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– डॉ. चंद्रेश कुमार छतलानी

विद्यालय के एक कक्ष में विद्यार्थी परीक्षा देने बैठे थे। कक्ष-निरीक्षक ने सभी को प्रश्नपत्र और उत्तरपुस्तिका बाँट दी थी। पहली घंटी बजी, जिसके बजते ही वह कक्ष-निरीक्षक हर परीक्षा की तरह मशीनी अंदाज़ में तेज़ स्वर में बोला, “दो घंटे का पेपर है। अभी आपके व्यतीत हुए हैं – शून्य घंटा शून्य मिनट।“
यह कहकर वह कमरे में चक्कर लगाने लग गया। कुछ समय बाद एक परीक्षार्थी ने पूछा, “सर टाइम कितना हो गया?”
उसने उत्तर दिया, “अभी आपके व्यतीत हुए हैं – चालीस मिनट। बचे हैं एक घंटा और बीस मिनट।“
और इसी प्रकार समयचक्र कक्ष-निरीक्षक के साथ ही चक्कर लगाता रहा। जितना व्यतीत होता उतना ही कक्ष-निरीक्षक थोड़ी-थोड़ी देर में परीक्षार्थियों को बताता रहता।
आख़िरी पंद्रह मिनट में कक्ष-निरीक्षक ने पुनः सभी परीक्षार्थियों को आगाह किया, “समय व्यतीत हो गया एक घंटा पैंतालिस मिनट। बचे है सिर्फ पंद्रह मिनट।“
उसी समय सबसे पीछे बैठे एक परीक्षार्थी ने पूछा, “सर, कितना समय व्यतीत हो गया?”
कक्ष-निरीक्षक का ध्यान कुछ कागजों को जमाने में था सो वह झल्लाया और “सुनाई नहीं देता” कहकर मुड़ा। लेकिन परीक्षार्थी को देखते ही उसकी मुद्रा बदल गई, चेहरे पर वात्सल्य के भाव आ गए।
वह उस परीक्षार्थी के पास गया और उसके कान में फुसफुसाया, “बेटा, तुम्हारे व्यतीत हुए – शून्य घन्टे शून्य मिनट… बहुत समय बचा है… अंदर जाकर और लिख लेना…“
वह परीक्षार्थी उस विद्यालय के ट्रस्ट के प्रबंध निदेशक का बेटा था।

 

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