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सुकून, शांति, आनंद और सरसता का एहसास कराने में पूर्णतया सक्षम है संगीत ! : मुरारी मधुकर

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”  सुर और ताल के साथ, शब्दों द्वारा अभिव्यक्त फिल्मी गीत भी साहित्य  है !”:  सिद्धेश्वर

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पटना : 07/03/2022 ! ” आज के समय में मानव के दुखी और अवसादग्रस्त होने का एक बड़ा बुनियादी कारण है तन की तंदुरुस्ती और मन की खूबसूरती पर ध्यान नहीं देना। लोग अनुचित तरीके से धन संग्रह को ही सुख समझकर चल रहे हैं जबकि सच्चाई यह है कि धन से केवल भौतिक हसरतें ही पूरी होती है । इस तरह से धन भौतिक संसाधनों को प्राप्त करने का महज साधन-मात्र है, न कि सुख का स्रोत । सुख एक अदृश्य अनुभूति है जिसका संबंध तन की सेहत और मन की शांति से है यदि ये दोनों चीजें जीवन में नहीं है तो असीम संपदा का कुछ भी सार्थकता नहीं है और इस सब को पाने का सहज माध्यम संगीत है l  गीत- संगीत जीवन का एक ऐसा प्रभावकारी नैसर्गिक पक्ष और पहलू है जिसका श्रवण हमें सुकून, शांति, आनंद और सरसता का एहसास कराता है। चिकित्सा विज्ञान भी गीत-संगीत को मूड डिसऑर्डर को ठीक करने वाला एक कारगर थेरेपी बताता है। मैं महसूस करता हूं कि प्रत्येक व्यक्ति को अगर गीत-संगीत से रूचि हो जाए तो मनोविकार का उन्मूलन और सामाजिक सुधार हो सकता है आज मेरे द्वारा प्रस्तुत गीत बहुत ही श्रुतिकर और खूबसूरत है जो जीवन के यथार्थ से संबधित दर्शन से हमें रूबरू कराता है। ”

भारतीय युवा साहित्यकार परिषद के तत्वाधान में, फेसबुक के “अवसर साहित्यधर्मी पत्रिका” के पेज पर, ” हेलो फेसबुक संगीत सम्मेलन” के मुख्य अतिथि मुरारी मधुकर ने उपरोक्त उद्गार व्यक्त किया !

उन्होंने विस्तार से संगीत की प्रासंगिकता पर कहा कि -“साहित्य, सिनेमा और गीत-संगीत का इंद्रधनुष  सरहदों के ऊपर से एक छोर से दूसरे छोड़ तक फैलता है – ठीक उसी तरह से जैसे- पंक्षी, नदिया, पवन के झोंके, कोई सरहद इन्हें ना रोके। भारत और पाकिस्तान मुल्क भले ही दो हों लेकिन दोनों ही एक-दूसरे के गीत-संगीत और साहित्य को सुनने-पढ़ने का एक मिजाज रखते हैं !”

अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में सिद्धेश्वर ने कहा कि-“अधिकांशत फिल्मी गीत साहित्यिक प्रकृति से परिपूर्ण होते हैं ! पुराने फिल्मी गीत आज भी इतनी लोकप्रिय है कि नए कलाकार भी उन  गीतों पर ही अपना रियाज करते हैं,  आज भी वह सर्वाधिक सुने और पसंद किए जातें हैंl  उन गीतों में कथ्य, शिल्प, लय, भाव, प्रवाह, वज़न सभी कुछ सहज भाव से संप्रेषित होता हैl  इसलिए हम कह सकते हैं कि सुर और ताल के साथ, शब्दों द्वारा अभिव्यक्त फिल्मी गीत भी साहित्य है, क्योंकि तमाम कोशिशों के बावजूद गुलजार, नीरज, बच्चन,  कैफ अज़ीमाबादी, प्रदीप, संतोष आनंद, सुल्तानपुरी आदि जैसे तमाम कवियों को साहित्य से अलग नहीं किया जा सका है ! ये लोग अपनी छवि आज भी साहित्य में बनाए हुए हैं और भविष्य में भी इनकी छवि ऐसी बनी रहेगी , इसमें कोई संदेह नहीं ! ”

संगीतमय प्रस्तुति के अंतर्गत,  फिल्मी संगीत पर मीना कुमारी परिहार ने नृत्य और सिद्धेश्वर ने अभिनय की शानदार प्रस्तुति दी l  दूसरी तरफ  बाबा भोलेनाथ पर सतेंद्र संगीत ने लोक गीत,  धर्मवीर कुमार शर्मा, नागेंद्र राशिनकर , वीणाश्री हेंब्रम,  प्रतिभा अग्निहोत्री, डॉ. शरद नारायण खरे, गजानंद पांडे आदि ने कई पुरानी फिल्मी गीतों को अपना स्वर देकर श्रोताओं का मन मुक्त कर दिया l

कार्यक्रम के दूसरे सत्र में “मेरी पसंद : आपके संग” के तहत, गया के अजीत कुमार ने – अपनी कविता बड़े-बड़े विषधर आज विषहीन हैं !, गाजियाबाद की शैलजा सिंह,  वैशाली के अपूर्व कुमार ने अपने पसंद के कवि, राज प्रिया रानी ने अपनी और अपने पसंद के कवि सिद्धेश्वर की कविता को प्रस्तुत किया l  इसके अतिरिक्त गोपालदास नीरज दुष्यंत कुमार, कमल,  राजेश शुक्ल,  आदि की कविताओं को भी प्रस्तुत किया गया !

इस कार्यक्रम में डॉ. संतोष मालवीय,  मधुरेश नारायण, ऋचा वर्मा, डॉ. सुशील कुमार,  दुर्गेश मोहन,दिलीप,  आदि की भी भागीदारी रहीl

( प्रस्तुति:ऋचा वर्मा ( सचिव)/ और सिद्धेश्वर ( अध्यक्ष ): भारतीय युवा साहित्यकार परिषद, पटना मोबाइल 9234760365

 

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