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– वंदना संजयजी भंसाली

“ओहो मां, आज दिवाली के दिन भी आप इतनी देर से घर आई हो। हम दोनों कब से आपका रास्ता देख रहे हैं।”
“कैसे आती बेटा? आज दिवाली के दिन भी मैं तुम्हारा मुंह मीठा करने का कोई प्रबंध नहीं कर पाई।” कहकर मंगला आंसू बहाने लगी।
“तो यह बात है । आप इसलिए उदास हो । अभी रुको..”
कहते हुए पिंकी भीतर से हाथ में एक स्टील का पुराना डिब्बा लेकर आई।
“लो मां, मुंह मीठा करो और दीये जलाओ…”
“यह कहां से लाई हो तुम ? तुमने किसी के पैसे चुराए हैं?”
“अरे मां! आपने हमें ऐसा करना कब सिखाया ? यह तो हमारे जे़ब ख़र्च की बचत है।”
“आपको याद है आपने हमे विजयादशमी का मेला देखने के लिए बीस-बीस रुपये हम दोनों भाई – बहन को दिया था। हम उस दिन मेले में तो गए पर पैसे खर्च नहीं किए। आज मैंने बीस रुपये का गुड़ खरीदा और उसमें बासी रोटी मिलाकर यह लड्डू बना दिया।

बबलू ने अपने बीस रुपये का तेल खरीदा और यह दो मिट्टी के दीये भी।”
“चलो मां, अब तैयार हो जाओ और दीये जलाओ हम दिवाली मुंह मीठा कर दीये जला कर के मनाएंगे।” बबलू ने कहा।
मंगला ने दोनों बच्चों को गले से लगा लिया । खुशी से उसके आंसू गिर पड़े, फिर तीनों ने मिलकर दीये जलाएं और गुड़ तथा बासी रोटी की बनी अपनी स्वादिष्ट मिठाई खाई।

– नागपुर महाराष्ट्र
नोट – कॉपी राइट कलाकृति सिद्धेश्वर

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