डायरी पसन कइली । ओह प सूरूज भगवान के फोटो बड़ा सुंदर रूप से बनावल रहे । उनुकर भइया भी सुरूज लेखा चमकस उनुकर दिल से इहे दुआ निकलल ।

आपन कमरा में कुरसी प बइठल सरवन कुछु लिखते रहन कि उनुका के डायरी देते बारली कहली, ‘‘जन्मदिन के खूबे बधाई, भइया !’’

‘‘अरे हमार पगली बहिनिया, के इयाद रहे का कि आजु हमार जन्मदिन ह । बाह, डायरी त बड़ा सुन्नर बा ।’ सरवन खूबे खुश हो गइलन, ‘‘हम नया डायरी कीने के सोचते रही तले तू दे देले । तोरा एक छइंटी धन्यवाद ।’’

‘‘बे भइया, तू हमरा के धन्यवाद मत कहऽ । आछा भइया, ई डायरी लिखला से होला का ?’’

‘‘एह से मन के बड़ा शांति मिलेला । हमनी के कवनो बात अपना लोग से छिपा लबेनी जा बाकिर डायरी में आपन मन के चिट्ठा सच – सच लिखाला । जवन बात दूसरा से खोल के ना कहाला उहे बात डायरी में खोल के लिखाला बिना लाग – लपेट के । दिल के भीतर खिलत पेयार हो भा धधकत आग आपन असली रूप में शब्द में बहनाइल डायरी में उतरेला । भले हम डाक्टर बनल चाहत बानी बाकिर हमरा मन के भाव, आदर्श, पेयार, संस्कार, गम, खुशी आ दुख आदि जवन हिलोरा मारेला ऊ डायरी प उतर मोती बनि जाला । हम त कहब कि तू हो डायरी लिख के सीख । एह से तोरा एगो सुखद एहसास होई…।’’

‘‘बस बस बस भइया, आपन ई डायरी पुराण बंद करऽ । ई सभ हमरा बस के बात नइखे ।’’ बारली सरवन के बाति कटली, ‘‘हमार जिनिगी में जवन कुछ घटी ऊ तोहरा के हम बता देब । तू लिख दीह । एकर शुरूआत अभिए से कर द । आजु कवलेज में हम एगो लइका के सिगरेट पियल छोड़वनी हाँ ।’’

सरवन पेयार से बारली के चोटी खींच देलन, ‘‘तू त बड़ा नीमन काम कइले हा । पूरा घटना बिस्तार से बताऊ । हम ओह में के जरूरी बात लिख देत बानी ।’’ सरवन नयकी डायरी खोल कलम हाथ में लेले बारली के बात धेयान से सुने लगलन।

क्रमश :

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