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– विजयानंद विजय

सावन के झूले में डोले,
बारिश की बूंदों में भींगे।
बचपन के सब खेल निराले,
यादों के वे पवन हिंडोले।
उमड़-घुमड़ बादल-से बरसे,
घूमे सारा गाँव,रे मनवाँ
कहाँ गया… वो गाँव?

यादों में मेले की फिरकी,
घुँघरू बाँध नाचे कठपुतली,
डमरु-मदारी, नाच बंदरिया,
सजी-धजी जापानी गुड़िया,
बाबा के कांधे पर चढ़के,
देखे दृश्य अभिराम,रे मनवाँ।
कहाँ गया… वो गाँव?

होली की रंगीन ठिठोली,
लो, निकली मस्तों की टोली,
रंग-गुलाल में घुलता यौवन,
अतुल स्नेह से खिलता उपवन,
दीवाली फुलझड़ियों वाली,
जगमग है हर ठाँव,रे मनवाँ,
कहाँ गया… वो गाँव?

काका की सरपंच – कचहरी,
कुछ अनकही-अनसुनी फरियादें,
मुखिया जी मूँछों में कहते,
न्याय जगत की कथा पुरानी,
शांति-सुलह की खुशहाली में,
डूबा गाँव – गिराँव,रे मनवाँ,
कहाँ गया… वो गाँव ?

– बक्सर (बिहार)

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