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– वैभव दुबे

 

चंचल श्वेत सुंदर तरुणी चाँदनी
जो ही आ गिरी
कमल झील रूप उपवन में
कमलों ने समेट उसे
अपना लाल पराग लगाकर
भेट किया पावन पवन को
और पवन ने उसे आम की कोमल
मंजरियों के सुगंध से भरकर
प्रिय वसंत से छुपाकर
ला रख दिया तुम्हारे मुख पर
कहो! मैं तुम्हारा मुख निहारू क्यों न !!

मैं अपना मुख छुपाऊँ क्यों न!

हाँ, तुम्ही ने रंगा गुलाल लाल
आँखे मैली हुई काली काजल से
पाला जो था पड़ा प्यारे पागल से
तुम्ही ने केश गूथे मेरे गजरे में
भरा जगत की मधु मनमोहनी माया
पूरी काली की मेरी सुंदर सोहनी काया
तुमने ही झकझोर सारी यौवन निराली
किया मुझे मोहक माधुरी से मतवाली
लज्जा आती नही तनिक तुम्हे!
अब कहो तुम ही कैसे
“मैं अपना मुख छुपाऊँ क्यों न”

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