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♦️ परिचर्चा —  सिद्धेश्वर 🔷
🌀 कैसी कहानियां चाहिए आज के पाठकों को ? 🌀

💠 सोशल मीडिया के जमाने में साहित्य के प्रति दिलचस्पी बढ़ी तो है लेकिन लोगों की पसंद में जबरदस्त बदलाव आया है । चाहे वह कहानी हो,उपन्यास हो, कविता हो या साहित्य की कोई भी अन्य विधा ।
एक समय था जब लोग बड़े-बड़े उपन्यास पढ़ने में गहरी अभीरुचि रखते थे l सामाजिक विषयों के प्रति अधिक झुकाव था l आज के पाठक बड़े-बड़े उपन्यास की अपेक्षा छोटी-छोटी कहानियां अधिक पसंद करते हैं l इसलिए लघुकथा सर्वाधिक पठनीय विधा बन गई है l लंबी कहानी पढ़ने वाले पाठकों की संख्या भी कम होती जा रही है l और अब कहानियों में लोग प्रेम, रोमांस और सेक्स के साथ-साथ राजनीतिक सरगर्मियों को पढ़ना अधिक पसंद करते हैं l
कथा प्रधान पत्रिकाओं में भी लोग इस विषय से संबंधित ही कहानियां खोजते हैं,ढूंढते हैं l और तो और, कहानी पर बन रही फिल्मों में भी ऐसे विषयों के प्रति ही दर्शक दिलचस्पी रखते हैं l यहां तक कि सोशल मीडिया पर भी अधिकांश लोग,लंबे-लंबे वीडियो या लंबी लंबी कहानियों के अपेक्षा ऑनलाइन छोटी-छोटी कहानियां पढ़ना अधिक पसंद करते हैं l
ठेठ हिंदी भाषा का प्रयोग भी कहानी को अपठनीय बना दे रही है और ऎसी कहानियां भी आम पाठकों के लिए रुचिकर नहीं रह गई । इस तरह की पुस्तकें भले पुरस्कृत हो जाए किंतु सिर्फ पुस्तकालयों की शोभा ही बनकर रह जाती है l और यह बात सिर्फ आज की कहानी के लिए नहीं बल्कि पहले की कहानियों में भी देखी जा सकती है l शिवानी हो या मृणाल पांडे, गीतांजलि श्री हो या अनामिका, इनकी कहानियां सहज सरल भाषा में नहीं होती l ऐसी बोझिल कहानियां ना पहले इतनी लोकप्रिय थी ना आज l प्रेमचंद, रेणु,, धर्मवीर भारती या विमल मित्र जैसे कहानीकारों की कहानियों का पहले भी अधिक पाठक थे और आज भी l इस श्रेणी में आज भी चित्रा मुद्गल, सुषमा मुनींद्र, रामदरश मिश्र, मिथिलेश्वर, भगवती प्रसाद द्विवेदी , जयंत , अशोक प्रजापति जैसे कई कथाकार है जिनकी कहानियां आज भी पूरे चाव से पढ़ी जाती है l लेकिन मुख्यधारा में छाए हुए अधिकांश कथाकारों का नाम तक भी आम पाठक नहीं जानते, उनकी कहानियों को पढ़ना या पसंद करना तो दूर की बात है l साहित्य की कोई भी विधा हो,वह अधिक प्रासंगिक तभी है जब आम पाठक उसे पढ़ने में रुचि दिखलाए, उन कहानियों को पढ़ने के लिए पाठ्यक्रम की पुस्तकों की तरह वाध्य ना होना पड़े l क्योंकि साहित्य तभी बोधगमय है, ज़ब वह आत्मा की भाषा बने, सिर्फ किताबों की सिर्फ भाषा नहीं l पाठकों की पहली पसंद ऐसी ही कहानियां होती है।
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♦️ मंजू सक्सेना

🌀आज के दौर में कहानी में पाठक वर्ग की रुचि जानने से पहले हम पहले कहानी के बारे में संक्षिप्त बात करते हैं।
प्राचीन काल से ही कहानियां भारत में बोली, सुनी और लिखी जा रही है। ये कहानियां ही है जो हमें प्रेेरणा देती हैं और हम असंभव कार्य भी करने को तैयार हो जाते हैं और भयंकर बाधाओं के बावजूद ज्यादातर कार्य पूरे भी होते है। शिवाजी महाराज को उनकी माता ने कहानी सुना सुनाकर इतना साहसी बना दिया कि वो छत्रपति शिवाजी महाराज बन गए।
कहानी अर्थात कहन..मतलब किसी घटना या अनुभव को कहना ही कहानी है।जब हम अपने अनुभव किसी को सुनाते हैं या उस के माध्यम से किसी को कुछ सिखाना चाहते हैं तो हम उसे एक कहानी का रूप दे देते हैं। यह मनुष्य की प्रवृत्ति रही है कि वह दूसरों के अनुभव सुनना चाहता है इसीलिए कहानी कला का जन्म हुआ।इस हिसाब से हिंदी कहानियों का इतिहास भारत में सदियो पुराना है।पौराणिक कथाएँ इस का प्रमाण हैं। और पंचतंत्र तो वास्तव में विश्व की कहानियों का स्रोत माना जाता है ।
कहानी एक संक्षिप्त गद्य रचना है जो आकार में छोटी होती है और उसमें कथा तत्वप्रधान रहता है कहानी का विषय भी एक ही केंद्र के आगे पीछे घूमता है।
कहानी में मूल भावना के साथ कोई प्रेरणा स्रोत छुपा होता है। इसकी रूपरेखा स्पष्ट और संतुलित होती है। इस में मनुष्य का पूर्ण जीवन नहीं बल्कि उसके जीवन के एक अंग का विवरण होता है जिसके चारों ओर घटनाएं केंद्रित होती हैं ।कहानी अपने आप में पूर्ण होती है।
यद्यपि कहानी जीवन के यथार्थ से प्रेरित होती है तथापि इसमें कल्पना की प्रधानता रहती है।कहानीकार सीधे अपनी बात ना कह कर पात्रों के माध्यम से कहते हैं यानी कहानी में जीवन का यथार्थ होता है जो कल्पित होते हुए भी सच्चा लगता है।
किस्सा गोई से आरम्भ हुई कहानी ने मुंशी प्रेमचंद,चंद्र धर शर्मा गुलेरी, जैनेन्द्र, यशपाल और अज्ञेय की लेखनी से गुजर कर स्वतंत्रता के बाद कहानी,अकहानी,सचेतन कहानी,समानांतर कहानी,संतुलित कहानी,जनवादी कितने ही आयामों को पार किया।
अब हम आज के विषय पर आते हैं..
मनुष्य के विकास के साथ-साथ कहानियों का भी विकास हुआ और पाठकों की रुचि में भी परिवर्तन आया।आज के परिवेश में जब इंसान की जिंदगी जटिल हो गई है कहानियों में भी उसका प्रभाव देखने को मिलता है। आज का मनुष्य तर्क प्रधान और बुद्धि प्रदान है वो आँख मूंद कर कहानी के कथ्य पर विश्वास नहीं करता।इसीलिए आज कहानियां भी तर्क प्रधान और बुद्धि प्रदान हो गई हैं क्योंकि आज के पाठक के मन में कहानी के साथ-साथ क्यों और कैसे जैसे तर्क-वितर्क भी चलते रहते हैं।आज का पाठक कहानी से तब तक संतुष्ट नहीं होता जब तक कि उसे उसमें अपने सारे प्रश्नों के उत्तर नहीं मिल जाते।
आज आम पाठक उपन्यास या लम्बी कहानियों में रुचि
नहीं रखता।खासतौर पर कहानी में अनावश्यक दृश्यों के लम्बे विवरण या लम्बी बहस के संवादों को पढ़ने का
उसमें धैर्य नहीं है।इसलिए भूमिका या प्रस्तावना भी उसे पसंद नहीं।वह सीधे तौर पर मुद्दे की बात पढ़ना चाहता है।
भारतीय कथाकार मुंशी प्रेमचंद्र के अनुसार, “कहानी एक ध्रुपद की तान है, जिसमें गायक महफिल शुरू होते ही अपनी संपूर्ण प्रतिभा दिखा देता है. एक क्षण में चित्त को इतने माधुर्य से परिपुरित कर देता है, जितना रातभर गाना सुनने से भी नही हो सकता.”
हिन्दी की नयी कहानियों में आज के युग की दिशाहीनता, उत्कण्ठा, उलझन, मानसिक भटकाव और अन्तर्द्वन्द्वों का सजीव चित्रण नये शैली-विधान में किया जा रहा है।और यही आज के पाठक की पसंद है।
आज का पाठक वर्तमान समाज की व्यवस्था,आम आदमी की समस्या, युवा पीढ़ी की समस्या,उनका मानसिक भटकाव, अंतर्द्वंद, या फिर धरातल से जुड़ी प्रेम कहानी के विषय से जुड़ी कहानी चाहता है।वह जीवन के भोगे हुए यथार्थ को आधुनिक भाव-बोध के धरातल पर देखना चााता है।उदाहरणस्वरूप दिव्य प्रकाश दुबे के कहानी संग्रह ‘मसाला चाय’ में इंजीनियरिंग, लव, प्लेसमेंट, नौकरी का किस्सा है.
भाषा शैली में भी अब क्लिष्टता उन्हें पसंद नहीं।आमबोलचाल की भाषा शैली आज आम पाठक को भाती है।यहाँ तक की हिंदी के साथ अंग्रेजी के भी शब्दों से उन्हें परहेज नहीं है।
वास्तव मे आज मोबाइल युग में प्रबुद्ध पाठकों की मुठ्ठी भर संख्या छोड़ दें तो आम पाठक को न तो बड़ी कहानी पढ़ने का समय है न धैर्य और न रुचि।वो कहानी मे पूरे जीवन का वृत्तांत नहीं बल्कि छटपट एक प्रभावशाली घटना से प्रभावित अंश पढ़ना चाहते हैं।
संक्षेप में हम कह सकते हैं कि आज का पाठक कहानी के प्रति जागरूक हो गया है।उसे कहानी में परी लोक के स्वप्न नहीं बल्कि ठोस धरातल से जुड़े संघर्ष या सामाजिक व्यवस्था की बदहाली,राजनीति का दोहरा चेहरा और वह हर परिस्थिति ,वह संघर्ष जिससे वो स्वंय जूझ रहा है पढ़ने में रुचि है ।वो कहानी के पात्र के साथ स्वंय जुड़ा हुआ महसूस करना चाहता है।साा ही समस्या के साथ उसका समाधान भी चाहता है और तभी उसे कहानी पूर्ण लगती है।
अंत में अपनी बात मैं आज के युग के सफल कहानीकार कमलेश्वर जी की बात से विराम देती हूँ
“शानदार अतीत कुत्ते की मौत मर रहा है उसी में से फूट ता एक विलक्षण वर्तमान रू-ब-रू खड़ा है अनाम आरक्षित आदिम अवस्था में है। और आदिम अवस्था में खड़ा यह मनुष्य अपनी भाषा चाहता है आस्था चाहता है,कविता और कला चाहता है,मूल्य और संस्कार चाहता है, अपनी मानसिक और भौतिक दुनिया चाहता है”
मंजू सक्सेना
लखनऊ

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♦️ ऋचा वर्मा

💠कहा जाता है कि ‘मनुष्य एक सामाजिक जंतु है’ अगर इस वाक्य से सामाजिक शब्द को हटा दिया जाए तो मनुष्य एक जंतु बन कर रह जाएगा। मनुष्य को जानवरों से अलग करने वाले गुणों में उसका सामाजिक होने के अलावा और जो गुण हैं वे हैं भाषा, बुद्धि का विकास और कल्पना शक्ति।
जैसे ही मानव शिशु का मस्तिष्क भाषा और उसमें निहित भावों को समझने लगता है उसमें कल्पना के पंख लगाकर उड़ने की उत्कंठा तीव्र से तीव्रतर होती जाती है। अब चाहे बीते जमाने में दादी-नानी द्वारा सुनाई जाने वाली पंचतंत्र, परियों या दानवों की कहानियां हो या आज के युग में कार्टून चैनलों पर उपलब्ध कोई शो।
ये सब कहानियां बच्चों को इसलिए अच्छी लगती हैं क्योंकि उनकी भाषा सहज और सरल होती हैं, उनमें रोमांच होता है, और वे कौतूहल को बरकरार रखते हैं।
कहानी के ये मूल कारक सिर्फ बच्चे नहीं बड़ों को भी लुभातें हैं।यह दीगर बात है आधुनिक युग की आपाधापी, और रोजी रोटी कमाने के संघर्ष ने मनुष्य से उसकी कोमल भावनाएं छीन लीं हैं और मनुष्य जानवर तो नहीं पर मशीन तो अवश्य बन गया है। अब मशीन को तो तेल पी कर चलने से मतलब है, साहित्य और कला में भला उसकी रूचि क्योंकर होगी। साहित्य प्रेमियों की बात छोड़ दी जाए तो आम इंसान अपने खाली वक्त में वैसी ही कहानियां पढ़ना चाहेगा, जिसमें मनोरंजन हो,प्रवाह हो। जिनमें उसके जीवन या आसपास चल रही समस्याओं का समाधान हो और सबसे जरूरी वह उस कहानी से अपने आपको जोड़ सके । इसके अलावा इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के आगमन के बाद एक आम इंसान को पास खाली वक्त बिताने या मनोरंजन करने के बहुत सारे विकल्पों के उपलब्ध होने की स्थिति में एक ऐसी कहानी लिखना या प्रस्तुत करना जो पाठकों को रूचिकर लगे किसी चुनौती से कम नहीं है । इस लिए व्यक्तिगत तौर पर मुझे लगता है कि आज के समय कुछ स्थापित लेखकों की बात अगर छोड़ दें तो नये लेखकों को समाज में एक लोकप्रिय स्थान बनाना किसी चुनौती से कम नहीं है। फिर भी साहित्य सेवियों को यह प्रयास करना चाहिए कि जो कुछ भी आजकल लिखा जा रहा है, उसमें से ऐसी कहानियां जिनमें संभावनाएं हैं साहित्य को समृद्ध करने की, समाज को जागरूक करने की ,उनकी जमकर चर्चा करें ताकि एक आम पाठक भी एक बार उस कहानी को पढ़ने को विवश हो जाए।

ऋचा वर्मा
अनिसा बाद, पटना
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राज प्रिया रानी

🌀 साहित्य क्षेत्र में प्राचीन काल से लेकर वर्तमान काल तक अनेक साहित्यिक विधाओं का विकास हुआ है उनमें कहानी का सर्वोच्च स्थान है l अनेक गंभीर और बहुत से हल्के-फुल्के और रोचक साहित्य स्वरूपों के विद्यमान होते हुए भी कहानी का अपना अलग महत्व है l समस्त साहित्य की विधाओं में संभवत: कहानी ही एकमात्र ऐसा माध्यम है जो अपने लघु परिवेश में भी वृहद जीवन को अभिमंत्रित कर देने में समर्थ है l गंभीर साहित्य की आकांक्षा रखने वाले पाठकों को कहानी में चिंतन दर्शन की सामग्री मिलती है l और सामाजिक मनोरंजन की इच्छा रखने वाले व्यक्ति को भी इससे मन संतुष्ट होती है l
तंत्र के लुभावने नारों एवं राजनीतिक दलों के चुनावी घोषणा पत्रों और सत्ता धारियों के आश्वासन के सदस्यों के साथ आम आदमी की कुंठित भावनाएं एवं आकांक्षाएं निराशापूर्ण परिवेश की देन है और इन्हीं परिस्थितियों को कहानियां हमारे सामने रखती हैं जो पाठकों के इर्द-गिर्द घूमती जाती है और आम पाठकों को प्रिय हो जाती हैं l
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🔷 मुरारी मधुकर

🔶मैं मुरारी मधुकर आज 10. 7. 2022 को युवा साहित्यकार परिषद के तत्वावधान में अवसर साहित्य धर्मी पत्रिका के फेसबुक पेज पर आयोजित अवसर कथा सम्मेलन के कार्यक्रम से संबद्ध और जुड़े सभी माननीय जनों का हार्दिक अभिनंदन करता हूं।
हमेशा की तरह माननीय सिद्धेश्वर जी द्वारा प्रस्तुत परिचर्चा का विषय –किस तरह की कहानियां चाहिए आज के पाठकों को– भी बहुत ही रोचक और पसंद -संदर्भित है।
इस विषय के संबंध में मैं तीन बातों की चर्चा करना चाहूंगा। प्रथम तो यह कि कहानी सुप्त संवेदना को जागृत करने वाला होना चाहिए ।जैसा कि कथा सम्राट मुंशी प्रेमचंद की प्रसिद्ध कहानी कफन में महसूस किया जाता है। प्रसव पीड़ा से कराहती बुधिया को मदद करने कोई नहीं पहुंचता है लेकिन इसकी निधन की खबर सुनकर इकट्ठे लोग माधो और धीसु को कफन के लिए पैसे देते हैं। लोगों की संवेदना पीड़ा के वक्त अगर जागृत होती संभवत बुधिया की जान बच जाती।
दूसरी बात कि कहानी चरित्र – निर्माणक होनी चाहिए। चंद्रधर शर्मा गुलेरी की मशहूर कहानी– उसने कहा था– में लहना सिंह द्वारा अपनी किशोर उम्र की प्रेमिका के पति बोधा सिंह के प्राण रक्षा के लिए अपना प्राण देना, आदर्श चरित्र की ऊंचाई है।
तीसरी बात की कहानी सौहार्द संवर्धक होना चाहिएं इस संबंध में रामधारी सिंह दिवाकर की कहानी –सूखी नदी का पुल उल्लेखनीय है इस कहानी की मुख्य चरित्र बुची दाए बबुआन टोला और हरिजन टोला के बीच मेल- मिलाप करा देती है और वर्षों से चले आ रहे वैर को समाप्त करती है।
निष्कर्षत: मैं यह कहना चाहता हूं कि कहानी सुप्त संवेदना को जागृत करने वाला, चरित्र -निर्माणक और सामाजिक सौहार्द को बढ़ाने वाला होना चाहिए

–  सिद्धेश्वर [0 संपर्क: ” सिद्धेश सदन “(किड्स कार्मेल स्कूल के बाऐ ), द्वारिकापुरी, रोड नंबर :2, पोस्ट :बीएचसी, हनुमान नगर, कंकड़बाग, पटना:800026( बिहार) मोबाइल न: 923 4760335
0 ई-मेल: [email protected]

♦️@ कॉपीराइट @ कलाकृति : सिद्धेश्वर 🔷

 

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