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– कल्पना मनोरमा

 

नवगीत

१. गेहूँ की पगड़ी

 

गेहूँ की पगड़ी

गहके गेहूँ की पगड़ी जब

चैत्र बाँध मुसकाता है।

अंजाने ही वो मुझको

बचपन की याद दिलाता है।

खिला द्वारे का गुलमोहर

आँगन की मँजराई तुलसी।

दिन मामा जैसा आता था

संझा आती थी बन मौसी।

छागल जब गरम हवाओं की

चैत्र पहन इतराता है।

 

खलिहानों की गमकी साँसें

छिमियों की गोद भराई में।

कोयल गाती थी स्वर पंचम

आमों की सिक्त पिलाई में।

नीम पुष्प से भर झोली

जब चैत्र हृदय लहराता है।

 

अनाजों से महकी बखरी

चौके में पकती गुड़धानी।

थी आस पूरती बाबा की

लाते माँ को चूनर धानी।

मादक महुआ की हाला पी

जब चैत्र खूब बलखाता है।

 

२.

फागुन

 

फागुन है नव ब्याही

अँखियों का सपना।

नया खिला-सा फूल

पलाशी डाली में।

हुआ अंकुरित बीज

सुबह की लाली में।

खेतों में गेहूँ के

फसलों का पकना।

कुमकुम भरे थाल में

हल्दी की चुटकी।

होरियाये-से देवर की

भावज छुटकी।

महक रहे महुआ की

डालों पर झुकना।

रंगों की पिचकारी

कलियों की चटकन है।

अल्हड़-सी काया में

भावुक-सी धड़कन है।

बतरस में प्रेमी को

बाँहों में कसना।

 

३.सूर्य ने संदेश भेजा

 

सूर्य ने सन्देश भेजा

प्यार का।

कृषक का मन हो गया

कचनार-सा।

 

अर्क महका बाग में

लावण्य फूटा।

श्याम कलियों का भरम

भ्रमरों ने लूटा।

पत्र मौसम बाँचता

अभिसार का।

 

हेम की गठरी लिए

गेहूँ खड़े हैं।

छाँव फल संकल्प पर

तरुवर अड़े हैं।

आ गया सुंदर समय

मनुहार का।

 

ले सुरभि झूमे पवन

पागल हुआ है।

रंग भर उल्लास का

मन को छुआ है।

हर तरफ वातावरण

त्योहार का।

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