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– नीतू सुदीप्ति ‘नित्या’

गतांक से आगे …

(11)

 

थाना में जाके पिताजी दरोगा साहेब से कहले, ‘‘सर, हमरा एफ0 आई0 आर0 दर्ज करवावे के बा ।’’

दरोगा नीचे मूड़ी कइले लिखते पूछलन, ‘‘कवन मोमिला में ?’’

‘‘हमार बेटी के इज… इजति लूटा ग… गइल…बा…।’’ पिताजी के हलक से बोली ना निकलत रहे ।

ई सुनि के दरोगा मूड़ी ऊपर उठा के बारली के देखले ऊपरे से नीचे । फिरू बोलले, ‘‘बइठीं ।’’

पिताजी एगो कुरसी प बारली के बइठवले आ दोसरका प खुदे बइठि गइले । सरवन बारली लगे खाड़ रहन ।

दरोगा पिताजी से उनुकर नांव, ऊ का करेलन, बारली के उमिर, ऊ कवन कवलेज आ क्लास में पढ़ेली सभ पूछलन ।

पिताजी आपन नांव लोचन बाबू बतवले । ऊ बैंक के केसियर रहन । बारली के उमिर बीस – एकइस साल रहे । ऊ राम सागर कवलेज में बी0 एस0 सी0 प्रथम के छात्रा रही ।

‘‘लोचन बाबू, तोहार बेटी के कवलेज के कवनो लइका से चक्कर रहे का ?’’ दरोगा पूछलन ।

‘‘एकरा केहूँ से ना चक्कर बा आ ना रहे ।’’ सरवन बीचे में कहलन ।

‘‘तू के ?’’ दरोगा गुरूना के पूछलन ।

‘‘हम इनिकर बड़ भाई ।’’ सरवन बतवले ।

‘‘लोचन बाबू, तोहार बेटी के इजति कहवाँ लुटाइल हा ?’’

‘‘राशन के गोदाम में ।’’ पिताजी बतवलन त दरोगा हंसले ठठा के,  ‘‘का तू कहत बाड़, कहीं दोकान आ गोदाम में इजति लुटाला ?’’

‘‘एहिजा राह चलत लइकिन के इजति लुटात बा ।’’ कहले सरवन ।

पिताजी जेतना बात जानत रहले सभ दरोगा से कहि देलन । बारली के घटना कवनो पत्रकार के कानि में पड़ि गइल । फिरू का रहे थाना के बहरी सभ अखबार के पत्रकार आ फोटो खींचे वाला के भीड़ लागि गइल ।

‘‘हँ त बारली, तू का करे ऊ दोकान में गइल रहलू ? ऊ दोकनदरवा के नांव का बा ?’’ दरोगा पूछल सुरू कइले सवाल ।

बारली पहिले कुछु ना कहली फेनु गते – गते बिटेसवा के नांव आ पांच बजे सांझि के समान लियावे गइल रहनी कहली ।

‘‘बारली, अब बताव बिटेसवा तोहार इजति कइसे लूटलस ?’’ दरोगा के ई सवाल प बारली का जवाब देसु । चुपचाप लोर गिरावत रहली । दरोगा बेरि – बेरि ई सवाल उनुका से पूछलन । बाकिर बारली के मुँहे ना खुलत रहे । बीचे गरदन में सभ अटकि गइल रहे । आउर ऊ का बतावसु कि ऊ पपिया उनुका जवरे कइसन सलुक कइलसा । भला कवनो लइकी बताई ।

‘‘देख लोचन, जब तकले तोहार लइकी पूरा बात आपन मुंह से साफ – साफ ना बताई तब तकले केस कइसे होई ?’’ दरोगा पिताजी से बोललन ।

‘‘बता दे बेटी बता दे । ऊ बिटेसवा तोरा जवरे का कइलसा । जवन दरोगा जी पूछत बानीं ऊ तू सभ खोलि के बता दे ।’’ पिताजी बारली के कपार प हाथ ध के कहलन ।

हाय रे अभागा पिताजी ! जवन अपने बेटी से सभ बाति खोलि के बतावे के कहत बाड़े । कवन बेटी ई बतावे कि ऊ पपिया उनुका जवरे का कइलसा ? बिआहलो बेटी से कवनो पिताजी ना पूछेले कि हमार पाहुन तोरा संगे का कइल हन ।

तबो बारली कुछु ना कहली ।

‘‘लोचन, तोहार लइकी कुछु बतावत नइखे । एकरा से आछा तू केस मत कर ।’’ दरोगा सलाह देलन ।

सरवन बोलले, ‘‘अइसे ऊ बदमसवा के कइसे छोड़ि दिहल जाई ।’’ फेनु ऊ आपन रूमाल से बारली के लोर आ ओंठ लगे से बहत खून के पोंछते कहलन, ‘‘बता दे बारली, अगर आजु तू चुप रहि जइबे त जिनिगी भर चुपे रहते रहि जइबे । जवन तोरा जवरे भइल हा आजु ऊ सभ लइकी के जवरे होत बा बाकिर ऊ सभ चुप रहि जात बाड़ी स । हमनीं के परवाह मत कर । तोर मजबूत इरादा आ होंसला कहवां गइल ? दरोगा जी से सभ कहि के आपन दिल के भरास निकालि दे। तू त सबसे जादे बोलेलीस फेनु आजु गूंग काहे बनल बाड़े ? आपन ई भइया के कहल मान आ सभ बाति बता…।’’ कहते – कहते  सरवन के  झर – झर लोर गिरे लागल आ पिताजी के पुरान आंखि से लोर के धार गिरि के उनुकर फुल पैन्ट भिंजा देलस ।

बारली के अइसन सदमें लागल रहे कि उनुका भाइयों के बाति प कवनो असर ना भइल ।

‘‘चल ऊ कोठरी में ओहिजे बतइह । एहिजा बाप – भाई से लाज लागत बा त ।’’ दरोगा बारली के हाथ पकड़ि के कहलन । तब चेतना शून्य बारली के दिल – दिमाग खुलल आ ऊ एक झटका से आपन हाथ खिंचली ।

दरोगा उहे सवाल फेनू पूछलन, ‘‘बिटेसवा इजति कइसे लूटलसा ?’’

तब एह प पिताजी कहलन, ‘‘सर, रउआ एतना खराब – खराब सवाल काहे पूछत बानी ?’’

‘‘हम कवनो खराब सवाल नइखी पूछत । जब तू कोर्ट कचहरी में जइब त वकील बारली से एकरो से खराब – खराब सवाल पूछी । ओह घरी तोहार मूड़ी लाज से नीचे झूकि जाई,’’ कहि के दरोगा आपन एक हाथ के डंटा के खटखटवले आ उठि के बारली के हाथ पकड़ि लेलन ।

जइसे ऊ बारली के हाथ पकड़लन त उनुका बुझाइल कि ऊ बिटेसवा ह आ फेनु से हमार इजति….। अब बारली के दिल में ज्वालामुखी फाटल, आंखि में खून उतर आइल आ ओंठ प आगि जइसन बाति निकलल, ‘‘बिटेसवा हमार गोदाम में इजति लूटलस आ अब रउआ ऊ कोठरी में लूटब । माने हमार दू बेर इजति लुटाई । एक बेर समान लियावे के घरी आ दोसरका रिपोर्ट लिखवावे के घरी ।’’

बारली एतना जोर से बोलली कि उनुकर आवाज बहरी ले चलि गइल । थाना के देवार से कान सटवले सभ पत्रकार उनुकर ई बात हाली – हाली आपन डायरी में लिखले स। पत्रकार सभ के थाना के भीतरे आवे के मनाही रहे एहिसे ऊ सभ बहरिये से देवार से कान सटवले कलम चलावत रहले स ।

दरोगा बारली के हाथ छोड़ि के आपन कुरसी प बइठते कहलन, ‘‘का बकत बाड़े ?’’

‘‘एकदम ठीक बकत बानीं ।’’ बारली के बात प दरोगा खीसि में पूछलन, ‘‘बताव बिटेसवा तोर इजति कइसे लूटलसा ?’’

‘‘अगर इहे हाल राउर बेटी के होइत त का रउआ उनुका से पूछतीं ?’’ बारली के बाति सुनि के दरोगा के देहि में आग लागि गइल आ ऊ उहे झोंक में बारली के जोर से एक चमेटा गालि प मार देलन जहवां उनुका चिराइल रहे ।

चमेटा खाते बारली दरद से चिचिया पड़ली । ई देखि के सरवन दरोगा के मारल चहलन तबले पिताजी उनुका के रोक देले ।

‘‘हं, हं, हम अपना के राउर बेटी से बेरि – बेरि मिलाइब ।’’ लोर पोंछते कहली बारली ।

‘‘तू हमार बेटी के गोड़ के नोहो में ना मिलबे ।’’

‘‘काहे ना मिलब ? एकदम मिलब । उनुकर नोह से का उनुका पूरा देहि से हम मिलब । उनुका आ हमरा में अतने नू फरक बा कि ऊ एगो दरोगा के बेटी आ हम एगो सधारन बाप के बेटी ! अगर हमरा जगहा प कवनो नेता के लइकी रहित त उनुकर बाप एतना देरी से थाना में बइठि के रिपोर्ट ना लिखवइते बलुक आपन बनूक के सभ गोली ऊ पपिया के छाती में दाग देते आ पुलिस – दरोगा के मुंह रोपेया से भरि देते ।’’

‘‘तू ओहिजा से भगले ना ?’’

‘‘हम बहुत भगनी बाकिर ऊ कुतवा ताला लगा देले रहे ।’’ कहि के बारली रोये लगली ।

सरवन पोंछले उनुकर लोर ।

‘‘तू अभी तकले ना बतवले कि बिटेसवा तोर इजति कइसे लूटलसा ?’’

दरोगा के सवाल प बारली उठली आ लोर पोंछि के जोर से बोलली, ‘‘बलतकार बलतकार ना होके कवनो दू पहिया वाला साइकिल आ चार पहिया वाला कार हो गइल बा । जब गावं वाला के मन कइलस साइकिल उठा के आरी – पगारी घूमि लेलस । एहि तरे शहरवाला के जब मन कइलस कार प बइठि के शहर घूमे चलि गइल । गांव आउर शहर के मरदन के दिल में जब वासना के आगि भड़कत बा तब चलि जात बाड़े स कवनो लइकी के इजति लूटे ।’’

एतना सुनि के दरोगा के पसेना छूटे लागल, ‘‘ओहिजा काली आ दुरगा के ना बोलवले ?’’

‘‘सभ देबी – देवता के बोलवनी बाकिर केहूं ना आइल ।’’

ओहिजा खाड़ एगो सिपाही टुभुकल, ‘‘संकट मोचन हनुमान जी तोरा के बचावे ना अइले ?’’

बारली आपन लाल – लाल आंखि से ओकरा के गुरूना के तकली आ टेबुल प एगो कस के मुका मरली कि टेबुल प के सभ सामान छितरा गइल , ‘”जब कवनो लइकी आ अवरत के दिल में नफरत आ बदला के आगि लागेला त ऊ काली आउर चामुंडा बनेले बाकिर जब कवनो मरद के दिल में बदला आ नफरत के आगि लागेला त ऊ बरहमा , बिसनु , महेस चाहे राम आ किरिसना ना बनेला बलुक एगो बेयसी दरिन्दा, जानवर, दुराचारी, बलतकारी, पापाचारी आउर इजति के नोंच – नोंच के खाये वाला भेड़िया बनेला ।

दोसर हवलदार दरोगा के कान में टुभुकल,  ‘‘साहेब, ई बड़ा गरम दिमाग के बिया एकरा से कवनो बाति सम्हर के पूछब ।’’

दरोगा ‘ह’ में मूड़ी हिला देलन ।

दरोगा नया – नया नोकरी में बहाल भइल रहन आ उनुका भीरी इजति लूटाये वाला घटना के पहिलका केस बारली के रूप में आइल रहे एहिसे ऊ वकील लेखा उटपटा़ंगों सवाल बारली से पूछे लगलन कि उनुका इजति लुटाये के सबूत आ गवाह चाहीं ।

 

‘‘हमार ई फाटल कपड़ा, बार नोंचाइल, बहत खून, गाल चिरल, ई सभ हमार इजति लूटा जाये के सबूत ना ह ?’’

‘‘कवनो – कवनो मोमिला में लइका के फंसावे खातिर, दुश्मनी से चाहे रुपिया लेबे खातिर ई झूठो होला ।’’  दरोगा के जवाब रहे ।

‘‘तब हम आपन इजति लुटवावे के पहिले ओहिजा वीडियो खीचे वाला के ले जइती ताकि ऊ आपन कैमरा में हमार इजति लूटाये के चित्र  ( फोटो ) खींचित । फेरु बाद में हम ऊ कैसट सबूत बना के आ ऊ वीडियो बनावे  वाला आदमी के गवाह बना के एहिजा लिअवती । तब रउआ मन लगा के आंखि फारि – फारि के वीडियो फिलीम देखतीं आ सुराक खोजतीं ।’’

‘‘तब हमनी के मालूम कइसे चलि कि तोर इजति लूटा गइल ?’’

बारली जब बोलली खड़े होक बोलली,  “बिटेसवा हमार इजति एक हाली लूटलस बाकिर हमार घरे के लोग, मोहलावाला, हमार सभ हित – नाता, पत्रकार, सिपाही, दरोगा, वकील, कोर्ट – कचहरी आ पूरा दुनिया आपन बाति से, सवाल से आपन खा जाये वाला नजर से हमार बेरि – बेरि इजति लूटी ।’’

‘‘कवन विषय से पढ़े लीस ? आउर का – का सामान लेबे गइल रहीस ?’’ दरोगा फट से आपन सवाल बदलि देलन ।

‘‘हिसाब से पढ़ेनीं । चीनी, सेवई, हरदी आउर मिरचाई लेबे गइल रहीं ।’’

‘एहिसे ऊ तोर इजति के जोड़, घटाव, गुना आ भाग करि देलस ।’  दरोगा मने में कहले ।  फिर पूछलन, ‘‘समान लियवले आ तोर चपल केने बा ?’’

‘‘ऊ समान ना देलस । चपल उहे गोदाम में छूटि गइल । आवे के घरी बिटेसवा हमरा के सेवई देले रहे त हम सेवई से ओकरा के चला के मरले रहीं ।’’

‘‘तोरा बिटेसवा से कबो झगरो भइल रहे ?’’

‘‘ना । पइसा देत घरी ऊ हमार हाथ पकड़ि ले ले रहे त हम खीस में ओकरा के एगो थपड़ मरले रहीं ।’’ बारली कहि के दरोगा के बतवली कि बिटेसवा खुदे कहले रहे कि ओकर बिआह छव महीना पहिले हो गइल बा ।

दरोगा के मन में बार – बार एगो सवाल तूफान मचवले रहे कि ऊ वकील लेखा एगो खास सवाल बारली से पूछस । उनुका बिना पूछले रहातो ना रहे एहिसे ऊ पूछ बइठले, ‘‘बारली, बिटेसवा… कहवां – कहवां हाथ रखले रहे..?’’

अब बारली के बरल खीस आ लागल देहि में लहराये वाला आगि, ‘‘हम जानत रहलीं हा कि रउआ वकील लेखा ई सवाल हमरा से पूछब । हम एक हाली कहनीं कि बिटेसवा हमार इजति लूटलसा बाकिर रउआ हमरा से एके बात बेसन लेखा फेंटि – फेंटि के खोंदि – खोंदि के पूछत बानीं । ओकर हाथ हमार अंगे – अंगे पर गइल । का रउआ इहे सुनल चाहत बानीं त सुनीं, जवन छाती के दूध पिया के मेहरारू आपन लइकन के बड़ करे लीसन उहे छाती लइकी के सुन्नर होखे के चिन्हासी के तार – तार कइलस । नोह से चिरलस । हमार एक क गो कपड़ा के हमार इजति के रेसम के बखिया जइसन उघाड़ देलस । हम ओकर गोड़ – धरिया करत रहली, इजति ना लूटे के निहोरा करत रहली बाकिर ओकरा प त सयेतान से बड़का सयेतान सवार रहे । आपन मेहरारू के साथे सूतत रहे तबो ओकर मन – दिल ना भरल जवन आपन काम – वासना के आगि में हमार देहि के जरा के राख क देलस । ऊ रावन आ कंसों से बड़का राक्षस बा जवन हमार जिनिगी तबाह आ बरबाद क देलस । हमार सभ जमा – पूंजी लूट लेलस ऊ । हमार पूरा जिनिगी प बलात्कार के मोहर लगा देलस । हमार सभ अंग प ऊ मुंह मरलस । रउआ… रउआ दू घंटा से हमरा से सवाल पर सवाल करत बानीं आउर जब ऊ बदमसवा भागि जाई त कहब कि खोज – बिन जारी बा ऊ बलत्कारी के पता बहुते जल्दी चलि जाई । रउए सभ पुलिस गुंडा – बदमास के भागि जाये के खातिर राह बनावेनीं जा ।

‘‘रउए सभनी मरद हर मोसीबत के जड़ होनी जा । हर मरद सभ नारी के भोग – बिलास के खेलवना बना देले बाड़े स । सभ मरद नारी के नारी ना बलुक ओकरा के तरकारी समुझे ल स । तरकारी लेबे के रहेला चाहे ना बाकिर आदमी ओकर भाव जरूर पूछेला । एगो मेहरारू के घर में बइठा द आ दोसरी प मुंह मारत चल । इहे आजु सभ मरदन के रेवाज भइल बा ।’’

अतना बाति सुन दरोगा के होसे बिगड़ि गइल । ऊ रूमाल से आपन पसेना पोंछते कहले, ‘‘पहिले तोर डाक्टरी जाचं होई तब कारवाही शुरु होई । तबले हम एफ0 आई0 आर0 लिख लेत बानीं ।’’ फेनु ऊ एगो मेहरारू हवलदार के बोला के आपन घड़ी देखि के कहलन,  ‘‘अभी साढ़े नव बजत बा । तू दूनों जानी एकरा के अस्पताल ले जाके डाक्टरी – जांच करा द लोग । फेनु ई आपन घरे चलि जाई । आ तू लोग रिपोर्ट ले के एहिजा आ जइह ।’’

दूनों मेहरारू हवलदार बारली के उठा के जीप में आके बइठि गइली स । सभ पत्रकार बारली से कुछु – कुछु पूछे लगलेस । जब कैमरा के मुंह बारली के देने घूमि गइल त दूनों मेहरारू हवलदार बारली के मुंह आपन हाथ से तोप देली स । बारली चुप रही । थाना के बहरी ठेलम – ठेल भीड़ भइल रहे । सभ केहूं बारली के एक नजर देखे खातिर तरसत धकियावत रहे । पिताजी आ सरवन भीड़ के फरका करत जीप में बइठले आ अस्पताल चलि गइलन जा ।

एने सँवरी आ पमली आपन – आपन घर में  राति के खाये खात रही जा । तबहीं ऊ लोग बारली के घटना सुनली । ओह लोग प सवसे आसमान टूटि गइल। सूई से छेदाइल फोकना के तरेह करेजा फाटि के छितरा पड़ल । खाये फेंकि के दूनों जानी खलिहें गोड़े बारली के घरे गिरत, परत लोर गिरावते दउड़ली जा – ‘आही रे भगवान ! ई हमार सखी का जवरे का हो गइल ?’ बारली के घरे दूनों जानी आगा – पाछा पहुंचल । हांफते आ लोर गिरावते लता से सभ बात पूछली जा । रोअते लता बतवली सभ बात । सभ बाति जनला का बाद ऊ दूनों जानि प गस्ती लागल आवे । लागल ऊ लोग गस्तिये में बड़बड़ाए,  ‘‘हाय ! बारली… ई तोहरा जवरे का हो गइल ? तोहरा प केतना बड़का पहाड़ गिरि गइल…। फुआ, बारली… ठीक त… बाड़ी…. नू ऊ अभी….कहवां…..।’’ हदसे सँवरी – पमली के आवाज लटपटा गइल रहे ।

लता दूनों जानी के हिला – डुला के उठवली । फेनु ऊ कहली कि बारली रिपोर्ट लिखवावे थाना में गइल बिया ।

ई सुनते सँवरी – पमली उहे हाल में थाना देने दउड़ि गइली जा । लता दूनों जानी के ना जाये के चिचिआत रहि गइली बाकिर ऊ काहे के दूनों लोग सुने जास ।

कुचु – कुचु अन्हरिया राति में ऊ लोग गोड़ में ठेंस लगावत, चोट लागत, गोड़ से खून बहत अपने धुन में दउड़त रही । ऊ दूनों जानी ओह घरी इहो भुला गइल रहे कि हमरा बचा होखे के बा, अइसन दउड़ला के असर हमार बाचा प पड़ि । ऊ लोग के ओह घरी बस अतने याद रहे कि एह घरी बारली के ऊपर का बीतत होई ? ओह घरी ऊ दूनों जानी के किरिसना जी लेखा हाल भइल रहे जवन खलिहें गोड़े सुदामा खातिर दउड़ल रहले ।

थाना में पता चलल कि बारली अस्पताल गइल बाड़ी । ओहिजा से संवरी – पमली अस्पताल दउड़ली ।

बारली के डाक्टरी जांच हो गइल रहे । ऊ अस्पताल के बेड प बइठल लोर गिरावत रही । दूनों हवलदार मेहरारू ओहिजे बइठल रहीस । बहरी पिताजी आ सरवन एक दोसरा के लोर पोंछत रहन ।

संवरी – पमली हांफते ओहिजा अइली आ पूछली जा, ‘‘चाचाजी, बारली केने बाड़ी ?’’

पिताजी कमरा के देने हाथ से इशारा क देलन ।

सँवरी – पमली चउखट प गोड़ धइली जा त आपन सुन्नर सखी के बदसूरत हाल में देखि के दूनों जानी आपन लोर रोक ना सकली । बारली ऊ लोग के देखली त दउड़ के दूनों जानी के करेजा से लगा के बिलिख – बिलिख के रो पड़ली । उहो लोग आंखि फोरि के रोअलस ।

दूनों मेहरारू हवलदार ई देखि के का रोअसन । ऊ सभनी के सामने त अइसन रोज बाति होला । भला पुलिस अइसन घटना प दुखी होला चाहे डाक्टर आपन मरल मरीज प थोड़े रोयेला । जेकरा जवरे अइसन घटना घटेला उहे छछनि – छछनि के रोयेला ।

‘‘सँवरी…. पमली…, हमार ई…।’’ बारली पूरा बाति कहती कि तले पमली उनुकर ओंठ प अंगुरी राख दिहली, ‘‘कुछु मत कहs ।’’

सँवरी आपन साड़ी के अंचरी से बारली के ओंठ लगे से बहत खून पोंछली ।

दउड़ के अइला से सँवरी – पमली के गोड़ से खून बहत रहे । खून के छाप देखि के बारली भरले आंखि कहली, ‘‘हमरा खातिर तू दूनों जानी आपन एतना खून बहा देलू हा जा  ।’’

‘‘ई खून ना रंग ह,’’ सँवरी कहली त बारली के आउरी रोआई छूटि गइल ।

तबही एगो डाक्टर ओहिजा आके मेहरारू हवलदार के रिपोर्ट देत कहल,  ‘‘सच में ई लइकी के इजति लुटाइल बा । बाकिर एकरा जवरे बहुत बेयसमाना बरताव कइल गइल बा । हमार डाक्टरी पेशा में अइसन पहिलका केस बा । हम त हैरान बानी कि ई लइकी बच कइसे गइल बिया ।’’

‘‘आछा रहित कि हम मरि जइती ।’’ सुनि के कहली बारली ।

‘‘तब हमनी के का होइत ?’’ रो देली पमली ।

मेहरारू हवलदार सँवरी से बारली के घरे ले जाये के कहल आ खुदे रिपोर्ट लेके थाना चलि गइली स ।

एक तरफ से सँवरी आ दोसरका तरफ से पमली बारली के सहारा देके बहरी आके कहली,  ‘‘चाचा जी, भइया, चलीं ।’’ ऊ लोग पाछा – पाछा आवे लागल ।

सभ केहूं पैदल आवत रहे । बारली के आवे के असरा में उनुकर मोहलावाला एगारह बजे राति तक जागल रहले स । केहूं कहलस कि ऊ आवत बिया ।

फिरू का रहे दूनों देने सड़कि प ऊ अन्हरिया राति के लइका – लइकी, मरद आ मेहरारू दीया – ललटेन लेके खाड़ हो गइले स । जे सूतल रहे उहो लोग दउड़ – दउड़ के बहरी आइल । नया – नोहर पतोहि खिड़की आ केवाड़ी के पाला से झांकत रहि स । सभ केहूं बारली के राहि में आपन आंखि बिछवले रहे । जइसे लागत रहे ऊ कवनो लड़ाई जीत के आवत बाड़ी ।

ऊ कवनो देस के लड़ाइयों जीत के अइती त एतना भीड़ ना होखित उनुका देखे खातिर । बाकिर ऊ त आपन आउर सभ परिवार के इजति लूटवा के आवत रही अब एह में भीड़ ना होखे ई कइसे होइत ?

जब बारली आई0 एस0 सी0 में पूरा राज्य भर में सबसे जादे नंबर लिआइल रही त केहूं जादे आदमी उनुका के देखे ना आइल रहे चाहे अइसे स्वागत खातिर ना खाड़ रहले ।

बीच में बारली रही । उनुकर दूनों हाथ सँवरी आ पमली के कान्हा प रहे । सँवरी आ पमली आपन – आपन कान्हा प राखल बारली के हाथ पकड़ले रहली आ दोसरका हाथ बारली के डाड़ के पीछे रहे ।

तीनों एकदम गते – गते चलत रही जा । ऊ लोग के देखि के सभ लोग हंसे आ सीटी बजा – बजा के कुछु – कुछु बोले लागल, ‘‘वाह रे एगो के मरदे छोड़ देलस, दोसरकी कुंआरी माई बने के बिया आ तिसरकी के इजतिये लूटा गइल ।’’

ई लोग चुप – चाप चलत जात रहे । केहूं का बोले । पिताजी आ सरवन जमीन में धंसल जात रहले जा ।

फेरू केहूं गाभी मरलस,  ‘‘ई तीनों के सखियारों कहानी बना देलस । अरे, गोदाम में काहे गइल रहिस ? कहतीस त हमनी के खुले मैदान में…।’’

‘‘अरे, बिटेसवा कइसे – कइसे कइलस तनी हमनियों के बताव ।’’

ई सभ सुनि – सुनि के ऊ लोग खून के घूंट पीयत रहले ।

चलत – चलत बारली के घर आ गइल । माई आ नानी दुआर प खाड़ रही ।

जइसे बारली आपन दुआरी प अइली माई उनुका के खींचि के घर के भीतरे घुसा देली ।

जब सँवरी – पमली भीतरे जाये लगलीं जा त माई रोकली,  ‘‘तू ही दूनों के चलते आजु बारली के इजति लूटा गइल हा । हमार दुआर प तू दूनों अब कबो मत अइहें स ।’’

सुनते सँवरी – पमली खीसे लहरि गइली । पमली कुछ बोले के चहली त सँवरी उनुका के चुप करा के उनुकर हाथ पकड़ि के लवटि गइली ।

 

(12)

बीच राही में पमली सँवरी के पकड़ि के फफक पड़ली, ‘‘सँवरी, हमार बारली का जवरे ई का हो गइल ? हमनी के जिनिगी दुख – दरद में बदलि गइल । हमरा आ तोहरा जवरे त ढ़ेर खराब ना भइल बाकिर बारली के जवरे केतना खराब भइल । हम कबो सोचले ना रहलीं कि अइसन कबो होई । हमनी के दुख तर हो गइल आ बारली के ऊपर हो गइल । हम त जान – बूझ के बदनांव भइलीं बाकिर बारली अनजाने में हेतना बदनांव हो गइली । अभी हमार घटना के साते दिन भइल कि आजु बारली…।’’

‘‘हमनी के जिनिगी में गरहन लागि गइल । हमनी के एह तरे रोवब जा त बारली के, के सम्हारी ? चल s घरे ढ़ेर राति हो गइल बा ।’’ सिसकते बोलली सँवरी ।

फेनु दूनों जानी अपना हिस्सा के दुख – लोर लेले घरे चलि गइली जा ।

जीतन बिटेसवा के मारे गइल रहन बाकिर ऊ ना मिलल ।

लता आपन लोर पोंछि के बारली के भींजल कपड़ा से मुंह पोछली । फेनु उनुका के पानी पीये के देली । बाकिर बारली एको बून पानी ओंठ तरे ना लगवली । असहीं उनुकर आंखि झर – झर लोर गिरत रहे । लोग आवत – जात रहले । बारली से पूछत रहले कुछु – कुछु । बाकिर उनुकर मुंह ना आंखि बोलत रहे दरद भरि – भरि के । सभ केहूं एक – क गो कोना में बइठी के रोअत रहे ।

सभ खाना असहीं थके पड़ल रहे । केहूं के मुंह में अन्न के एगो दाना ना गइल । ऊ राति में कवनो हित – नाता ना अइलन बाकिर बारली के इजति माटी में मिलि गइल ।

ओही राति के सरवन आ जीतन थाना में गइले । दरोगा खइनी मलत रहले।

‘‘रउरा अभी तकले एहिजा बइठले बानीं ? पौने एक बजि गइल । बिटेसवा के पकड़े गइनीं ?’’ सरवन पूछले ।

‘‘डाक्टरी रिपोर्ट आई तब नू कारवाही होई ?’’ दरोगा निचला ओंठ में खइनी रखते कहले ।

‘‘काल्हु ले रिपोर्ट ना आई तब तकले रउवा बिटेसवा के ना पकड़ब ? सच में पुलिस – दरोगा निकमिया होलनस । पुलिस के वरदी पहिरले से केहूं पुलिस ना बन जाला । पुलिस के अरथो रउआ जानत बानीं ?’’ जीतन खीस में बोललन ।

‘‘तू जानत बाड़े त बताऊ पुलिस के अरथ ।’’ दरोगा पूछले ।

‘‘पु’ से ‘पुरूषार्थ’, ल से ‘लिप्सा’ रहित आउर स से ‘सुरक्षा’ होला । बाकिर रउवा लोग में ना पुरूषार्थ बा, ना केहूं के सुरक्षा देब जा, खाली लिप्से में डूबल रहब जा…।’’ जीतन कहते रहन कि ऊ मेहरारू सिपाही आके दरोगा के रिपोर्टवाला कागज देत कहल, ‘‘सर, इजति लूटल के घटना सच बा । डाक्टर कहले हा कि पीड़िता के जवरे बहुत खराब व्यवहार भइल बा ।’’

दरोगा रिपोर्ट पढ़लन । फेनु सरवन उनुका से मांगि के पढ़लन । ऊ डाक्टरी पढ़त रहले एहिसे जानि गइले कि बारली जवरे केतना खराब भइल बा । ऊ आंखि में लोर लेले कहलन, ‘‘बिटेसवा हम तोरा के जिंदा ना छोड़ब ।’’

‘‘का लिखल बा भइया ?’’ पूछलन जीतन ।

‘‘तू ना समुझबे ।’’ सरवन कहि के दरोगा से कहले, ‘‘अब चलब रउआ ।’’

दरोगा , सिपाही, सरवन आ जीतन जीप में बइठि के बिटेसवा के दोकान देने गइले जा । दोकान में ताला लागल रहे । दरोगा ताला तूरि के भीतरे गइले ।

ओहिजा के एक – एक गो सामान बारली के जवरे घटल घटना के गवाही देत रहे ।  सभ सामान ओसहीं छिंटाइल रहे । दूनों भाई के बारली के एक – क गो चपल आ उनुकर समीज के फाटल थोड़ा सा कपड़ा मिलल । दरोगा ऊ सभ के सबूत के रूप में अपना लगे राखि लेलन । फेनु गोदाम आ दोकान में सरकारी ताला लगा के पूछत – पाछत बिटेसवा के घरे पहुंचलन ।

ओकर घरे के लोग ओह घरी तकले जागल रहे ।

पुलिस के देखि के बिटेसवा के बाबू घबरा गइले, ‘‘का ह सरकार, रउवा एहिजा कहवां ?’’

‘‘तोहार लइका कहवां बा ?’’

‘‘ऊ त अभी तकले दोकान से आइले नइखे । हमनीं के ओकरे असरा देखत बानीं जा । का बाति बा ? हमार बिटेस ठीक त बा नू ?’’ माई के करेजा धक – धक करत रहे ।

‘‘तोहार लइका एगो लइकी के इजति लूटलसा ।’’ कहि के दरोगा सभ घर में सिपाही के जवरे बिटेसवा के खोजले बाकिर ऊ ना मिलल । पुलिस चलि गइल ।

बिटेसवा के माई – बाबू दुख में डूबी गइलन ।

बिटेसवा के नयकी मेहरारू सास से पूछल, ‘‘माई जी, एहिजा पुलिस काहे आइल रहे ?’’

‘‘हमार बेटा आ तोर मरद एगो लइकी के इजति लूटि के भागि गइल… ।’’

अपना मरद के बारे में ई नीच बात सुनि के उनुका विश्वास ना भइल, ‘हमार मरद एगो पापी आ बलत्कारी हो गइल ? हमरा में का कमी रहे कि हमार मरद एगो लइकी के इजति तबाह क देलस । हमरा अपने मरदे से घिना हो गइल । हमार बिआह इंसान से भइल कि सयेतान से । हमार मरद हमार खूबसूरती के राते – दिन गुन गावत रहे आ आजु ऊ ऊ…।’ आंखि में लोर ले – ले ऊ सोचते – सोचते बेहोश होके गिरि गइली । हाला – हाली सास – ससुर उनुका के अस्पताल ले के भगले ।

भर राति सरवन आ जीतन पुलिस का जवरे बिटेसवा के खोजते रहि गइले बाकिर ऊ का जाने केने लुका गइल रहे ।

एने सँवरी – पमली आपन – आपन घर में बारली के इजति के अरथी निकलला के सोचि के खूब रोवत रही जा ।

ऊ चाहे सभ दुनिया का करीत ? बारली के चुप कराई आ दिलासा दिही । लोग त हमदरदी जता के चलि जाले बाकिर जेकरा ऊपर ई पहाड़ से भारी, परबत से ऊँचा, महासागरो से अधिका गहिरा आ मउत से बड़का दुख पड़ल बा ऊ उहे जानी दोसर केहूं नइखे जान सकत ।

बारली के घरे मउतो से बड़का दुख पड़ल रहे ।

दोसरा दिन भोरे चिचिया – चिचिया के अखबार बेचाये लागल, ‘आजु के ताजा खबर, आजु के गरमा – गरम खबर । एगो कवलेजिया लइकी के बलात्कार भइल नीमक – चीनी के गोदाम में…।’

‘आई0 ए0 सी0 में सबसे जादे नंबर लियावे वाली लइकी के इजति लूटाइल…।’

जे अखबार पढ़तो ना रहे उहो आपन चाह के पइसा से अखबार कीनि के पढ़ल । अखबार के पहिलके पेज प बड़का – बड़का अछर में छपाइल रहे –

‘बी0 एस0 सी0 प्रथम के छात्रा का जवरे बलात्कार भइल राशन के गोदाम में …।’

सभ केहूं अखबार मन लगा के पढ़त रहे । बारली जेतना बाति थाना में बोलले रही ऊ सभ चलीसा लेखा छपाइल रहे आ लोग ओकरा के भजन लेखा पढ़त आ सुनावत रहले ।

सेयान लइका अपना में माने मंतरा लगावे लगलन स – ‘‘यार, बुझाता ऊ खुदे इजति लुटवावे गइल रहे ।’’ एगो लइका कहल ।

‘‘हं संघतिया, आपन जवानी के जंग छोड़ावे गइल होई ।’’ दूसर कहल । त तिसरका हाली से बोलल, ‘‘ऊ हमनी से कहित त हमनियो के छोड़ा देती जा । हमनी के त बिटेसवा से सुन्नर आ कुंआरे बानी जा ।’’ सभ हंसे लगले स ।

सयान लइकी :-

‘‘बरलिया के अपना सुनरई प बहुते घमंड रहे । आछा भइल कि ओकर इजति लूटा गइल ।’’ एगो लइकी बोलल ।

‘‘हं, सखी, ऊ अपना पढ़ाई का आगा हमनी के अंखे ना लगावत रहे । जे हसे सँवरी आ पमली । बड़ा ई तीनों के आपन सखियारो के ताव रहे । सभ ताव – फाव हवा हो गइल ।’’ दोसर बोलल ।

‘‘ए सखी, आखिर इजति लूटाला कइसे ? चलल जाई कबो बरलिया से पूछे । आखिर हमनियो के कुछु जाने – बुझे के चाही नू ।’’ तीसरी बोल ल लइकी ।

मेहरारू :-

‘‘ए फलनवा के माई, बारली के नानी आ माई कतने रोअत बाड़ी जा हो ।’’ एगो मेहरारू कहल ।

‘‘हं , फलनवा बो , देखऽ लु ना ऊ बरलिया तमऽ – तमऽ भइल रहे । हमरा त बुझाता कि ओकरा से आपन जवानी सम्हारल ना जात रहे एही से ऊ बिटेसवा लगे गइल आ उल्टे ओकरे के बदनांव करि देलस । ऊ त लइका ह झाड़ो मूती पातो मूती ।’’ दूसर मेहरारू बोलल ।

मरद लोग :-

‘‘भाई, लोचन बाबू के बेटी जवरे बड़ा खराब भइल ।’’ एगो आदमी कहल ।

‘‘बाकिर का जरूरत रहे सेयान लइकी के समान लियावे के भेजे खातिर ।’’ दोसर आदमी बोलल ।

‘‘हमनियो के लइकी बाड़ी स । उहो सभनी के कतहूं आवे – जाये प देखे के पड़ी । कब का हो जाई केहूं जानत बा ।’’ तीसर बोलल आदमी ।

जेकर जेतना उमिर रहे ऊ सभ बुधी लड़ा – लड़ा के सोचत रहे ई कांड कइसे भइल ?

पूरा गांव, सहर, जवार, पथार आउर पूरा दुनिया में बारली के खबर टी0 वी0 आ अखबार के जरिये पहुंच गइल । अधे – अधे घंटा प बारली के खबर टीभियो प खूब आइल ।

बारली जवन कवलेज में पढ़त रही ओहिजा के मास्टर, दीदीजी, लइका आ लइकिन के बिस्वासे ना होत रहे। सभ केहूं बारली के घरे आइल । प्रिंसिपल मैडम खूब रोवत रही कि हमार चल्हांक छात्रा का जवरे ई का हो गइल ।

भूसन अपने में तरंग – फड़ंग कइले रहले,  ‘हम ऊ बदमसवा के मुआ देब जवन बारली के ई हाल कइलसा ।’ बाकिर जब ऊ बारली के सूरत देखले त उनुका हिमत ना भइल । ऊ आंखि में लोर ले ले बिना बारली से भेंट कइले ओहिजा से भाग गइलन ।

बारली के दुख में सभ स्कूल – कवलेज बंद रहल । बिटेसवा के पकड़े खातिर कवलेज के लइका – लइकिन नाराबाजी कइलन स ।

बारली के घरे लोग के आवाजाही लागल रहे । सभ केहूं के जवरे बारली के तीन ताला घरो रोवत रहे । ओकर ईंटे – ईंट रोवत रहे । हइसन अमीर घर के लइकी के कइसे इजति लूटा गइल ।

नानी सड़क प के चिन्हल – चिन्हल आदमी के बोला – बोला के रो – रो के बारली के बात बतावत रही ।

तीन – चारि गो मेहरारू बारली से खूब उलटि – पलटि के सवाल पूछत रहीस जेकर जवाब उनुका लगे ना रहे । माई आ नानी बारली से खोदि – खोदि के पूछे खातिर ऊ लोग के उसुकावत रही । ऊ लोग के बिखधर सवाल सुनि के बारली के आउर रोआई छूटे । खीसे ऊ उठि के अपना कमरा में चलि गइली ।

सँवरी – पमली अइली । ऊ लोग के देखते बारली के माई भड़कि गइली, ‘‘तू  दूनों फेरू आ गइलू स ?’’

‘‘हमनी के बारली से भेंट करे आइल बानीं जा ।’’ भरले आंखि कहली सँवरी ।

‘‘तूही दूनों के बदमासी के चलते आजु हमार नतीनी के ई दशा भइल बा । भागऽ सन एहिजा से ।’’ नानी दुरदुरा देली ।

‘‘बारली के माई, ई दूनों के घर में घुसे मत दीहे  । एगो कुंआरी माई बने के बिया आ दोसरी अपना मरदे के छोड़ि देले बिया ।’’ बइठल एगो मेहरारू बकल ।

‘‘तू सरकारी माई बाड़ू त चुप रहऽ ।’’ पमली झरली ।

असहीं दूनों देने से तोरवा – मोरवा होत रहल ।

एने बारली के मन में का जाने का आइल कि ऊ ऐनक के सीसा तूरि देली आ ओकरा से अपना पेट में घोंपे के सोचली । कुछु टूटल के आवाज सुनि के सरवन दउड़ के बारली के कमरा में अइले आ झट से उनुका हाथ से सीसा छिनि के फेंकलन, ‘‘तू आत्महत्या करत बाड़े बारली ?’’

‘‘हमरा मरि जाये द भइया, हमरा मरि जाये द…।’’ बारली सरवन के गोड़ प गिरि के अछोधार रोये लगली ।

सरवन उनुका के उठवले । लोर पोंछि के बइठा के समुझवलन, ‘‘पागल, आत्महत्या त बुड़बक लोग करेला । तू त बुड़बक ना नू हइस । हमार चल्हांक बहिन हइस ।’’

‘‘ना भइया, अब हम जीयल नइखी चाहत । ई सभ मेहरारू हमरा से उहे सभ बात पूछत बाड़ी स । माई आ नानी हमरा से बोलत नइखी । अब जी के हम का…।’’ बारली रो – रो के कहत रही आ सरवन के करेजा छलनी – छलनी होत रहे ।

एने सँवरी माई से कहली, ‘‘रउआ से बोलल आ कांटा से बाझल दूनों बरोबर बा ।’’

तबहीं लता अइली । अइसे सँवरी – पमली से माई – नानी के जुझते देखि के ऊ भउजी के डंटली आ ऊ लोग के घर में जाये देली ।

सरवन ऊ लोग के देखि के कहले,  ‘‘देख बारली, तोर जान – परान आ गइली स ।’’

फेरु ऊ आपन लोर पोंछि के बइठका में अइले जहवां माई –  नानी मेहरारू के जवरे बइठल रही जा । ऊ माई से कहले, ‘‘तू ई लोग जवरे बइठि के बारली के आउर सिकाइत बतियावत बाड़े । ऊ अभी – अभी मरे जात रहे ।’’

‘‘आजु काहे मरत बिया । काल्हुये रेलवई में कटि जाइत…।’’ नानी कहली त सरवन खीसि भूत हो गइले, ‘‘खबरदार नानी, जवन तू हमार बहिन के बारे में अइसन बोलले त । हम भूला जइबि कि तू हमार नानी हइस ।’’

लता सरवन के डंटली,  ‘‘बुढ़ – पुरनिया नानी से असही बोलल जाला, सरवन।’’

‘‘फुआ, ई लोग के बाति से बारली आपन पेट में सीसा घोंपे जात रहे ।’’ रो पड़लन सरवन ।

‘‘आछा रहित कि ऊ मरि जाइत । हेतना हमनी के बदनांवी त ना होइत ।’’ माई नफरत से कहली ।

‘‘भउजी, तू अपने बेटी के बारे में अइसन बोलत बाडू । तू ओकर माई नू हऊ । बेटी के दरद तोहरा नइखे बुझात । तोहरा त ओकर लोर पोंछे के चाहीं । आउर ऊपरे से तू झूठो के सँवरी – पमली के लगानी लगावत बाड़ू ।

‘‘आ माई जी, रउआ त एकदम सठिया गइल बानीं । सड़क प से आदमी बोला – बोला के बारली के बात बतावत बानीं आ चिचिया – चिचिया के रोवत बानीं । असहीं कइल जाला । रोये के बा त मन में रोई । ढे़र चिचिया – चिचिया के रोअला से रउवा के आछा कहाई ।’’ खीस में लता एके लउर से माई आ नानी के हांक देली ।

‘‘चलऽ तू लोग इहवां से फुटऽ ।’’ सरवन ऊ सभ बइठल मेहरारू से कहले ।

‘‘हमनी के बारली के लोर पोंछे आइल बानी जा ।’’ एगो मेहरारू कहल ।

‘‘बारली के लोर पोंछे खातिर ओकर बाप – भाई जीयत बा । जा एहिजा से लोग । ना त हम भुला जाइब कि तू लोग हमार मोहल्ला के चाची – दादी बाड़ू जा ।’’ सरवन गरजलन त सभ मेहरारू घरे के राह धइलीस ।

एने बारली खूब रोवत रही, ‘‘हम मरब, मरब । अब हम ई बदनामी लेके ना जीयब…।’’

सँवरी, बारली के चुप करावत रही । सीसा से उनुकर एक – दू गो अंगुरी कटि गइल रहे । ई देखि के पमली आपन अंगुरी से ओहिजा चीप देली कि खून ना बही । बाकिर पमली के हाथ बारली हटा देली, ‘‘बह जाये द ई खून के आखिर इहो त अशुद्ध हो गइल बा ।’’

‘‘कइसे बह जाये दीही खून हम ।’’ पमली तड़पि के दोबारा अंगुरी से दाबते सँवरी से कहली, ‘‘सँवरी, फुआ से डिटोल आ रूई मागं के लियावऽ ।’’

सँवरी डिटोल ले अइली । रूई ना रहे । पमली आपन अंगुरी से डिटोल लगा दिहली । डिटोल लगावते बारली के कटल अंगुरी खूब छनछनाये लागल । पमली आपन सूती ओढ़नी के तनी सुनी फाड़ि के बारली के कटल अंगुरी में बान्हि देली ।

बारली प त मरे के भूत सवार भइल रहे । खाली कहस हम मरब – मरब ।

सँवरी कवनो उपाय ना देखि के उहे सीसा बारली के हाथ में धरा देली, ‘‘तोहरा मरे के मन करत बा नू त ल ई सीसा एकरा के आपन पेट में घोंपि लऽ । आ तोहरा बाद हम आउर पमलियो घोंपि लेब जा ।’’

‘‘तू लोग काहे मरबू जा ?’’ सीसा लेत पूछली बारली ।

‘‘तोहरा खातिर ।’’ पमली जब कहली त बारली सीसा फेंकि के उनुका के अंकवारी में भरि के खूब रोये लगली ।

सँवरी आ पमली जवन होतना देर से आपन – आपन आंखि में लोर लुकववले रही जा ऊ बहरी आ गइल ।

रोअते – रोअते कहली बारली, ‘‘जानत बाड़ू जा हमार माई आ नानी हमरा से छुआत नइखी जा। दूरे से खाड़ होके उहे सभ पूछत बाड़ी लोग । कहत बाडी़ जा कि हम अशुद्ध हो गइल बानीं । एकरा छुअला से हमनी के पाप लागि जाई । बतावऽ सँवरी, पमली, माइये नू हमरा के समान लियावे के भेजले रही । हम ऊ कुतवा के आगा कतने रोअली, छटपटइली बाकिर ऊ एक ना सुनल हमार आ इ….।’’ कहि के बारली आउर रो पड़ली । फेनु ऊ पमली से अलगा होके कहली, ‘‘तू लोग हमरा लगे मत आवऽ । हमरा के छुअ मत ना त तूहूं लोग के पाप लागि जाई । तू दूनों जानी अशुद्ध हो जइबू जा ।’’

सँवरी के आउर लोर गिरि गइल । ऊ बारली के अंकवारी भरि लेली, ‘‘जे तोहरा के पापी आ अशुद्ध कहत बा ऊ खुदे दिल के पापी आ आपन आत्मा से अशुद्ध बा । सरवन भइया तोहरा के छुअले हा त का ऊ अशुद्ध हो गइले ? अगर तोहरा छुअला से हमनी के अशुद्ध हो जाइब जा त तोहरा के बेरि – बेरि छुअब जा ताकि तोहार अशुद्धि हमनी के मिलि जाओ आ तू फेरू से शुद्ध हो जा ।’’

‘‘फुआ त हमरा सोझा आवते नइखी । मर जाये द हमरा के ।’’

‘‘ई तू गलती सोचत बाड़ू, बारली । लता फुआ तोहरा के बहुते जादे मानेली । ऊ त खुद तोहरा खातिर कतने रोवत बाड़ी । तोहरा से त पहिले हमरा मरि जाये के चाहत रहे ई कलंक लेके । आजु हम तोहरा के किरिया धरावत बानीं । अब तू कबो मरे के मत कहि ह ।’’ बारली के पीठ सोहरावते कहली पमली ।

‘‘हम तोहरा खातिर जीहीं आ तू हमरा खातिर, बाकिर हमनी के जीयल जाई काहे खातिर ?’’ बारली के सवाल के जवाब सँवरी दिहली, ‘‘आपन – आपन जिनिगी खातिर ।’’

तबहीं एक प एक बारली के आंखि का आगा अन्हेरा छावे लागल आ ऊ सँवरी के छोड़ि के गिरे लगली । ऊ भूइंया प गिरती कि एकरा से पहिले झट से पमली उनुका के रोकि लेली ।

‘‘सँवरी घबरा गइली,’’ आंखि खोलऽ बारली।

बारली के दूनों आंखि मूंदाइल रहे । पमली उनुका के भूइंया प लेके बइठते सँवरी से कहली, ‘‘सँवरी, हाली से जाके फुआ आ चाचा जी के लिआवऽ। बुझाता ई बेहोश हो गइल बाड़ी ।’’

सँवरी दउरि के गइली । बीच राही में माई आ नानी मिलि गइली । सँवरी ओह लोग से बारली के बेहोश होखे के बाति कहली  ।

ऊ लोग एक सुर में बोलल, ‘‘भले ऊ मरि जाई त आछा रही ।’’

सँवरी के करेजा फाटि गइल । ऊ लोर पोंछते लता लगे गइली । सभ केहूं दउरि के आइल ।

बारली पमली के गोदी में बेहोश पड़ल रही । सरवन उनुका के गोदी में उठा के पलंग प सूता देलन ।

लता उनुका के चादर ओढ़ावत बोलली, ‘‘भइया, कवनो डाक्टर के लियावऽ।’’

जीतन पिताजी के रोकि के खुदे डाक्टर लियावे गइलन।

बारली के ई दसा प सभ जना के लोर बहत रहे । बिटेसवा आपन दरिन्दगी के एक क गो नमूना बारली प निकलले रहे । जेकर सदमा से ऊ बेहोश हो गइल रही । पिताजी चाहे भइया के बोली नीन में सुनते ऊ उठि के बइठ जात रही बाकिर आजु ऊ ओह लोग के सामने एगो छोट लइकी लेखा बेखबर सूतल रही ।

डाक्टर आला से बारली के जांच कइलन । फेनु उनुकर बांहि में एगो सूई देले । दवाई के पुरजी लिखि के लता के समुझा देलन ।

‘‘डाक्टर साहेब, एकरा होश कब आई ? हमार बेटी ठीक हो जाई नू ?’’ पिताजी उदासे पूछलन ।

‘‘दू – तीन घंटा में एकरा होश आ जाई । चिंता मत करीं । राउर बेटी बहुते जल्दी ठीक हो जाई ।’’

‘‘डाक्टर साहेब, बारली काहे बेहोश हो गइल हिया ?’’ पूछले जीतन ।

‘‘जवन लइकी का जवरे अइसन नीच काम होई त ओकरा सदमा लगबे करी । बाकिर रउआ सभे बेरि – बेरि उहे बात एकरा से मत पूछब जा । आ ना कवनो बाहरी आदमी से एकरा मिले देब । ऊ उल्टा – सीधा एकरा से पूछी त उहे बात एकर माथा में घूमत रही । ई कपड़ा कइसन बान्हल बा ?’’ बारली के अंगुरी में पमली के ओरहनी वाला कपड़ा देखि के पूछले डाक्टर ।

‘‘बारली के अंगुरी कटि गइल रहे त हम बान्ह देले रहली ।’’ पमली बतवली ।

डाक्टर ऊ कपड़ा खोलि के आपन मलहम पट्टी क देलन । फेरू बारली के दूसर बांहि में टेटनस के एगो सूई देलन ।

‘‘लोचन जी, राउर लइकी बहुते कमजोर हो गइल बिया । एकरा खाये – पीये प धेयान राखब । एकरा के कबो अकेले जन छोड़ब । ऊ बाति भोरावे खातिर बारली से हंसत – बोलब जा ।’’ डाक्टर सँवरी – पमली के देखि के पूछले, ‘‘इ के ह ?’’

‘‘बारली के पकिया सखी ।’’ लता बतवली ।

डाक्टर ऊ लोग भीरी जाके कहलन, ‘‘ई दुख के गहिरा में से तूही लोग बारली के बहरी निकलबू जा ।’’

‘‘डाक्टर साहेब, हमार सखी ठीक हो जइहे नू ?’’ भरले आंखि पूछली सँवरी आ पमली ।

‘‘हं ।’’

पिताजी उनुकर फीस पूछलन ।

‘‘लोचन बाबू, फीस का देब रउआ । जहवां तकले हमरा इयाद बा आजु तक बारली के सरदी -बोखार ना भइल रहे । बाकिर आजु ई दसा हो गइल एकर । केस बड़ जाई त वकील में कतने रोपेया झोकाई । बारली के हाल प हमरा बहुते दुख होता ।’’

डाक्टर के बाति प लता कहली, ‘‘डाक्टर साहेब, रउआ दुख जतावत बानीं आ ऊ…।’’ कहते ऊ लोरा गइली ।

‘‘आजु तकले त हम डाक्टर होके ना समुझनी कि लइका आ मरद काहे कवनो लइकी आ अवरत के इजति लूटेलसन ?’’ कहि के डाक्टर चलि गइले।

पाछा से पिताजी आ भइया गइले।

लता, सँवरी आ पमली बारली लगे आके बइठि गइली जा। केहूं के रोअल बंद ना होत रहे। सभ कुछ हो जाला बस एगो इयादे रोआवे खातिर रह जाला।

कतहूं से फोन आइल । दोसर कमरा में जाके लता फोन उठा के कहली, ‘‘हलो …।’’

दोसर देने से आवाज आइल, ‘‘बारली के इजति कइसे लूटाइल हा ?’’

एतना सुनते लता के देहि में आगि लागि गइल आ ऊ खीस में फोन पटक के खूब रोये लगली । फोन दू टुका हो गइल ।

धड़ाम के आवाज सुनि के सँवरी आ पमली ओहिजा दउरि के अइली जा । पमली फोन उठा के रखली । सँवरी पूछली लता से, ‘‘फुआ, तू फोन काहे पटक देलू हा ?’’

‘‘काल्हु से खाली एके बात के फोन आवत बा कि बारली के इजति कइसे लुटाइल हा ? का हम देखे गइल रहलीं । सभ केहूं के ई एगो मजाक बुझाता । केहूं एको हाली ना सोचेला कि जेकरा जवरे ई हादसा होला ओकरा तन – मन प का बितेला ? ऊपरे से सभ केहूं हंसत बा बारली प ।

‘‘कवनो लइकी दोसर लइकी के ठाठ – बाट से बिआह होत देखि के कहेली स चाहे सोचेली स कि हमरो अइसनके बिआह होइत । चाहे लइकी के पेयार करत देखि के उहो सभनी के पेयार करे के मन करेला । बाकिर कवनो लइकी के इजति लूटल के बाति सुनि के कवनो लइकी ई ना कहेलीसन कि हमरो इजति लूटा जाये । कबो एकर सपनो ना देखिहऽ सन । खुद हम ई बात नइखी कहत । बारली आ हम एगो लइकिये नू बानीं जा । बस फरक एतने बा कि हमनी के फुआ – भतीजी बानीं जा । बारली के जवरे जवन भइल अगर हमरा जवरे होइत त हमार जान अखरेरे चलि जाइत । बारली के सामने हमरा से जाइल नइखे सपरत ।

‘‘ई सभ देखि – सुनि के हर लइकी के सावधान आ होशियार रहे के चाहीं ताकि ओकरा जवरे ई सभ ना होखे । बारली के नानी आ माई एकरे के दोस देत बाड़ी जा । नानी हमेशा बारली के आही रे हमार सुन्नर नतीनी सुन्नर नतीनी कहत रही आ अब खाली ओकरा के मरे के कहत बाड़ी । नतिन दमाद के पहिरावे खातिर सोना के अंगुठी रखले बाड़ी । का अब बारली के बिआह होई ? भउजी एको बेरि बारली के आपन छाती से लगा के ओकर लोर ना पोंछली हा । आपन खून से त आछा तू दूनों जानी बाड़ू जा जवन बारली के एहसास करवावत बाड़ू जा कि हम तोहरा जवरे बानीं ।’’ लता डहक – डहक के रोअत रही।

‘‘फुआ, हमनी के बारली के हर कदम प जवरे बानीं जा । हमनी के गिरेनी जा त ऊ सम्हारेली आ जब आजु ऊ मोती के माला अइसन टूटि के छितराइल बाड़ी त हमनिये के उनुका के जोड़ब जा । हमनी के एक दोसरा के सुख – दुख में हमेशा साथ रहेनी जा । हमनी के बारली के अइसे ना छोड़ब जा ।’’ पमली धीरज धरवली ।

‘‘दू दिन भइल जब हम बारली के पुलिस बने खातिर सभ बाति बतावत रहलीं । का अब ऊ पुलिस बनीं ? ई दुनिया के लोग ओकरा के कुछु ना बने दीहीं । ओकर सभ सपना धूरि में मिलि गइल । केहूं ओकरा के देखते ई ना पूछि कि तू केतना पढ़ल बाड़े ? बलुक ई पूछि कि तोर इजति कइसे लुटाइल हा ? तब बारली का कहीं ? कुतवा बिटेसवा आपन मरदानगी के लेबुल हमार बारली प साट देलस । काल्हु से केहूं के मुंह में अन्न के एगो दाना नइखे गइल । बारली के आंखि से झरना अइसन हदऽ – हदऽ लोर गिरत बा । ओकर आपन कपड़ो के खेयाल नइखे । ई घर में ओकर हंसी बरसत रहे अब खाली रोआई सुनाता । सरवन आ जीतन हमरा लगे आके कतने रोअत बाड़े स । भइया ओकरा के आपन बेटा लेखा मानत रहले । खाली इहे कहसु बारली हमार खूबे नांव करीं । ऊ कतने लोर गिरावत बाड़े । मन करत बा हमही जहर खाके मरि जाई । बारली के लोर हमरा से देखल नइखे जात ।’’ लता सिसिकत रही ।

‘‘फुआ, तू त पढ़ि – लिखि के ई बाति मत कहऽ। अब तोहरे सभे केहूं के सम्हारे के बा ।’’ सँवरी लता के पोंछली लोर ।

‘‘तू लोग दू – चारि दिन बारली के जवरे रह जा त ओकर मन बदली ।’’ लता सँवरी के हाथ पकड़ि के कइली निहोरा त ऊ बोलली, ‘‘फुआ, ई तोहरा कहे के ना पड़ी । हमनी के ई बात घरही से सोंचि के आइल बानीं जा । बारली लगे चलल जाओ अब उनुका होसो आई ।’’

तीनों जानी बारली लगे अइली । ऊ बेहोसिये में कपार प हाथ धके कहली, ‘‘दरद…।’’

लता बाम आ ठंडा तेल ले अइली । ऊ बारली के मूड़ी आपन गोदी में राखि के माथ प बाम आ कपार में ठंडा तेल लगा के जाते लगली । बारली के हाथों – गोड़ लहरत रहे । सँवरी आपन हाथ से उनुकर हाथ रगड़े लगली आ पमली आपन ओरह्नी से दूनों गोड़ । तीनों में केहूं के लोर थमात ना रहे ।

बारली के जब होश आवे लागल त लता के लोर बारली के मुंदाइल आंखि प पड़ि गइल । ऊ लता के हाथ आपन कपार प से हटावते कहली, ‘‘फुआ, तू रोवत बाड़ू ?’’

‘‘ना रे आंखि में फतिन्गी पड़ी गइल हिय ।’’ लता झूठ बोलि के आपन लोर पोंछि देली ।

हाली से सँवरी आ पमलियो आपन लोर पोंछि लेली जा ।

लता बारली के मूड़ी तकिया प राखते कहली, ‘‘अभी हम रोटी बना के ले आवत बानीं त खा के दवाई खा लीहे ।’’ कहि के ऊ चुहानी घर में चलि गइली ।

ऊ तुरंते रोटी – भुजिया बना के ले अइली आ सँवरी के देते कहली, ‘‘सँवरी, बारली के खिया द आ जवरे  तूंहू दूनों जानी खा लीह । हम जानत बानी तू हो लोग काल्हु से कुछु ना खइले होखबू जा ।’’

पमली बारली के उठा के बइठवली । ऊ खाना ना खाइल चाहत रही । सँवरी उनुका के समुझा के कसहूं खिअवली । लता घर भर के लोग के रोटी – भुजिया खाये के दिहली बाकिर केहूं ना खाइल ।

मुंह बा के खाना आ दवाई खइला से बारली के चिराइल गाल चचरा के दुखाये लागल आ ओठ लगे से खून बहे लागल । सँवरी दूनों जगहा मलहम लगा देली ।

बारली आपन छाती प हाथ राखि के कहली, ‘‘एहिजो लहरत बा ।’’

‘‘तू अपने से लगा लऽ ।’’ सँवरी बारली के मलहम धरा देली ।

‘‘ऊ त लइका होके छू देलस । तूही दवाई लगा दऽ।’’ बारली बोलली ।

‘‘पमली, केवाड़ी बंद करऽ । बारली, तू सूतऽ ।’’ सँवरी हाथ में मलहम लेले बोलली ।

पमली केवाड़ी बंद क के बारली लगे आ गइली । सँवरी सोचली कि बारली के छाती लगे एक दू जगहा कटल होई बाकिर जब ऊ कपड़ा उघार के देखली त हिल गइली । गरदन से लेके पेट तक नोह के चिराइल रहे । जइसे बुझात रहे कि कवनो शेर आपन शिकार प बेदरदी से झपाटा मरले बा । ई देखि के सँवरी – पमली आपन – आपन लोर रोक ना सकली ।

सँवरी जइसे – जइसे मलहम लगावत रही ओइसे – ओइसे बारली के लहरत आ दरद होत रहे । जवन उनुका बरदास के बाहर रहे । ओह घरी बारली बिटेसवा के अजगर साँप लेखा इयाद क के आपन तकिया भिंजा देली ।

सँवरी आपन लोर से उनुकर लागल सभ मलहम धो देली । फेनु बरदास क के ऊ दुबारा मलहम लगवली आ केवाड़ी लगे आके बिलिख पड़ली ।

‘‘मत रोअ सँवरी, ऊ हरमिया बारली का जवरे कतने नीचता से पेश आइल बा ।’’ आंखि में लोर भरले पमली चुप करवली सँवरी के ।

‘‘हमरो मरद हमरा के मारत रहे बाकिर अइसन हाल कबो ना कइले रहे । केसर, माधव आ बिटेसवा का चलते हमनी तीनों केहूं के जिनिगी बरबाद हो गइल ।’’

‘‘तू अपना मरद के नांव लेत बाड़ू ?’’ पमली टोकली ।

‘‘ओइसन मरद कवन काम के जवन आपन बाचा गिरा देलस आ हमरा के होतना मारत – पीटत रहे ।’’ सँवरी बाचा के इयाद में तड़पि गइली ।

रोअल के आवाज सुनि के बारली सूतले कहली, ‘‘तू दूनों जानी हमरा खातिर रोवत बाड़ू जा ?’’

‘‘ना हो हमनी के नइखी जा रोवत ।’’ पमली बारली लगे आवते कहली ।

दू – तीन घंटा बाद लता जबरदस्ती बारली के दूध पियवली । एकर नतीजा भइल ऊ लता आ बिछवना प भभऽ – भभऽ ओका दिहली । लता उहे हाल में सभ कए साफ कइली । बारली के साफ कपड़ा पहिरा के खुदे बिछवना फीच – फांच के नहइली ।

बारली के एक – दू बेर आउर कए भइल । पमली ओह डाक्टर ले दवाई लिया के बारली के खिअवली । राति में उनुका के सभ दवाई खिया के सँवरी – पमली उनुका अगल – बगल सूत गइली जा । नीन में सपना देखते – देखते बारली उहे गोदाम वाला सपना देखे लगली । डेरा के ऊ सँवरी के पकड़ि लिहली । जइसे ऊ सपना में रोवत रही ओइसे सुतला में रोये लगली आ हांफते चिचिया के उठि के बइठि गइली, ‘‘ऊ आवत बा… ऊ आवत बा…।’’

उनुकर चिल्लाहट सुनि के सँवरी आ पमली घबराइले उठली, ‘‘का भइल हा बारली ?’’ फेरू सँवरी के नजर आपन बेलाउज प गइल जवन भींजल रहे । ऊ जानि गइली आ बारली के पानी पिया के सुतवली जा ।

बारली फेरू सपनाए लगली, ‘‘हमार इजति… हमार इजति…।’’ कहि के ऊ जागि गइली आ पसेना से भींजल ऊ पमली के पकड़ि के खूब रोये लगली ।

घबड़ाइले सँवरी आ पमली फेनु जागि गइली जा । सँवरी बारली के लोर आ पसेना पोंछली, ‘‘बारली, तूँ ऊ बात भुलात काहे नइखू ।’’

‘‘हम जब आंखि बंद करत बानीं त बुझाता कि ऊ फेरू से आवत बा । हम जेतना ऊ बात भुलाये के सोंचत बानीं ऊ ओतने इयाद आवत बा । अब हम कइसे परीछा देब ? ओकरे दिन – राति तइयारी करत रहलीं । अब हम कइसे पुलिस बनब ? एगो इजति लुटला का चलते हमार सभ भविष्य चउपट हो गइल । हम का करीं ?’’ कहि के बारली आउर रोये लगली ।

‘‘देखऽ बारली, तू अतना रोअबू त तोहार आंखि खराब हो जाई । तू सूतऽ हमनी के तोहार रखवारी करब जा ।’’ पमली कहि के बारली के फेनु ठोंक के सूतवली आ आंखि में लोर लेले खुदे जागल रहली ।

‘‘अइसे बारली के जवरे काहे भइल, सँवरी ?’’

‘‘देखऽ, पमली, हमनी के रोअल देखि के ई आउरी रोइहें। तू चुप रहऽ।’’ सँवरी पमली के पोंछली लोर ।

बारली जेने करवट फेरस ओने से सँवरी आ पमली उनुकर बार सोहरावते उनुका के सुतावत रही ।

ऊ लोग बइठले राति काटि देलस ।

क्रमश :

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