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सावन का गीत प्रकृति का अद्भुत संगीत है!: सिद्धेश्वर
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” हाथी ना घोड़ा ना कौनो सवारी, हे भोले बाबा पैदल हमारी सवारी!: सत्येंद्र संगीत
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पटना : 08/08/2022! ” फिल्मी गीत हो या साहित्य, सावन को देखने का नजरिया चाहे जो भी रहा हो, लेकिन उसमें आपको कहीं न कहीं संगीत तो नजर आएगा ही l महाकवि कालिदास ने भी अपने महाकाव्य मेघदूतम की रचना सावन मूड में ही की थी, यह माना जाता है l इसमें उन्होंने अपने मायके गई पत्नी की याद में कविराज को बेचैन दिखाया हैं l यानी बात विरह की हो या मिलन की, सावन संगीत के रूप में परिवर्तित नजर आती ही है l औऱ यही संगीत हमारे जीवन में किसी न किसी रूप में हमारे जीवंतता को बरकरार रखती है l बरखा रानी जरा जम के बरसो / रिमझिम के गीत सावन गाए, हाय भीगी भीगी रातों में/ आया सावन झूम के/ कुछ कहता है यह सावन/ टिप टिप बरसा पानी/ सावन के झूले पड़े तुम चले आओ/ बदरा छाए के झूले पड़े /बदरा रे बरसो रे/ बिन सावन बरसे / लगी आज सावन की झड़ी है जैसी ना जाने कितने मधुर गीत दिन-रात रेडियो और टीवी मोबाइल के माध्यम से हमारे कानों में गूंजते रहते हैं और हमारे हृदय को रोमांचित करते रहते हैं l इसलिए कहा जा सकता है कि सावन का गीत प्रकृति का अद्भुत संगीत है l”
भारतीय युवा साहित्यकार परिषद के तत्वाधान में फेसबुक के ” अवसर साहित्यधर्मी पत्रिका ” के पेज पर, हेलो फेसबुक संगीत एवं चित्रकला सम्मेलन की अध्यक्षता करते हुए उपरोक्त उद्गार संयोजक सिद्धेश्वर ने व्यक्त किया l
मुख्य अतिथि लोकप्रिय गायक सत्येंद्र संगीत ने, आधे घंटे तक अपनी संगीत की लाइव प्रस्तुति देते हुए कहा कि – ” ग्रीष्म ऋतु के बाद सावन का आना बड़ा मनभावन होता है! सुखी हुई धरती औऱ मुरझाये हुए चमन के बीच, वर्षा की फुहार और चारों तरफ छाई हुई धरती की हरियाली हमारे भीतर संगीतमय उत्सव जैसा उल्लास पैदा करता है l बाबा भोले पर उन्होंने बहुत ही मनोरम गीत प्रस्तुत किया- “: हाथी ना घोड़ा ना कौनो सवारी, हे भोले बाबा पैदल है हमारी सवारी! ”
संगीत सम्मेलन के विशिष्ट अतिथि डॉ .शरद नारायण खरे ने कहा – कजरी व सावन गीतों की आनंद में डुबो देने वाली स्वर लहरियों के अलावा हमें फिल्मी पार्श्व गीत-संगीत भी सदा खुशी व उल्लास देता रहा है।बरखा रानी जरा जमके बरसो,लगी आज सावन की फिर वो झडी है,सावन का महीना पवन करे शोर,तुम्हें गीतों में ढालूंगा सावन को आने दो–जैसे गीतों से मन प्रसन्न हो जाता है। सावन में गीत,चाहे वे लोकगीत हों या फिल्मी,मौसम के आनंद को दुगना कर देते हैं।गीतों की मस्ती इंसान की मस्ती से मिलकर अंतर्मन को नि:संदेह आह्लादित कर देती है। ” गूंज रहे हैं गीत अब,सावन का है दौर।,हिय में आने लग गए,प्रेमभाव के बौर।।”
मुख्य वक्ता ऋचा वर्मा ने कहा कि – ” चिलचिलाती गर्मी के बाद अचानक वर्षा की बूंदे जब धरती पर पड़ती हैं और सोंधी -सोधी खुशबू उठती है तो मन मयूर स्वत‌: ही प्रफुल्लित हो नाचने लगता है ,हृदय में संगीत लहरियां अंगड़ाई लेने लगती हैं.. । सावन और संगीत का रिश्ता बहुत ही प्राकृतिक और पुरातन रहा है। सावन की बरसती बूंदों में खुद ही एक संगीत होता है । वर्षा की बूंदे तो एक ही जैसी होती हैं लेकिन विभिन्न सतहों जैसे की छत ,जमीन ,किसी बर्तन, हमारी काया ,या हमारे हृदय .. जहां भी इसकी बूंदे पड़ती हैं अलग-अलग तरह की तरंगे और ध्वनियां पैदा करती हैं। -बादलों को देखकर तो राम का हृदय भी संगीतमय हो उठा था। सीता की खोज में जैसे ही वह निकले वर्षा ऋतु आ गई , उनका दिल अभिभूत हो गया और वह कह उठे,बरषा काल मेघ नभ छाए। गरजत लागत परम सुहाए।।,परंतु तत्क्षण सीता को याद कर उनका मन दुखी भी हो जाता है और वह कह उठते हैं!”घन घमंड नभ गरजत घोरा। प्रिया हीन डरपत मन मोरा॥”
संगीत से विशेष लगाव रखने वाले मुरारी मधुकर ने कहा कि -मधुर और मनभावन सावन की महिमा को कवियों ने अपनी रचनाओं में खूब स्थान दिया है । फिल्मी गीत -संगीत का तो कहना ही क्या! एक से एक बढ़कर सावन पर गीतकारों ने गीत लिखा है जो सावन का सुंदर परिदृश्य उपस्थित करता है l सावन के मनभावन परिदृश्यों में ग्रामीण गलियों में नजर आते सनपुरिया लाने वाले, घर घर जाकर वैना बांटती ठकुराइन , बाग- बगीचा में झूला झूलते महिलाएं और बच्चे तथा शिव पूजन के लिए लोगों का हुजूम बहुत ही मनभावन छटाएं होती हैं। परंतु आज के प्रदूषण भरे समाज में पहले जैसा सावन का रंग और स्वरूप दिखाई नहीं देता ।आज के अति भौतिकतावादी समय में मानव के स्वभाव में जो विकार आया है, उससे प्रकृति बहुत ही कुंठित और नाराज है। सूखे सरोवर, विलुप्त ग्रामीण कुंऐं, एवं गर्मी की अधिकता का एहसास ,ये सब प्रकृति की नाराजगी के बोधक हैं।आज पहले जैसा सावन का परिदृश्य दिखाई नहीं देता है। निश्चित रूप से सावन भी आज आम आदमी की प्रकृति विरोधी कार्यों से खफा है। निश्चय ही, अतीत का सावन बहुत मनभावन था। तभी तो इसकी सुंदरता के अनुकूल ही अनेक सुंदर गीत लिखे गए।”
उत्तर प्रदेश के युवा कलाकार आशीष आनंद आर्या की दो दर्जन कलाकृतियां प्रदर्शित की गई lसमृद्धि गुप्ता ने लोकगीत कजरी -घिर आइ है कारी बदरिया, तेरे बिन जी लागे ना!”- बहुत ही मार्मिक अंदाज में प्रस्तुत किया!अपूर्व कुमार (हाजीपुर ) ने आजादी की अमृत महोत्सव के अवसर पर देशभक्ति गीत प्रस्तुत किया – है प्रीत जहां की रीत जहां मैं गीत वहां का गाता हूं भारत का रहने वाला हूं भारत की बात सुनाता हूं, का बेहतरीन प्रस्तुति दिया l मीना कुमारी परिहार ने साथ चली फूल तोड़े फूलवरिया साथ में सहेलियां ना!” पर नृत्य प्रस्तुत किया lअनु सिन्हा ( नई दिल्ली ) ने कथक नृत्य और संगीत प्रस्तुत किया आस्था दीपाली (नई दिल्ली ) ने ।नृत्य एवं संगीत की कई बेहतरीन प्रस्तुतियों ने दर्शकों का मन मोह लिया l
सत्येंद्र संगीत ने – ” दिल में किसी के प्यार का जलता हुआ दिया!” मधुरेश नारायण ने – ” दिल का आलम मैं क्या बताऊं तुझे!”/ विजय कुमार मौर्य (लखनऊ ) ने – ए री सखी लेकर हाथ में तिरंगा!”/डॉ पूनम सिन्हा श्रेयसी ने – ” कहां हति अपने, बदरवा घिर आएल,हरी हरी चूड़ियां काहे न खनके, माथे पर बिंदिया काहे ना चमके, पायलिया बाजे ना! / मुकेश कुमार ( मध्य प्रदेश )ने- एहसान तेरा होगा मुझ पर, दिल कहता है तो कहने दो, मुझे तुमसे मोहब्बत हो गई है!, मुझे पलकों की छांव में रहने दो!” जैसे मधुर गीतों को सुना कर इस ऑनलाइन कवि सम्मेलन को एक ऊंचाई प्रदान किया ! इनके अतिरिक्त अशोक कुमार,,कीर्ति काले, सपना शर्मा, हरि नारायण हरि, चाहत शर्मा, अंजना पचौरी, पुष्पा शर्मा,पुष्प रंजन , नीरज सिंह, संतोष मालवीय,दुर्गेश मोहन, डॉ सुनील कुमार उपाध्याय आदि की भी दमदार उपस्थिति रही l

प्रस्तुति :ऋचा वर्मा (उपाध्यक्ष ) / एवं सिद्धेश्वर ( अध्यक्ष )भारतीय युवा साहित्यकार परिषद ////// मोबाइल :92347 60365

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