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– रघुराज सिंह कर्मयोगी

गीत

 

किस रंग की पगड़ी रंगवाऊं आ बैठ बता दे रे गुंइयां।
माथा गरम हो गया अपना, उलझन सुलझा रे गुंइयां।

राष्ट्र धर्म की बलि वेदी पर, पगड़ी पहन बसंती निकले।
मां के आंसू पोंछ दीवाने, अरि का शीश काटने निकले।

गुरु गोविंद सिंह नीली पगड़ी, वार सहे सब छाती पर।
थर थर कांप उठा शाइस्ता, खाडा खड़का हाथी पर।

चमक उठा भाला प्रताप का, गोगुंदा पीली माटी में।
देख पागड़ी सांगानेरी, अकबर रुका न हल्दीघाटी में।

लाल लाल पगड़ी तुर्रे वाली, योगेंद्र यादव कारगिल में।
ये दिल मांगे मोर का नारा, विक्रम बत्रा ने करगिल में।

विजय पताका फहराई थी, संजय कुमार परतापी ने।
लाश बिछाईं मनोज पांडे, अलंकृत किया राष्ट्रपति ने।

साफा हरा बांध कर निकला औरंगजेब महाराष्ट्रा में।
वीर शिवाजी अड़ा सामने, झंडा फहराया सौराष्ट्रा में।

भगवा साफा पहन के स्वामी, विवेकानंद कमाल किया।
शिकागो सभागार में यारो, भाष्य शून्य पर गजब दिया।

धवल पाग सुशोभित होती, वयोश्री जन जीवन रथ पर।
पुष्पों से जयकार गूंजती,चंद्र किरण सम जन पथ पर।

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