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  – स्मिता सिंह

टीवी, लैपटॉप, कंप्यूटर, मोबाइल फोन…, ये सभी इलेक्ट्रॉनिक एप्लीएंशेज हैं, जिन्हें कोरोना महामारी के दौरान लोगों द्वारा सबसे अधिक इस्तेमाल किया गया। इसके बाद स्थान आता है किताबों का, जिन्हें लॉकडाउन में ऑनलाइन मंगाकर सबसे अधिक पढ़ा गया। लॉकडाउन के दौरान हमारे पूरे दिन का दो तिहाई से भी अधिक समय इन सभी के साथ गुजरा। जिस तरह से कोरोना पेंडेमिक के दो फेज को हमलोगों ने झेला, ठीक उसी तरह कोरोना महामारी के कारण देश भर में लगाए गए लॉकडाउन के कारण लोगों में दो तरह की मन:स्थिति बनी। वर्ष 2020 और वर्ष 2021 में लोगों खासकर स्त्रियों की स्क्रीन इंटरेस्ट भी अलग-अलग रूप में सामने आई। जब वर्ष 2020 में संपूर्ण देश में पहली बार लॉकडाउन लगाया गया, तो स्त्रियों के सामने यह प्रश्न था कि दिन भर के समय को कैसे बिताया जाए? जो वर्किंग वुमन थीं, उनके लिए तो “वर्क फ्रॉम होम’ निदान के रूप में पहले से ही उनके लिए उपलब्ध था। जो गृहणियां थीं, उनके सामने यह दुविधा थी कि घर के सभी कामकाज निबटाने के बाद वे बाकी बचे समय को कैसे बिताएं? क्योंकि बाजार से सब्जी-दूध, महीने का राशन लाने, सोशल वर्क, किटी पार्टी, एक-दूसरे के घरों से सौगात के आदान-प्रदान, परिधान खरीदने या विंडो शॉपिंग करने पर तो एकदम से ब्रेक लग गया। जहां सब्जी-दूध घर पर आने लगे, वहीं राशन का सामान एक बार में खरीदकर महीने भर के लिए स्टॉक कर लिया गया। फिर टाइम पास कैसे किया जाए, यह यक्ष प्रश्न स्त्रियों के सामने था।

उनके लिए जवाब बन कर आया-अपने जमाने का अति लोकप्रिय धारावाहिक रामानंद सागर का “रामायण’ और बी. आर.चोपड़ा का “महाभारत’। कहावत है कि पुराना चावल ही पथ्य के रूप में दिया जाता है। ठीक इसी तर्ज पर ये दोनों पुराने धारावाहिक इतने अधिक लोकप्रिय साबित हुए कि टीआपी के खेल में इन दोनों ने सास-बहू टीवी सीरियलों को बुरी तरह पछाड़ दिया। होममेकर सुनंदा ने बताया, “पहले मैं एक-दो हाई वोलटेज ड्रामा वाले सीरियल देखा करती थी। पर जब लॉकडाउन के दौरान “रामायण’, “महाभारत’ धारावाहिक शुरू हुए, तो लगा कि इनके सामने सभी टीवी सीरियल फीके हैं। दोनों धारावाहिकों के पात्रों के संवाद तो प्रेरणास्रोत के समान हैं। रिश्तों की मर्यादा, मर्यादा के उल्लंघन के दुष्परिणाम, असंभव से लगने वाले कार्यों को कैसे संभव बनाया जाए, यह सभी कुछ देखने व सीखने को मिला।’ इन दोनों धारावाहिकों के अलावा, सरल शब्दों में बताई गई “उपनिषद की कहानियां’ और “चाणक्य’ धारावाहिक भी देखे गए।

पहली बाए लगाए गए लॉकडाउन में एक बात और सामने आई कि उस दौरान अपने लक्ष्य के पीछे भाग रहा युवा भी भागमभाग भरे माहौल से ऊबा-थका हुआ था। इसलिए वह अपने परिवार के साथ सुकून के कुछ पल बिताना चाह रहा था। उन लोगों ने भी टीवी पर प्रसारित हो रहे पुराने धारावाहिकों को चाव से देखा। प्रकाशन विभाग से जुड़ी नीति अग्रवाल ने बताया, “रामायण’, “महाभारत’ के कुछ प्रसंग जो जीवन की आपाधापी में कहीं बिसर गए थे, वे दोबारा जेहन में आ गए। इन दोनों धारावाहिकों को परिवार के साथ बैठकर देखने से न सिर्फ नैतिक मूल्यों को अच्छी तरह जानने, बल्कि उन्हें आत्मसात करने का भी अवसर मिल गया। दूसरे शब्दों में कहें, तो चरित्र निर्माण में भी पुराने धारावाहिक सहायक साबित हुए।

अगर हम पुराने धारावाहिकों से अलग हटकर बात करें, तो कुछ धारावाहिक, जिनमें स्त्री को बदलते हुए दिखाया गया, यानी सीधी-साधी पति की हर बात को सिर झुकाकर मानने वाली लड़की बदल गई। वह प्रतिकार करने लगी और पति को उसके किए की सजा देने लगी, ऐसे सीरियल लॉकडाउन में खूब पसंद किए गए। इसमें सबसे ऊपर नाम है “अनूपमा’ सीरियल का। इस सीरियल की फैन श्वेता के मुताबिक लॉकडाउन में पतियों के घर पर रहने के कारण गृहणियों की जिम्मेदारियों और कार्यों में जबर्दस्त बढ़ोतरी हो गई। इसके दुष्परिणाम स्वरूप घरेलू हिंसा में वृद्धि भी देखने को मिली। यही वजह है कि स्त्रियों ने ऐसे सीरियल को अधिक पसंद किया। “अनूपमा’ की नायिका अनूपमा भी कुछ ऐसी ही स्त्री है। वहीं “कांच के शामियाने’ की लेखिका रश्मि रवीजा बताती हैं कि लॉकडाउन में पुरानी फिल्में देखने का भी एक अलग मजा है। उन्होंने लॉकडाउन में बहुत सारी पुरानी फिल्में देखीं। उनके अलावा, कई अलग-अलग शहरों में रह रहीं महिलाओं ने पुरानी फिल्मों को खूब देखा। इसके बाद स्थान आता है लाफ्टर शो का। महिलाओं ने लॉकडाउन में सबसे अधिक कपिल शर्मा के शोज टीवी या अलग-अलग सोशल साइट्स पर वीडियोज के माध्यम से देखे गए। इसके अलावा, सालों से प्रसारित हो रहा सीरियल “तारक मेहता का उल्टा चश्मा’ भी खूब देखा गया। मनोवैज्ञानिक आशा सिंह के मुताबिक, हंसाने वाले धारावाहिक हमें तनाव मुक्त करते हैं। हम चाहे कितने भी दुखी हों ऐसे सीरियल देखते समय हम हंसते जरूर हैं। ये तो बात हुई टीवी सीरियल की। एक सर्वे में यह बात सामने आई कि लॉकडाउन में भारतीय स्त्रियों की सक्रियता सबसे अधिक यू ट्यूब पर बढ़ी है।

ऐसी स्त्रियां, जो तरह-तरह के स्वादिष्ट व्यंजन बनाना जानती हैं तथा जो रसोई तथा दूसरे गृहकार्यों में बेहद दक्ष हैं, उनका हुनर लोगों के सामने उनके यू ट्यूब चैनल के रूप में सामने आया। न सिर्फ व्यंजन बनाने के तरीके और दूसरे गृहकार्यों के आसान तरीके सिखाने वाले यू ट्यूब चैनल की संख्या इस दौरान अत्यधिक बढ़ गई, बल्कि इन चैनलों की व्यूअरशिप भी महिलाओं ने खूब बढ़ाया। महिलाओं का समय यूट्यूब वीडियो को देखने में बहुत अधिक बीतने लगा। भारत के ज्यादातर घरों में यू ट्यूब के नुस्खे देखकर स्वादिष्ट व्यंजन बनाए और खिलाए गए। यूट्यूब के बाद दूसरे सोशल साइट फेसबुक पर भी महिलाओं की सक्रियता बढ़ी। फेसबुक पर मौजूद वीडियोज को देखने में भी उनका बहुत अधिक समय खर्च होने लगा। ये तो बात हुई देश में पहली बार लगे लॉकडाउन की। इस दौरान न सिर्फ कोरोना के संक्रमण की गति कम थी, बल्कि मरने वाले लोगों की संख्या भी कम थी। घरों में कैद लोग रोजगार खाेने से तनाव में तो थे, लेकिन कहीं न कहीं स्वयं को आत्मनिर्भर बनाने की कोशिश में जुटे थे। मृत्यु का भय कम होने के कारण वे टीवी सीरियलों और सोशल मीडिया में मनोरंजन तलाश रहे थे। वहीं कोरोना महामारी का जब दूसरा लहर आया और लोग लॉकडाउन के कारण दोबारा घरों में कैद हो गए, तो अलग-अलग न्यूज चैनलों पर उन्होंने कोरोना की भयावहता देखी। ऑक्सीजन और वेंटीलेटर की कमी के कारण दिल्ली, मुंबई, इंदौर आदि जैसे बड़े शहरों में लोगों को जूझते और दम तोड़ते हुए देखा। ऐसी स्थिति में टीवी सीरियल चाहे वे धार्मिक हों या सास-बहू के या फिर लाफिंग शोज, वे अपनों की मौत से गमगीन और बेजार लोगों के लिए मरहम साबित नहीं हुए।

डरी-सहमी महिलाओं ने इस बार यूट्यूब से सीखकर परिवार के सामने तरह-तरह के पकवान परोसना भी भूल-सी गईं। स्वास्थ्य सेवा से जुड़े सत्यम सिंह का मानना है कि पिछले लॉक डाउन में उतनी भयावहता नही थी। इसलिए आम जनमानस ने “रामायण’, “महाभारत’ के अलावा, “बुनियाद’, “हमलोग’, “देख भाई देख’ आदि जैसे पुराने सीरियल का भी भरपूर आनंद लिया।  इस बार ये टीवी सीरियल उतने कारगर साबित नहीं हुए। पूरा परिवार ही एक-दूसरे का संबल बना। इसी पारिवारिक बंधन ने राम बाण का काम किया। वहीं पेशे से वकील संजीव कुमार संजू हमसे एक बढ़िया जानकारी साझा करते हैं-इस बार कोविड की भयावहता मन-मस्तिष्क पर इतनी हावी थी कि लोग इस महामारी से बचने और पीड़ित होने पर दवा और जीवन रक्षक उपाय बताने वाले यूट्यूब वीडियो को खूब सर्च किया। के के अग्रवाल, नरेश त्रेहन आदि जैसे प्रसिद्ध चिकित्सकों के वीडियोज सबसे अधिक महिलाओं द्वारा ही देखे गए। महिलाओं ने उन वीडियो को खूब देखा और शेयर किया, जिनमें कोविड पीड़ित गर्भवती डॉक्टर ने कोविड के दुष्परिणामों से लोगों को आगाह किया। ऐसी महिला डॉक्टरों और नर्सों के वीडियो महिलाओं के बीच खूब देखे और शेयर किए गए, जिन्होंने अपनी जान की परवाह न कर और घर-परिवार से दूर रहकर कोविड संक्रमितों की सेवा की और उनकी जान बचाई।

दूसरे लॉकडाउन में ओटीटी (ओवर द टॉप मीडिया, जो सीधे इंटरनेट के माध्यम से व्यूअर्स तक पहुंचता है। यह इंटरनेट के माध्यम से जुड़े एप्लीकेशंस जैसे कि स्मार्ट फोन, स्मार्ट टीवी जैसे कि गूगल टीवी, एलजी इलेक्ट्रॉनिक्स, सेट टॉप बॉक्सेज आदि के माध्यम से प्राप्त किया जा सकता है। ) ने सभी का मन बहलाया। विशेषज्ञ मानते हैं कि दूसरी बार के लॉकडाउन में टीवी विफल रहा। सीरियल की बजाय न्यूज चैनल्स ज्यादा देखे गए। ओटीटी प्लेटफॉर्म से ही सबसे अधिक दर्शक जुड़े। ओटीटी से न सिर्फ महिलाएं, बल्कि ऐसे लोग भी जुड़े, जो टीवी न के बराबर देखते हैं। जानलेवा कोविड-19 के कहर से बचने के लिए सीनियर जर्नलिस्ट विनीता सिन्हा इन दिनों वर्क फ्रॉम होम कर रही हैं। उन्होंने बताया-मैं टीवी नहीं देखती, पर हाल ही में “नेटफ्लिक्स’ पर “एल्मा मैटर’ देखा। इससे पहले भी मैं अलग-अलग ओटीटी प्लेटफॉर्म पर कई वेबसीरीज देख चुकी हूं। ओटीटी प्लेटफॉर्म पर दिखाई जा रही वेबसीरीज की कहानियां लीक से हटकर होने के कारण दर्शकों का रूझान इस तरफ अधिक हो रहा है। वहीं पत्रकार वीणा वत्सल सिंह कहती हैं कि टीवी सीरियल आउट डेटेड हो गए हैं। अब तो नेटफ्लिक्स, प्राइम वीडियो आदि का जमाना है।

 

लॉकडाउन में पर्सनैलिटी डेवलपमेंट

समय काटने का बहुत अच्छा माध्यम है टीवी सीरियल। यदि प्रेरणादायी सीरियल है, तब तो सोने पर सुहागा। इसका देखने वाले पर कहीं न कहीं पॉजिटिव प्रभाव पड़ता है। जीवन की सीख मिलती है। कोविड महामारी के सेकेंड फेज में देखा गया कि टीवी सीरियल के अलावा, महिलाएं सोशल साइट्स से खूब जुड़ीं। यू ट्यूब से बहुत सी महिलाओं ने कई हॉबीज सीखी, कुकिंग में बहुत तरह के प्रयोग किए। उन्होंने अपने यू ट्यूब चैनल स्टार्ट कर दूसरों को भी सिखाया। जो महिलाएं काम नहीं कर रही थीं, उन्होंने ऑनलाइन कोर्सेज ज्वाइन कर लिया। फेसबुक और वाट्सएप के जरिये वे दोस्तों से भी कनेक्टेड रहीं। उनसे बातचीत करके अपने मन की बात को शेयर किया। इससे उनकी न सिर्फ एंग्जाइटी कम हुई, बल्कि बेहतर महसूस किया। उन्होंने देश-दुनिया के बारे में भी जानने की कोशिश की। अपने-अपने हुनर जैसे सिंगिग, पोएट्री, पेंटिंग, डांसिंग आदि के बारे में अपने वीडियोज के माध्यम सेे दूसरों को बताया। उन्होंने मैसेज ऑफ होप भी भेजा। कुलमिलाकर, लॉकडाउन में उनकी पर्सनैलिटी डेवलपमेंट हुई।

  • आरती आनंद, वरिष्ठ मनोवैज्ञानिक, सर गंगाराम हॉस्पिटल

 

दूसरे फेज में डिपेंडेंसी स्टेट हुआ प्रभावी

देश में लगे लॉकडाउन को दो भाग में बांट कर हमें देखना चाहिए। पहली बार जब लॉकडाउन लगा, तो दिन में दो बार सुबह शाम “रामायण’-“महाभारत’ दिखाया जाता था। पुराने शोज जैसे “श्रीमान श्रीमती’ आदि भी शुरू हो गए थे। इससे महामारी से सशंकित लोगों का मन बहल जाता था। उस समय कोरोना नया था। लोगों के अंदर यह डर था कि इस बीमारी से हमें बचकर रहना है। मास्क पहनकर या दूरी बरतकर रहना है, आदि जैसे प्रिकाॅशन भी बरतते थे। लोगों में यह आशा थी कि आने वाले समय में सब ठीक हो जाएगा। साल के आखिर तक लोग यह भूल चुके थे कि कोरोना जैसी महामारी फैली थी। इसलिए लोगों ने अपने-आप ढील लेनी शुरू कर दी। बीमारी को फॉर ग्रांटेड लेना शुरू कर दिया। इस बार के लॉकडाउन में सभी के मन में एक दहशत बैठ गई। लोग पैनिक स्टेट में आ गए। उनके दिमाग पर सट्रेस और ट्रॉमा हावी हो गया। लोगों ने टीवी सीरियल देखना छोड़ दिया, लेकिन बीमारी के बारे में जानकारी हासिल करने के क्रम में यूट्यूब से जुड़ गए। ओटीटी प्लेटफॉर्म और प्रोग्राम एप्स आदि से ज्यादा जुड़ गए। इस बार न्यूज की तरफ लोगो ज्यादा खिंचे। लोगों की बातचीत में भी फर्क आ गया। पहले लोग केसेज के बारे में चर्चा नहीं करते थे। इस बार घर-घर में केसेज और डेथ आदि के बारे में चर्चा होने लगी। वैक्सीन के बारे में ज्यादा चर्चा करने लगे। यह सही नहीं है, क्योंकि यह इंसान को डिंपेंडेंसी स्टेट में ले आता है। कुछ लोगों के लिए न्यूज सिर्फ इन्फॉरमेशन या नॉलेज का स्रोत है। जो लोग सीखना चाहते हैं, उनके लिए यह बेहतर अवसर है। वीडियोज पर कई कोर्सेज आ गए हैं, जिन्हें महिलाएं भी सीख रही हैं।

  • नभित कपूर, साइकोलॉजिस्ट, टेड एक्स स्पीकर और ऑथर

  • वरिष्ठ स्वतंत्र पत्रकार

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