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– ओम प्रकाश राय यायावर

 

गतांक से आगे …

21

अचानक से काव्या का आश्रम छोड़ चले जाना एक सदमा-सा था किसलय के लिए। उसमें जीवन के प्रति एक विचित्र निर्मोह का भाव पैदा हो गया। वह बार-बार उस घटना को याद करता और अपने कृत्यों पर पश्चाताप करता। उसका मन क्षोभ और ग्लानि से भर जाता। इस वक्त किसलय के पास ऐसा कोई न था, जिससे वह अपने दर्द को
बयां कर पाता। एक आलम्ब जो था, वह भी दूर हो चुका था। दिनभर वह कमरे से बाहर नहीं निकलता और संताप की आग में अंदर ही अंदर जलता रहता। किसलय का मन बार-बार भर जाता और आँखों से आँसू झरने लगते। वह बिल्कुल निस्तेज हो चुका था। वह सोच नहीं पा रहा था कि करे तो क्या करे? खैर, किसी तरह दिन गुजरते
रहे। उस दिन अंधेरा होने पर नौकर कमरे में रौशनी करने आया, तो देखा किसलय सोया था। खाने के वक्त दुबारा नौकर कमरे में आया, तो किसलय से उसके स्वास्थ्य के बारे में पूछा। खाना खाकर किसलय जब पुन: कमरे में लौटा, तो अचानक से आज
उसे पूजा की याद आयी। पूजा से बात किये हुए भी इधर कई दिन हो गये थे। उसने झटाइ खोला और पूजा को ढूँढ़ने लगा। संयोग से वह ऑनलाइन दिख गयी। दिल में थोड़ी सी तसल्ली हुई। आज बात की शुरुआत किसलय ने ही की। अभिवादन के बाद किसलय ने कुशल क्षेम पूछा।
किसलय : मैं आज बहुत परेशान हूँ।
पूजा : ऐसा क्या हुआ?
किसलय : मैं आपको देखना चाहता हूँ। आपने तो धोखे से मुझे देख लिया था, पर मैं तो आपकी आँखों के सिवा कुछ देख ही नहीं पाया।
पूजा : ओ, हो…।
आपका रसिया ।
किसलय : जब भी आपसे बात करता हूँ, तो एक काल्पनिक चेहरा उभरता है कि शायद आप ऐसी हों, लेकिन दिमाग कहता है कि क्या पता, वो कैसी है? मैं हर बार अपने आप को समझाता हूँ कि जिसकी आँखें इतनी सुन्दर हो, वह भला कितनी सुन्दर होगी?’’
पूजा : आप परेशान न हों, मैं सुन्दर भी हूँ।
किसलय : मेहरबानी करके अपनी एक तस्वीर तो भेजिए।
पूजा : नहीं, मैं तस्वीर नहीं भेजना चाहती। हम जब सामने से मिलेंगे, तो आप ठीक से मुझे देख लीजिएगा।
किसलय : मुझे विश्वास नहीं होता कि हम फिर कभी मिल पाएंगे।
पूजा : अरे, ऐसा क्यों?
किसलय : मेरी सारी जिजीविषा खत्म होती जा रही।
पूजा : मैं अभी हिमाचल आयी हूँ अपने परिवार के कुछ सदस्यों के साथ। सच कहें तो यहाँ की प्राकृतिक छटा ने मुझे भी विगत कई दिनों से आपको याद करने पर मजबूर
कर दिया है।
किसलय : मतलब दोष प्रकृति का है अन्यथा आप थोड़े ही याद करतीं।
पूजा : ऐसा नहीं, मैं आपको हमेशा याद करती हूँ, लेकिन आप तो भूलकर भी मुझे याद नहीं करते।
किसलय : तो बताइए मुझे आपसे मिलने के लिए क्या करना होगा? मुझे इस वक्त आपकी बेहद सख्त जरूरत है।
पूजा : तो फिर चले आइए शिमला। घर वाले कल चले जाएंगे और मैं आपके लिए कुछ दिन और ठहर जाऊँगी।
किसलय ने इस बार खुद से पहल कर संपर्क सूत्र संख्या का आदान-प्रदान किया।
अगले दिन वह शिमला के लिए निकल पड़ा। वह शिमला की एक सर्द शाम थी, जब किसलय पूजा को भीड़ में ढूँढ़ने की कोशिश कर रहा था। चूँकि किसलय ने पूजा को अच्छे से देखा तो था नहीं, इसलिए परेशानी हो रही थी। पूजा ने जब बताया कि वह चर्च के ठीक सामने खड़ी है, तो किसलय उस तरफ बढ़ा। पूजा ने दूर से ही किसलय
को पहचान लिया। एक लड़की को अपनी तरफ आते देख, उसे लगा कि शायद वही हो, उसने उसकी आँखों में झाँकने को कोशिश की। उस लड़की ने पास आते ही किसलय को हग किया। किसलय के पाँव तले जमीन खिसक गयी। वह पूजा ही थी।
उसने किसलय के बाएं हाथ को अपनी हाथों में थामे बोली, ‘‘चलिए, बहुत इंतजार कराया आपने। अकेली मैं कब से बोर हो रही थी।’’ किसलय सोचता रहा, कमाल की लड़की है। उसके व्यवहार से ऐसा लगा, जैसे वह वर्षों से किसलय को जानती हो। वह किसलय का राय जाने बगैर बहुत कुछ बताने लगी। एकदम से नया अनुभव था किसलय के लिए। काव्या से कितने विपरीत स्वभाव की थी यह लड़की। जैसे चुप होना इसने सीखा ही न हो। वह जब मटक-मटक के चलती, तो उसके लम्बे बाल लहर जाते। सांवली-सी पूजा बड़ी क्यूट लग रही थी। उसके अंग-अंग उसके स्टाइलिश होने की गवाही दे रहे थे। इधर-उधर टहलने, पॉप कॉर्न खाने और कॉफी पीने के बाद दोनों रिज मैदान के आखिरी छोर पर रखे बेंच की ओर बढ़े। कुछ देर तक दोनों लोहे के सीखचों को पकडे़-पकड़े गहरी घाटी को देखते रहे। चेहरा जरा-सा भी दीवाल से बाहर घाटी की ओर लटकाने पर ठंडी हवा चेहरे को चीरते हुए निकल जाती और उसके बाल मचल कर उसके चेहरे को ढँक लेते। दोनों अब इत्मीनान से पास ही में रखे बेंच पर बैठ अपने-अपने विचारों में तल्लीन हो गये। ऐसा लगा, जैसे भयंकर तूफान के बाद भयावह शांति छा गयी हो। दूर पर्वत शृंखलाओं की सुंदरता लोगों का ध्यान अनायास अपनी ओर खींच रही थी। पूजा ज्यादा देर अपने आप को रोक नहीं पायी, उसने चुहल की, ‘‘अब बताइए सामने से भी आपने देख लिया, मैं कैसी हूँ? आपकी कल्पना से बेहतर या कमतर? हाँ कल्पना के सादृश्य तो नहीं हो सकती, क्योंकि ऐसे में कल्पना और सच का भेद ही मिट जाएगा।’’
किसलय उत्तर देने की बजाय फीकी हँसी हँसता रहा।
‘‘अब शरमाइए मत, बता भी दीजिए। कम्पलीमेंट न सही, कमेंट तो दीजिए।’’ वह मुस्कुराती रही।
‘‘आप बहुत अच्छी हैं। मेरी क्या बिसात, जो आप को कुछ कह सकूँ।’’
‘‘नहीं, नहीं, ऐसा नहीं है। आप कवि लोग किसी को कुछ भी कह सकते हैं। पूरी आजादी और छूट तो, जैसे आप ही लोगों के पास है।’’ दोनों देर तक हँसी-ठिठोली करते रहे। एक-दूसरे से मिलने की खुशी दोनों को थी। काफी देर बाद किसलय गंभीर हो बोला, ‘‘मुझे आपसे एक मदद चाहिए।’’
‘‘बेशक! बताइए, मैं क्या मदद कर सकती हूँ आपकी?’’
‘‘मुझे आपका साथ चाहिए।’’
‘‘साथ…..किस बात के लिए, क्या अभी मैं आपके साथ नहीं हूँ।’’ पूजा पर अभी तक मसख़री का नशा छाया हुआ था।
‘‘मेरा मतलब ये नहीं…।’’
‘‘अरे, मुझे तो लगा आप हाथ माँगने वाले होंगे, पर आप तो हाथ की बजाय साथ माँग रहे, ऐसा क्यों?’’
किसलय ने बेहद चालाकी से काव्या से संबंधित घटनाओं को बड़े सलीके से प्रस्तुत किया। उसने बहुतेरी बातों को छुपा लिया और अंत में इतना कहा, पता नहीं वो इस वक्त कहाँ होगी?
पूजा काव्या के बारे में बस इतना जान पायी कि वह सामाजिक कार्यों के लिए बगैर किसी को बताए, कहीं दूर निकल गयी है।
‘‘तो अब मुझे क्या करना होगा?’’
‘‘मैं चाहता हूँ कि आप काव्या की मित्र होने के नाते उसकी खोज में मेरी मदद करें।’’
‘‘काव्या कोई छोटी बच्ची है, जो खो गयी और अब ढूँढ़ा जा रहा है। जो खो जाते हैं, उन्हें ढूँढ़ा जाता है, जो जानबूझ कर खो जाएं, उन्हें ढूँढ़ना बहुत मुश्किल है और फिर हम लोग उसे ढूँढ़ेगें कहाँ, कोई सुराग भी तो नहीं उसका।’’
‘‘हम पूरे भारतवर्ष को छान मारेंगे। कहीं न कहीं तो वह होगी।’’
‘‘क्या भारतवर्ष इतना छोटा है? जो आप एक व्यक्ति को इतनी आसानी से ढूँढ़ पाएंगे?’’
‘‘नहीं, मैं जानता हूँ ये काम इतना आसान नहीं, पर ये भी जानता हूँ काव्या कहीं चुपचाप नहीं बैठ सकती। वह जहाँ भी होगी, उसकी आभा से कोसों तक रोशनी हो रही होगी।’’
‘‘आप पागलपन कर रहे हैं, यह कार्य बहुत दुरूह है।’’
‘‘जानता हूँ, पर आदत से मजबूर हूँ।’’
‘‘और अगर हम लोगों ने विज्ञापन की मदद ली, तो क्या उसे ढूँढ़ने में आसानी नहीं होगी?
‘‘ये कदम खतरनाक होगा, वह अगर जान गयी, तो दूसरा कदम भी उठा सकती है, इसलिए ऐसा सोचना निहायत ही मूर्खता होगी।’’
‘‘तो आपके अनुसार अब हमें क्या करना चाहिए?’’
‘‘मुझे दो-तीन दिन का समय चाहिए, ताकि मैं आराम से योजना बना सकूँ। तब तक हम लोग शिमला की सैर भी कर लेंगे।’’
‘‘शायद आप पहली बार शिमला आये हैं?’’
‘‘हाँ, मैं यहाँ पहली बार आया हूँ। बचपन से शिमला आने का ख्वाब देखता रहा हूँ, पर कभी मौका हाथ न आया था।’’
‘‘माना हमने भागदौड़ कर किसी तरह उसे ढूँढ़ भी लिया, तो बदले में मुझे क्या मिलेगा?’’
‘‘आपको आपकी दोस्त मिल जाएगी, ये क्या कम है?’’
‘‘लेकिन आप फिर से बिछड़ जाएंगे, बस यही तो एक गम है।’’
‘‘आप तो शायरी भी करने लगीं।’’
‘‘अब एक शायर के साथ हूँ, तो इतनी गुस्ताखी तो हो ही जाएगी।’’
पूजा का मन यह सब सुन बहुत खट्टा हो गया। कहाँ तो कैसी-कैसी उम्मीदें और सपनों के साथ वह शिमला में किसलय का इंतजार कर रही थी और अब कुछ और ही होने लगा। उसे थोड़ा बहुत काव्या के प्यार में किसलय के दीवानगी का आभास हो रहा था, पर इसके बावजूद वह खुश थी कि कुछ भी हो, इसी बहाने वह इस दीवाने शायर के साथ तो रहेगी। सो मन में एक ओर खुशी के भाव भी उठ रहे थे। तीन दिन की जगह एक सप्ताह गुजर गया, पर दिल शिमला छोड़ने को तैयार न था। माल रोड की सैर दिनभर में दो-तीन बार दोनों कर लेते। शाम को रिज मैदान की बेंच पर बैठ ठंडी हवाओं का आनन्द लेते। कभी-कभार घुड़सवारी का भी लुत्फ उठाया जाता।

एक सुबह दोनों जाखू मंदिर जा रहे थे। दो कि. मी. की ऊँची चढ़ाई थी, पूजा के पैर जब लड़खड़ाने लगते, तो किसलय उसे अपनी हाथों का सहारा देता। पूजा की उपस्थिति ने किसलय के विकल मन को थोड़ी-सी स्थिरता जरूर प्रदान की, पर काव्या को वह भूल नहीं पा रहा था। होटल के कमरे से खिड़की के पीछे देवदार के ऊँचे-ऊँचे वृक्ष से घिरा शिमला पहाड़ों का नयनाभिराम दृश्य प्रस्तुत कर रहा था। किसलय को शिमला बहुत अच्छा लगा। उसने चैल और कुफरी घूमने की इच्छा जतायी और फिर एक रोज दोनों वहाँ भी पहुँच गये। अगले दिन वे शहर छोड़ने वाले थे, पर किसलय ने अभी तक कोई योजना नहीं बनायी थी। दोनों देर रात तक अपने-अपने कमरे में अपनी- अपनी उधेड़बुन में लगे रहे। किसलय यह सोचता रहा कि अब काव्या को ढ़ूँढ़ना कैसे
संभव होगा, तो दूसरी ओर पूजा सपनों से मोहक शिमला में बिताये इन पलों को अपनी
यादों के पिटारे में सहेजती रही।

22
काव्या का मन भी अवसाद से भर गया था। वह भी तय नहीं कर पा रही थी कि अब आगे क्या किया जाए? पलभर में सब किये-कराये पर पानी फिर गया था। बहुत मेहनत से उसने इतना कुछ संभाला और संवारा था। उसी रात वह देवधा से पटना के लिए निकल गयी थी। पटना जंक्शन के प्लेटफार्म पर बैठे-बैठे उसके बेचैन मन में ये भाव आया कि कुछ करने से पहले मुझे एक बार भारतवर्ष को अच्छे से देखना चाहिए। वह
वर्षों से सोच रही थी कि काश! कभी ऐसा होता जब मैं भारतवर्ष की विविधता को देखती और समझती। जिंदगी की व्यस्तता ने कभी ऐसा मौका नहीं दिया था। आज वह परिस्थितिजन्य इस हालात में थी। व्यक्ति जब दु:खी होता है, तो नशे का सहारा लेता है, पर शौक यदि यायावरी का हो, तो घुमक्कड़ी से बढ़कर कोई नशा नहीं। पटना से वह दिल्ली चली आयी। उसे दिल्ली बहुत प्यारी लगी। अब ये वो दिल्ली न थी, जिसे हमने इतिहास की किताब में पढ़ा था। यह इक्कीसवीं शताब्दी की दिल्ली थी, जिंदगी में यहाँ तार ही तार था। उसने महत्वपूर्ण स्थानों और ऐतिहासिक तथा सांस्कृतिक विरासतों को खूब अच्छे से देखा और उसकी कलात्मकता को समझा। वह दिल्ली के संग कदम से कदम मिलाना चाहती थी। बीती हुई बातों को भुलाना चाहती थी, पर अब तक वह उस वाकया को भूल नहीं पायी थी। दिल्ली में तकरीबन उसने एक सप्ताह बिताया। एक शाम दिल्ली से उसने रूखसत ली और मुम्बई के लिए चल पड़ी। इस वक्त भीड़ में वह खो जाना चाहती थी। मुम्बई ने भी काव्या के मन को बहुत मोहा। मायानगरी ने अपने पाश्चात्य के रंग में रंगी आबोहवा से काव्या को बहुत लुभाया और रिझाया। मुम्बई में उसने कई रोज बिताये। जिंदगी में उसने पहली बार समंदर यहीं देखा और जब देखा तो हैरत से देखती रह गयी। मरिन ड्राइव की सैर काव्या के लिए
बहुत सुखद रहा। हर शाम वह अपने आप यहाँ खींची चली आती। देर शाम रंग-बिरंगी रौशनी से मुम्बई की बहुमंजिली इमारतें, सड़कें और आलीशान होटल नहा उठते। होटल से निकलने वाली रोशनी समंदर की लहरों पर पड़ती, तो ऐसा जान पड़ता, मानो दूर से
आग की लपटें दौड़ी चली आ रही हों। लहरें पत्थरों से आकर टकरातीं और उनकी प्रतिध्वनि से सारे दर्द, गम, थकान एक पल को दूर हो जाते। मुम्बई में ही काव्या ने भावी यात्रा की योजना बनायी।

अगले कई दिनों तक वह दक्षिण भारत के प्रमुख स्थानों का भ्रमण करती रही। एक दिन अचानक से उसके जेहन में कलकत्ता घूमने की इच्छा जागृत हुई। उसने कलकत्ते के बारे में बहुत कुछ सुना और पढ़ा था। उस दिन वह चेन्नई से कलकत्ता जा रही थी। उसके पास स्लीपर क्लास का टिकट था। वैसे भी काव्या को ए.सी. में यात्रा करना पसंद नहीं था। वह कहा करती थी, ए.सी. में वो आनन्द कहाँ? खिड़की से स्वच्छ
प्राकृतिक हवा का आना और धड़-धड़-धड़ करते हुए ट्रेन का गुजरना। कभी चाय वाले, तो कभी फलवाले का जोर-जोर से चिल्लाना। एक अखबार का पन्ना-पन्ना अलग कर एक साथ कई लोगों का पढ़ना। सहयात्रियों के साथ मैत्री करना, परिवार
जैसा संबंध हो जाना, ये सब कभी ए.सी. कोच में संभव नहीं। काव्या को लोवर बर्थ मिली थी। वह खिड़की के पास बैठी थी। घंटे भर तक वह एकटक खिड़की से बाहर दौड़ते हुए खेतों, वृक्षों और गाँवों को देखती, कुछ-कुछ सोचती रही। काव्या के ठीक सामने वाली बर्थ पर एक महिला बैठी थी। ट्रेन में ज्यादा भीड़ न थी। काव्या ने जब खिड़की के बाहर से नजर हटाया, तो आँखें स्वत: उस महिला पर टिक गयीं। महिला ने जब काव्या को ध्यान से अपनी तरफ निहारते देखा, तो न चाहते हुए भी पूछ बैठी,
‘‘कहाँ तक जाएंगी?’’
‘‘कौन मैं या ट्रेन?’’ काव्या ने मुस्कुराते हुए पूछा।
महिला ने भी प्रत्युत्तर में हँसते हुए कहा, ‘‘आप अपने बारे में बताएं।’’
‘‘जहाँ तक टे्रन पहुँचा दे।’’
‘‘मतलब कलकत्ते तक जाएंगी।’’
‘‘अभी तो यही सोचकर बैठी हूँ, पर दिल ने कहीं बीच में ही उतरने को बाध्य कर दिया, तो हो सकता है उतर भी जाऊँ।’’ महिला को ये जवाब सुनकर आश्चर्य हुआ।
उसे काव्या बहुत दिलचस्प लगी। महिला की अवस्था चालीस के आस-पास होगी। लंबी और संतुलित कद-काठी। देखने में भी कम आकर्षक न थी। बहरहाल कुछ इधरउधर के बाद दोनों बातचीत से घुलमिल गयीं। काव्या पहले पहल तो बोलने के मूड में न थी। वह थोड़ा-बहुत बोलकर चुप हो जाती और महिला के समक्ष एक प्रश्न रख देती। काव्या को यह जानकर बहुत ताज्जुब हुआ कि ये तो ठीक मेरी तरह सोचती हैं।
इससे पहले उसने कभी ऐसी महिला को न देखा था, जिसकी सोच ठीक उसकी तरह हो। उनका नाम रिचा शर्मा था। वह कलकत्ते के किसी कॉलेज में पूर्व में समाजशास्त्र की व्याख्याता और वर्तमान में एक ठॅड की संचालिका थी। ठॅड के नाम से काव्या
को बहुत चिढ़ होती थी। वह अपने आप को रोक नहीं पायी और सभी ठॅड की आलोचना करने लगी। रिचा ने काव्या की बात का अनुसमर्थन किया, पर साथ ही यह भी कहा, ‘‘सभी ऐसे नहीं, कुछ थोड़े-बहुत ही सही पर अच्छे काम करने वाले ठॅड
भी हैं।’’ रिचा ने बहुत कुछ अच्छे से समझाया और बताया, भिन्न-भिन्न कार्यों का उल्लेख किया। रिचा ने काव्या के बारे में गहराई से जानने की कोशिश की। वह काव्या के विचारों और शिक्षा-दीक्षा से बहुत संतुष्ट थी। काव्या ने उसे बहुत प्रभावित किया था। इस बात से उन्हें बहुत खुशी हुई कि ये लड़की समाज के लिए सोचती है और बहुत कुछ करना चाहती है। एक ही विचार के जब दो लोग मिल जाते हैं, तो एक अलग दुनिया बन जाती है और असीम सुख की प्राप्ति होती है।
‘‘आप कलकत्ता किस उद्देश्य से जा रही हैं?’’ रिचा ने पूछा।
‘‘मैं भारत भ्रमण पर निकली हूँ। मुझे घूमने और भिन्न-भिन्न समाज की संस्कृतियों और विविधताओं को देखने-समझने का बहुत शौक है।’’
‘‘ये तो बहुत नायाब शौक है, कहते हैं, अगर पचास वर्ष को पाँच वर्ष में जीना हो
तो फिर यायावरी से बढ़कर कोई तरीका नहीं।’’
‘‘बिल्कुल सही कहा आपने…’’ काव्या ने प्रसन्नता के साथ सहमति जताया।
‘‘आप इधर कहाँ से आ रहीं और क्या करने गयी थीं?’’ काव्या ने प्रश्न किया।
‘‘कई जगहों पर हमने डोनेशन कैम्प लगाया था, कई तटीय जिलों में हजारों लोग बाढ़
से प्रभावित हैं, उनके राहत और पुनर्वास के लिए प्रयासरत थी।’’
‘‘आप कैसे दोनों काम एक साथ संभाल लेती हैं?’’
‘‘शुरू के दिनों में नौकरी करनी मजबूरी थी। परिवार चलाने के लिए नौकरी करनी पड़ती थी और खुद को चलाने के लिए समाज सेवा। मेरा मानना है कि शिक्षण करना भी किसी समाज सेवा से जरा भी कम नहीं। मैं तो अपने वेतन का एक बड़ा हिस्सा
इसी काम में लगा देती थी। बाद में जब मैं आत्मनिर्भर हो गयी और मेरा ठॅड स्थापित हो चला, तो फिर मुझे नौकरी करना बेमानी लगा। फिर तो मैंने अपने आपको पूरी तरह से समाज सेवा के लिए समर्पित कर दिया।’’
काव्या उनकी बातों को भाव-विभोर हो सुन रही थी। कुछ ही घंटे की मुलाकात ने काव्या को रोमांचित कर दिया था। रिचा ने काव्या के लिए उत्प्रेरक का काम किया था। उस पर बातचीत का जादू-सा असर हुआ। वह एक बार पुन: अपनी खोयी शक्ति
हासिल कर चुकी थी। फिर से वह कुछ करने के संबंघ में विचारने लगी थी। काव्या विचारों में निमग्न थी कि अचानक से रिचा की आवाज उभरी, ‘‘कलकत्ते में आप कहाँ ठहरेंगी?’’
‘‘काई खास ऐसा ठिकाना तो पहले से तय नहीं।’’ दोनों कुछ देर अपने-अपने ख्यालों में डूबी रहीं, उसके बाद काव्या ने प्रश्न किया, ‘‘आपने अपनी टीम में कितने लोगो को रखा है?’’
‘‘कम से कम कुछ सौ लोग तो स्थायी रूप से हैं हमारे साथ और अगर कहीं ज्यादा लोगों की जरूरत होती है, तो हम उनका भी प्रबंध करते हैं। लेकिन काव्या आप जैसी नि:स्वार्थ और समर्पित लोगों की भारी कमी है इस क्षेत्र में। आप अकेली सौ पर
भारी पड़ेंगी।’’
‘‘अरे, ऐसा कुछ नहीं। आप मुझे कुछ ज्यादा महत्व दे रही हैं।’’ काव्या का मन
हो रहा था कि वह भी अपने कार्यो के बारे में उन्हें बताए, पर कुछ सोचकर उसने मनोभावों को जब्त कर लिया।
‘‘फिलहाल आपके कार्यकर्ता कहाँ होंगे? और क्या चल रहा?’’
‘‘अभी एक साथ हमारी तीन यूनिट तीन जगहों पर कार्य संभाले हुए है।’’
‘‘वो कहाँ और कैसे?’’ काव्या ने आश्चर्य के भाव में पूछा।
एक दल नेपाल में भूकंप पीड़ितों के राहत और पुनर्वास में लगा है। दूसरा दल छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित इलाकों में शिक्षा का प्रचार-प्रसार और उचित सुविधा मुहैया करा रहा। और तीसरे दल के पास से मैं स्वयं आ रही हूँ।’’
‘‘तो क्या आप भी छत्तीसगढ़ गयी हैं?’’
‘‘हाँ, मैं तो अक्सर काम के सिलसिले में छत्तीसगढ़ जाती रहती हूँ।’’
‘‘मैं भी इंटर्नशिप के लिए बस्तर जा चुकी हूँ।’’ काव्या ने अपने छत्तीसगढ़ के अनुभवों के बारे में काफी कुछ बताया।
‘‘और नेपाल कब जाना हुआ था?’’
‘‘पिछले महीने मैं नेपाल से ही लौटी थी। मैं तो कई दिनों तक वहाँ रही। सब कुछ व्यवस्थित करके ही मैं वहाँ से वापस आयी। हमने वहाँ शिविर लगाया था- भोजन, पानी, रहने और चिकित्सा की उचित व्यवस्था की थी ताकि पीड़ित परिवार राहत पा
सके। हमारे बहुत सारे कार्यकर्ता आपदा प्रबंधन के विशेषज्ञ हैं, वे हर विषम परिस्थिति, चाहे बाढ़ हो या सूखा या कोई अन्य आपदा, सदैव कार्योन्मुख रहते हैं।’’
‘‘आपको देख कोई कल्पना भी नहीं कर सकता कि आप इतना कुछ करती होंगी
और वह भी अकेली।’’
‘‘मैं अकेली कहाँ हूँ, आपकी तरह और भी लोग मेरे साथ हैं और तुम भी तो अपने क्षेत्र में कम माहिर न हो। अकेली सारा भारत घूम रही हो। हर एक सूक्ष्म बातों का अवलोकन कर रही हो। इतना पठन-पाठन, अध्ययन, चिंतन-मनन किया है, क्या ये
कम है? तुम्हारे इस भोले-भाले सूरत को देख कर तो हर कोई धोखा खा जाएगा।’’ रिचा ने हँसते हुए कहा।
बहुत कम समय में कोई दिल के कितना करीब आ पाता है, ऐसा लगता है मानो जन्म-जन्मांतर का संबंध हो। दोनों एक-दूसरे से मिल बहुत खुश थीं। देर रात तक दोनों भिन्न-भिन्न विषयों पर तर्क-वितर्क करती रहीं, एक-दूसरे के तह में उतरती रहीं।

काव्या के लिए रिचा किसी देवी से कम नहीं थी और रिचा के लिए काव्या एक अमोघ अस्त्र थी, जिसे रिचा शीघ्रातिशीघ्र अपने तरकश में भर लेना चाहती थी। काव्या का हिन्दी, संस्कृत और अंग्रेजी तीनों पर इतनी अच्छी पकड़ देख, वह मुरीद हुए जा रही थी। सुबह जब टे्रन से उतरने का वक्त हुआ, तो रिचा ने काव्या को अपने यहाँ ठहरने का आग्रह किया। रिचा के हठ के सामने काव्या खामोश हो गयी और थककर साथ चलना पड़ा। उसने चलने के पहले ही दृढ़ निश्चय किया कि बस एक दिन इनके साथ रह लेते हैं, इनका आग्रह भी पूरा हो जाएगा और कल विदा ले लूँगी। लेकिन रिचा के घर पहुँचने की देर भर थी। एक-एक कर दिन कटने लगे। रिचा के घर में सिर्फ उनकी माँ थी। यह जानकर काव्या हैरत में पड़ गयी कि रिचा अविवाहित है। एक शाम काव्या अपनी उत्सुकता को रोक नहीं पायी और पूछ ही लिया, ‘‘आपने शादी क्यों नहीं की?
आप शादी के बारे में क्या ख्याल रखती हैं? मैं आपके व्यक्तिगत अनुभवों को जानना चाहती हूँ इस संबंध में?’’
‘‘शादी एक आवश्यक अंग है जीवन का, शादी करने में कोई बुराई नहीं। मुझे लगता है शादी बहुतों के लिए ठीक है, पर सबके लिए नहीं। यह कटु सत्य है कि सभी व्यक्ति माँ और बाप बनने की नैतिक योग्यता नहीं रखते, बावजूद ऐसे लोग शादी से
परहेज नहीं करते। अमूमन हमारे यहाँ लोग शादी का मतलब सेक्स के लिए मान्य लाइसेंस भर समझते हैं। उनका ध्यान बाकी चीजों पर नहीं होता, भविष्य को लेकर ना कोई प्लानिंग होती है, न कोई गोल। ऐसे में जिंदगी बेतरतीब होकर रह जाती है। कभी-
कभी बिखर भी जाती है। मेरा मानना है कि अगर शारीरिक भूख के लिए शादी करनी हो, तो कभी भी शादी नहीं करनी चाहिए। आपसे कई लोगों की जिंदगी जुड़ने वाली होती है, उनकी जिंदगी से खेलना कहाँ की अक्लमंदी है? शादी बनी है एक संतुलित, रुचिकर और आनंदयुक्त मध्यम जिंदगी जीने के लिए। अकेला आदमी कई बार बेहद कमजोर पड़ जाता है। भावनाएं हावी हो जाती हैं। जिंदगी में एक रिक्तता का आभास होता है। कहा भी जाता है कि अकेले बस दो ही तरह के लोग रह सकते हैं, या तो देव या फिर दानव। साधारण मानव के लिए यह संभव नहीं। लेकिन ठीक यही वक्त होता है, जब एक साधारण मानव भी असाधारण बन जाता है। वह इस समय का भरपूर
फायदा उठाता है। वह अपनी समस्त सृजनात्मक और कलात्मक ऊर्जा को निचोड़ कर इकट्ठा करता है और फिर वह प्राणपण से मेहनत, लगन, धैर्य और शिद्दत के साथ कुछ ऐसा बड़ा काम कर जाता है, जिसे देख दुनिया वाह-वाह, अद्भुत, अलौकिक,
अपूर्व, अनुपम कहने लगती है। वह दुनिया को कुछ ऐसा नायाब तोहफा दे जाता है, जिसे दुनिया युगों-युगों तक याद करती है। ऐसे लोगों के लिए स्वतंत्रता और स्वच्छंदता वरदान सरीखे होते हैं। तन्हाइयाँ और अकेलेपन बहुआयामी होते हैं। यह व्यक्ति पर निर्भर करता है, वह इसे किस रूप में स्वीकार करता है। एक ओर रचनात्मक लोगों के लिए तन्हाइयाँ और नितान्त खामोशी प्रेरक का काम करती है, तो दूसरी ओर कमजोर लोगों के लिए अवसाद का कारण हो जाती है। साधारणत: अविवाहित और तन्हा लोगों का रुख जिंदगी के प्रति उदासीन हो जाता है। आदमी माया-मोह से बाहर निकलन लगता है। कमोबेश दार्शनिकता का भाव भर जाता है। कई बार ऐसा भी विचार उत्पन्न
होता है कि क्या करें और किसके लिए करें? हम जैसे ही समाज के बंधन से मुक्त होते हैं, सफलता-असफलता का बंधन नष्ट हो जाता है। हम प्रतिस्पर्धा के दौड़ से बाहर हो जाते हैं। इज्जत-शोहरत, पद-प्रतिष्ठा, मान-सम्मान यह सब झूठ और मिथ्या
लगने लगता है। जहाँ तक मैं सोचती हूँ, कोई व्यक्ति सब कुछ त्यागकर किसी खास उद्देश्य के लिए हिमालय चला जाये और उसके उद्देश्य की पूर्ति भी हो जाये, तो वह मेरे नजरिये में असफलता है। सफलता तो वही है, जो अपनों के बीच रहकर पायी जाये। सबकुछ झेलते हुए पायी जाये। जिन्दगी के हर पहलू के खट्टे और मीठे अनुभवों को महसूस करते हुए पायी जाये। समाज और दुनियादारी से भागना कोई
महानता और देवत्व के गुण नहीं हैं, लेकिन इन सबके लिए अपनी क्षमता का मूल्यांकन भी करना जरूरी होता है। क्योंकि सारे नियम सभी जगह लागू नहीं होते। और सबसे मूल्यवान चीज तो जिंदगी है, उसके बाद ही कुछ भी। सो, किसी भी हाल
में जिंदगी टूटने से बचनी चाहिए। मुझे शुरू से लगा कि मैं रिश्तों की डोर में बँधकर जी नहीं पाऊँगी। मैं जो चाहती हूँ, खुलकर नहीं कर पाऊँगी। हाँ, संयोग से कभी-कभार आपको ऐसा जीवन साथी मिल सकता है, जो आपके काम में बाधा की जगह प्रेरक का काम करने लगे। लेकिन दुर्भाग्य से मुझे ऐसा कोई मिला नहीं और मैं सिर्फ सेक्सुअल-इन्टर कोर्स के लिए शादी में बँधना नहीं चाहती
थी। लेकिन तुम्हें ये उचित सलाह जरूर दूँगी कि जब भी कोई ऐसा मिल जाए, जो तुम्हें सच्चे मन से बहुत प्यार करता हो, ऐसा लगे कि उसकी उपस्थिति तुम्हारे अंदर ऊर्जा का संचार करती है, तो शादी करने से कभी मत चूकना। ठीक इसी वक्त काव्या
का मन किसलय के पास पहुँच गया। रिचा ने काव्या की मानसिक समस्या का समाधान अपने अनुभव से कर दिया था। दोनों में देर तक तर्क-वितर्क भी हुआ। काव्या रिचा के प्रगतिशील विचारों से बेहद प्रभावित और संतुष्ट थी। अपने कार्यो से निवृत्त हो रिचा और काव्या कलकत्ता की सड़कों पर चहलकदमी करने लगतीं। दोनों ने खूब सैर की। आपस में खूब बातें होतीं। दोनों एक-दूसरे में ऐसे
डूब गयी, मानो कोई बिछड़ा यार वर्षों बाद मिला हो। ऐसे में एक दिन रिचा काव्या को साथ लिए नेपाल के लिए चल पड़ी। काव्या नेपाल के भयंकर मंजर को देख सन्न रह गयी। कितनी खूबसूरत घाटी थी, पर आज सर्वत्र मुर्दानी छायी हुई थी। क्या करुण और
हृदय विदारक दृश्य था, ऐसा काव्या ने अब तक कभी न देखा था। वह सब कुछ भूल बगैर कुछ कहे रिचा का साथ देने लगी। कई दिनों तक दोनों नेपाल में साथ-साथ रहीं।

23

इधर किसलय के साथ पूजा भी देवधा चली आयी। उसने आश्रम में कई दिन बिताये, उसे वहाँ का माहौल बहुत अच्छा लगा। काव्या के कार्यो को देख पूजा चकित थी। उसने आश्रम के लिए कितना कुछ किया था। पूजा को अब ये एहसास होने लगा था कि कुछ तो ऐसी बात है, जिसे मुझसे छिपाया जा रहा, वरना इतना सब हासिल करके कोई ऐसे ही सब कुछ छोड़कर नहीं जा सकता। परंतु उसने प्रत्यक्ष में किसलय से कुछ
नहीं कहा, अलबत्ता उसके साथ कदम से कदम मिलाने लगी। उसे किसलय का साथ बहुत प्यारा लगा। एक तरफ वह चाहती थी कि किसलय का साथ यूँ ही मिलता रहे, पर दूसरी ओर काव्या का इस तरह चले जाना, उसे दु:ख भी पहुँचा रहा था। पूजा का संग पा किसलय ने भी कुछ ही दिनों में आश्रम की व्यवस्था दुरुस्त और व्यवस्थित कर दी। उसने आस-पास के गाँवों से कई योग्य और कर्मठ व्यक्तियों को
आश्रम के लिए नियुक्त किया। किसलय ने पूजा से बताया कि अब हमें काव्या को ढूँढ़ने का प्रयास करना चाहिए, लेकिन ये काम इतना आसान थोड़े ही था, यह तो बस हवा में तीर चलाने जैसा था। किसलय चाहता था कि आश्रम की देखभाल के साथसाथ् उसकी खोज भी जारी रखी जाये। वह नहीं चाहता था कि थोड़ी-सी लापरवाही से काव्या के इतने मेहनत के बाद हासिल हुए इस किये-कराये पर पानी फिर जाये।
और एक रोज किसलय और पूजा की जोड़ी निकल पड़ी एक ऐसे मंजिल को पाने के लिए, जिसकी न कोई खास पहचान थी न, बहुत ज्यादा उम्मीद- एक अनन्त की तलाश में। जिंदगी भी तो कुछ ऐसी ही दौड़ है, जिसमें हम मंजिल को पाने के इरादे
से आगे बढ़ते हैं और मौत के पास पहुँचकर भी उतना ही दूर रह जाते हैं, क्योंकि हमारी महत्वाकांक्षा का कोई अंत नहीं। उस रात दोनों पास-पास बैठ इस मसले पर बहुत गंभीरता से विचार कर रहे थे कि आखिर काव्या इस वक्त कहाँ और किस हाल
में होगी?
‘‘पूजा, आप तो वर्षों से काव्या की मित्र रही हैं। आप तो काव्या के विचारों और मनोभावों को मुझसे भी बेहतर जानती होंगी।’’
‘‘ये सही है कि मैं काव्या की मित्र हूँ, पर मेरी मित्रता तो पुरानी हो गयी, वैसे भी
काव्या का परममित्र और चहेता तो कोई और है?’’ उसने कनखियों से किसलय को देख मुस्कुरा दिया।
‘‘आप भी न……..चुकने वाली नहीं!’’
कुछ देर बाद पूजा ने गंभीर हो पूछा, ‘‘आपकी समझ से काव्या किस
हालात में होगी?’’
‘‘मैंने भरसक जहाँ तक काव्या को समझने की कोशिश की है, वह जिद्दी प्रवृति की है। उसने हार मानना कभी सिखा नहीं। वह जरूर कहीं न कहीं अपने लक्ष्यों के  प्रति सजग होगी। ऐसे लोग इतनी जल्दी पथ से विचलित नहीं होते।’’
‘‘तो आपका इरादा क्या है? हमें सबसे पहले कहाँ से शुरुआत करनी चाहिए?’’
‘‘शुरुआत तो कहीं न कहीं से करनी ही होगी। मुझे लगता है, काव्या किसी ऐसे  प्रांत में कार्य कर रही होगी, जहाँ घनी आबादी हो, गरीबी हो, अशिक्षा हो क्योंकि वह इन तमाम मुद्दों पर खौल जाती थी, देश की दुर्दशा देख वह बिफर जाती और कभी- कभी तो रो पड़ती थी। उसने खुद कभी गरीबी नहीं झेला, पर गरीबी को इतने पास से दिल में उतारा था कि वह ताउम्र चाहकर भी इनसे दूर नहीं हो सकती थी। अगर आप
मेरी बात मानें तो छत्तीसगढ़, झारखंड, उड़ीसा, बिहार अथवा उत्तर प्रदेश इन्हीं में से कहीं न कहीं हो सकती है, ये मेरा अंतर्मन भी कर रहा।’’
‘‘तो हमें यहाँ से कहाँ चलना चाहिए?’’
‘‘मेरी समझ से छत्तीसगढ़ महत्वपूर्ण होगा। क्योंकि वह कई बार वहाँ गयी थी। और वहाँ का जिक्र भी अक्सर करती रहती थी। पर एक बात मैं आपसे स्पष्ट पूछना चाहूँगा, आप इस तरह मेरे साथ भटकेंगी, इससे आपके परिवार को ऐतराज तो न होगा। एक धनाढ्य परिवार की युवती इस तरह निरुद्देश्य जंगल और पहाड़ का खाक छानेगी, क्या ये उचित होगा?’’
‘‘मैंने तो आपको पहले दिन भी अपने परिवार की पृष्ठभूमि के बारे में बताया था। शायद आपको मुझ पर ऐतबार नहीं। रही बात उद्देश्यों की, तो वो आप समझ नहीं पाएंगे…। वैसे भी काव्या मेरी प्रिय मित्र थी, जब से वह मुझसे दूर हुई है, तभी से मेरी
जिंदगी अधूरी-सी हो गयी है।’’

पूजा एक ऐसे आधुनिक परिवार से थी, जहाँ कॉलेज तक पहुँचते ही सभी को स्वतंत्रता दी जाती थी कि जैसी मर्जी और जहाँ मर्जी पढ़ाई करे। अपने भविष्य के बारे में खुद फैसला ले। यहाँ बंधन नाम की कोई चीज न थी। बस कुछ दिन पर हाल
समाचार मिलता रहे, ये ही बहुत काफी है। इस घर में माता-पिता को अपने बच्चों पर भरोसा था या यूँ कहिए कि इस घर का संस्कार ही कुछ अलग था। इस घर के कई सदस्य अमेरिका और आस्ट्रेलिया में रहते थे, सो इसका असर भी था, यहाँ विचारों में
एक खुलापन-सा था। पूजा जब कभी किसलय के उदास और विपन्न चेहरे को देखती, तो बहुत मर्माहत होती। ये उसके लिए असह्य हो जाता। कहीं न कहीं उसका ममता से भरा लबालब नारी हृदय इस बात को सह नहीं पाता। एक सुबह दोनों रायपुर पहुँच गये। अगले रोज
दिनभर रायपुर शहर को घूमते रहे, इर्द-गिर्द के स्थानों के बारे में पता करते रहे। उन्होंने तमाम समाजसेवी संस्थाओं के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी इकट्ठा की। नक्सल प्रभावित इलाकों को देखने की दोनों को बहुत जिज्ञासा थी। वे बस्तर भी गये। छत्तीसगढ़ उन्हें उम्मीद से बढ़कर लगा। यहाँ बहुत खूबसूरती थी, चाहे बात नारी की हो या प्रकृति की। हरे-भरे घनघोर जंगल और पहाड़ों की सुंदरता अप्रतिम थी। ऐसे
नैसर्गिक वातावरण में आकर लोग सबकुछ भूल जाते हैं, पर किसलय काव्या को न भूल सका। पूजा इन दिनों किसलय की देखभाल पर बहुत गंभीर थी। दोनों का एकदूसरे के प्रति नजरिया बेमिसाल था। वे अपनी नहीं, दूसरे की चिंता में रहते थे। किसलय को अब डर भी महसूस होने लगा था, साथ रहते-रहते जब कुछ दिन बीत गये, तो ऐसा लगने लगा, मानो दोनों एक-दूसरे के पूरक हों। किसलय ने सोचा, कहीं
ऐसा न हो कि वह पूजा की छत्रछाया में काव्या को ही भूल जाये। किसलय से काव्या को बिछड़े हुए कई महीने हो गये थे। इस दरमियान पूजा और किसलय कई प्रांतों का भ्रमण कर चुके थे, पर कहीं कुछ भी पता न चल सका था। हर एक दिन के साथ उमंग और उत्साह ठंडा होता जा रहा था। पूजा ने तो मन ही मन उम्मीद छोड़ दी थी, लेकिन किसलय कोई कसर नहीं छोड़ना चाहता था।
पूजा की नजरों में किसलय इतने दिनों में देवता बन चुका था। उसने किसलय की आँखों में काव्या के लिए एक तड़प देखी थी। वह अब हर रोज पूजा-पाठ भी करने लगी थी, ताकि किसलय अपनी मंजिल पा सके। उसे इस बात का बिल्कुल मलाल न था कि किसलय ने उसके प्यार को ठीक से समझा ही नहीं। इधर किसलय भी विगत कुछ दिनों से सिर्फ पूजा के बारे में ही सोचता रहा था। यहाँ तक की काव्या भी कभी-कभार विस्मृत हो जाती। उसने ऐसा बेमिसाल प्यार बहुत कम देखा था। वह हर पल सिर्फ और सिर्फ किसलय के कल्याण के लिए फिक्रमन्द
रहती थी। दोनों जब भी दिनभर के दौड़ धूप के बाद कहीं आराम से बैठते, तो ऐसे में पूजा किसलय को कोई कविता सुनाने के लिए कहती। पूजा अब भी किसलय की कविताओं की उतनी ही दीवानी थी। एक रोज मौका पा उसने अपने मनोभावों को व्यक्त कर ही दिया, ‘‘आपको अपनी किताब प्रकाशित करवानी चाहिए। आप इतना बढ़िया लिखते हैं, यह सब सृजन लोगों तक पहुँचना चाहिए।’’
‘‘मैंने यह सोचकर कभी लिखा ही नहीं कि कभी मेरी किताब भी प्रकाशित होगी, बस ये तो मेरे मन के उद्गार हैं। मुझे अपने भावों को छन्दबद्ध करने के बाद खुद पढ़ने में ही बहुत आनंद आता है।’’
किसलय के साथ-साथ कभी-कभी पूजा भी उसकी ़गज़लों और नज्मों को गाती थी।
‘‘अगर मैं आपकी किताब प्रकाशित करने का प्रयास करूँ, तो आपको कोई
आपत्ति तो नहीं?’’
‘‘नहीं, मुझे कोई आपत्ति नहीं और जहाँ तक मुझे लगता है, आप बहुत बड़ी प्रेरणास्रोत् रही हैं, जीवन और काव्य दोनों के सफर में। मुझे लगता है, आपके इस निश्चछल प्रेम को सूद सहित वापस करने का बस एक ही तरीका है।
‘‘वह क्या?’’
‘‘मैं अपना पहला गज़ल संग्रह आप ही को समर्पित करूँगा।’’

24

देखते ही देखते एक साल बीत गया। इन दिनों किसलय और पूजा झारखण्ड में काव्या की तलाश में लगे थे। उस रोज दोनों राँची के एक होटल में ठहरे थे। दिन भर भागदौड़ करने के बाद खाना खा दोनों तुरंत ही अपने-अपने कमरे में गये थे। किसलय सोने से पहले अनमने भाव सेाइ देख रहा था। कई मित्र ऑनलाइन दिख रहे थे। मैसेज बॉक्स पर निगाह गयी, तो कई मैसेज पड़े हुए थे। उसने बारी-बारी से पढ़ा और
जहाँ उचित समझा, प्रत्युत्तर भी दिया। जवाब देकर जैसे ही वहाइ बंद करने के बारे में सोच रहा था, मैसेज बॉक्स में एक नया मैसेज दिखा। यह काव्या का मैसेज था। वह ऑनलाइन दिख रही थी। वह एकदम से सन्न रह गया। फिर अचानक याद आया कि ये पूजा की करतूत होगी, क्योंकि पूजा ने उसे सच्चाई से अवगत करा दिया था। किसलय यह जान चुका था कि पूजा काव्या केाइ का पासवर्ड जानती है और उसका
सारा मैसेज पढ़ती भी थी।
काव्या : नमस्ते, कैसे हैं?
किसलय ने जवाब देने से पहले ये जाँचना चाहा कि सच्चाई क्या है? उसे उम्मीद थी कि पूजा उसे बेवकूफ बना रही। वह झटपट कमरे से बाहर निकल  पूजा के कमरे की तरफ बढ़ा। पूजा के कमरे का दरवाजा अंदर से लॉक नहीं था, लाइट जल रही थी। उसे अब भी उम्मीद थी कि इसी की शैतानी है। उसने धीरे से दरवाजा अंदर की तरफ ढकेला, तो देखा कि पूजा बिस्तर पर निढाल पड़ी है। माथे पर चिंता
की रेखाएं उभर रही थी। चेहरे से शरीर की थकान प्रतिबिम्बित हो रही थी और अधखुली आँखों से मन की। उसने कपड़ा तक नहीं बदला था। देखने से ऐसा जान पड़ता था कि मानो असमय निद्रा के प्रकोप में हो।

किसलय को पूजा का यह दु:खी चेहरा द्रवित कर गया। वह जैसे चुपके से आया था वैसे ही उल्टे पैर दरवाजा को धीरे से भिड़ा वापस कमरे में लौट आया। वह काव्या से चैटिंग करने लगा। वह न जाने कितने दिनों बाद काव्या से बात कर रहा था, फिर भी
मन बार-बार पूजा के कमरे में पहुँच रहा था। उसे पूजा का वह नैराश्य, थका हुआ, उदास और अवसाद से भरा चेहरा बार-बार याद आ रहा था। फिर भी उसने बातचीत जारी रखा। किसलय ने भी अभिवादन किया और कुशलक्षेम पूछा।
काव्या : मैं अच्छी हूँ पर आपके संबंध में चिंतित हूँ।
किसलय : नहीं, ऐसा क्या हुआ? और इतने दिनों बाद याद कैसे आयी?
काव्या : नहीं, नहीं, आप गलत सोचते हैं। मैं तो आपको कभी भूल नहीं पायी, पर कर्तव्य…।
किसलय : आप अपने कर्तव्यों के प्रति सजग रहिए, दुनिया में रोशनी फैलाते रहिए, एक घर अंधेरा ही सही।
काव्या : अभी आप कहाँ हैं?
किसलय : ये सवाल तो मैं भी आपसे पूछ सकता हूँ, लेकिन पूछूँगा नहीं क्योंकि आप सही उत्तर तो देंगी नहीं।
काव्या : नहीं, नहीं, ऐसा कुछ नहीं। मैं सही उत्तर दूँगी, पर पहले आप ये तो बताएं,
आप कैसे हैं? सब कुछ कैसा चल रहा? आश्रम किन हालतों में हैं?’’
किसलय : मैं कैसा हूँ, ये सोचने का तो कभी वक्त ही नहीं मिला, रात-दिन एक
मंजिल की तलाश में खोया रहा। रही बात आश्रम की, तो आपने जैसे छोड़ा था, उससे बेहतर स्थिति में ही हैं।
काव्या : मैं आपसे आखिरी बार मिलना चाहती हूँ।
किसलय : मिस काव्या लेकिन अगर ये बात आपने कल कहा होता, तो मैं जरूर तैयार हो जाता। पर आज मैं अब वह किसलय न रहा, जो कई महीनों से एक-एक
शहर, मुहल्ले, गाँव, जंगल, नदी, पठार, सहरा का खाक छान रहा कि आप एक बार तो मिल जातीं।
काव्या : ओह…मैंने तो ये सोचा ही नहीं था कि कोई किसी को इतना भी प्यार कर सकता है। दोनों की आँखें इस वक्त भर चुकी थीं, काव्या तो खुलकर रोना चाहती थी उसका गला दर्द से भर गया था। इसके बाद किसलय ने सबकुछ सच-सच बता दिया और
अंत में ये भी कह गया कि आज उसका मन पूजा के प्रति बहुत गंभीर और संवेदनशील है। वह पूजा के उस चेहरे को भूल नहीं पा रहा, जो आज उसने देखा है।

किसलय : अगर प्यार के लिए मैंने त्याग किया है, तो पूजा इस मामले में मुझसे भी बढ़कर है। यह जानते हुए कि वह अपना घर खुद जला रही है, मेरे साथ दर-दर भटकती रही। इसलिए मेरा मन आपके प्रति खिन्न हो गया है।
काव्या यह सुनकर जड़ हो गई, वह समझ नहीं पायी इस खबर के बाद उसे खुश होना चाहिए या उदास, लेकिन इनके अथक परिश्रम की कहानी सुन व्यथित जरूर हुई।
काव्या : हम्म।
किसलय : मैं ये नहीं समझ पा रहा, आज अचानक मिलने की बात आपके मन में कहाँ से आयी? आप तो कैवल्य को प्राप्त कर चुकी हैं। आपने अपने समाज सेवा के आगे इन्सान और इन्सान की भावनाओं का कद्र करना कहाँ जाना?
काव्या : दरअसल बात यह है कि मैं बस कुछ ही दिन भारत रहने वाली हूँ। इसी सप्ताह मैं अफ्रीका जा रही। जाने से पहले मैं एक बार आपसे मिलना चाहती थी।
जाने-अनजाने जो मुझसे भूल हुई, उसके लिए मैं सामने से मिल गिला-शिकवा मिटाना
चाहती थी।
किसलय : ऐसा क्या हुआ जो अफ्रीका जाना हो रहा और कितने दिन के लिए?
काव्या : मैं एक समाजसेवी संस्था ‘मुस्कान’ के लिए कार्य करने अफ्रीकी देशों में जा रही। कम से कम दो साल वहाँ रहना होगा। पिछले दिनों मेरी मुलाकात रिचा जी से हुई।
इसके बाद रिचा शर्मा के साथ हुई मुलाकात की घटना का संक्षिप्त जिक्र किया। उसने बताया कि रिचा जी ने इस संस्था का अंतर्राष्ट्रीय कार्य भार उसे सौंपा है। वह दुनिया के दूसरे देशों में भी इस संस्था का प्रसार करना चाहती हैं। उनका कहना है कि काव्या तुमसे अच्छा व्यक्ति हमारी संस्था के लिए और कोई नहीं हो सकता।
किसलय : आप तो भारत का उद्धार करने चली थीं और अब…।
काव्या : मुझे लगा मेरे जैसे लोगों की जरूरत इस वक्त भारत से ज्यादा दूसरे और कई देशों को भी है।
किसलय : तो यहाँ के आपके कार्यक्रम का क्या होगा और फिर ये आश्रम…?
काव्या : आपके रहते मुझे क्या चिंता और अब तो पूजा भी साथ में है।
किसलय : नहीं-नहीं, मैं ऐसा कुछ भी नहीं करना चाहता। मैं थक चुका हूँ। मैं किसी भी रोज आजिज आ आश्रम छोड़ सकता हूँ।
काव्या : ऐसा नहीं हो सकता, मैं आपको अच्छे से जानती हूँ। आप उस मिट्टी के नहीं बने, जो इतनी जल्दी हार मान ले। आपने सच में मुझे कभी प्यार किया हो, तो उस प्यार की कसम मुझे आशा ही नहीं, अपितु पूर्ण विश्वास है कि आप और पूजा
मेरी रिक्तता को भरने का प्रयास करेंगे और सफल भी होंगे। किसलय : अब फिर से प्यार की कसम मत दीजिए, प्यार तो मैं आज तक आपसे
उतना ही करता हूँ, पर बदले में क्या मिला- सिर्फ बेरूखी और बेवफाई…। काव्या : आप गलत सोच रहे हैं, अगर मैंने जीवन में कभी किसी पुरुष के संबंध में विचार भी किया, तो वो आप थे। पर आप तो मेरी मजबूरी जानते हैं, मुझे शादी के बंधन से बहुत भय लगता है और इसका कारण भी आप अच्छी तरह जानते हैं।

किसलय : अभी आपसे मिलना हुआ नहीं, तब तक आपने फिर से दूर होने का कार्यक्रम बना लिया, अब मेरे लिए क्या उचित क्या अनुचित? मैं आपको पुन: खोना नहीं चाहता, इसलिए मिलना नहीं चाहता। देर रात तक चैटिंग चलती रही। सारी दुनिया सोती रही, पर ये दोनों जगते रहे। भला इनकी आँखों में नींद कहाँ? न जाने कितनी बातें थीं, जिनका कोई अंत न था, लेकिन इन दोनों के अलावा एक तीसरा शख्स भी था, जो देर रात तक जगता रहा था। सुबह दस बजे किसलय की नींद खुली। निगाह घड़ी पर गयी, पर यह ताज्जुब की बात न थी। हाँ, इस बात का उसे बड़ा आश्चर्य हुआ कि आज पूजा ने उसके नींद में खलल क्यों नहीं डाला? वह तो हर रोज सुबह-सुबह किसलय को जगाने के लिए तंग करती
थी। सोचा, हो सकता है उसने मुझे गहरी नींद में देखकर दया कर दिया हो। वह मुँह धो कंघी कर पूजा के कमरे में गया। कमरा खाली था और टेबल पर सामने दो लिफाफे पड़े थे। एक के ऊपर मोटे अक्षरों में लिखा था- ‘काव्या के लिए।’ दूसरे पर लिखा
था- ‘किसलय के लिए।’
किसलय ने जल्दबाजी में लिफाफा खोला और एक ही साँस में पूरा पत्र पढ़ गया। वह वहीं कुर्सी पर धम्म से बैठ गया और दुबारा से पढ़ने लगा-

प्रिय किसलय,
शुभ प्रभात।
सुबह तो आप जग नहीं पाएंगे, ये मैं जानती हूँ क्योंकि इतनी देर तक आपने काव्या से चैटिंग जो की है। आप तो जानते है कि मैं काव्या कााइ एकाउंट भी हमेशा चेक करती रहती हूँ। संयोग की बात है, सुबह तीन बजे अचानक मेरी नींद खुल गयी। मैं यूँ ही fb चलाने लगी। देखा काव्या और आपकी चैटिंग रात में काफी लंबा चली थी। मैं तो दंग रह गयी। मुझे बहुत मजा आया। यह जानकर और भी अच्छा लगा कि काव्या के हृदय में आपके लिए कुछ तो जगह है, तभी तो वह आपसे एक बार पुन: मिलने आ रही। काश कि ये आपके जिंदगी का सबसे यादगार और निर्णायक पल बने। मुझे लगता है, काव्या की नींव अब हिल चुकी है। आपके प्यार के प्रहार को वह अब
ज्यादा झेल नहीं पाएगी। वह इस बार खुद चलकर अपने आपको आपके चरणों में समर्पित कर देगी। एक नारी दूसरी नारी के भावों को पढ़ने में कभी धोखा नहीं खा सकती। मैंने आपको हमेशा देवता की तरह देखा। लम्बे समय तक साथ रही, पर आप
कभी लक्ष्मण रेखा से बाहर नहीं निकले। पहले मैं शंका करती थी कि क्या पता आप प्यार का ढोंग करते हों? लेकिन मेरे सतत प्रयासों के बावजूद आप अपनी जगह से टस से मस नहीं हुए। इससे बढ़कर कोई और क्या प्यार कर सकता है? इन सब बातों
को सोचकर मैं चुपचाप आज निकल पड़ी। मुझे ढूँढ़ने का निरर्थक प्रयास आप सब मत करना, क्योंकि थोड़े ही दिनों में मैं भारत से बाहर चली जाऊँगी। आपको याद है आपने एक बार मुझे प्यार का मतलब समझाया था कि प्यार की

सार्थकता पाने में नहीं, पाकर खोने में है- त्याग में है। प्यार का मतलब है- त्याग और समर्पण। प्यार की असली झलक तो तब दिखती है, जब शरीर किसी और की बाहों में होने के बावजूद मन किसी और की ओर दौड़ पड़ता है। क्या ये कम है- दो लोग
एक-दूसरे को गहराई से जानते हैं, समझते हैं, महसूस करते हैं, अपने गमों, अपनी खुशियों को बाँटते हैं, बस शरीर का फासला रह जाता है, मन तो एकाकार हो जाता है। ये तो मैंने आप ही से सीखा। मैं सदा के लिए आपके साथ हूँ। मेरा शरीर दूर होगा,
पर हमारा मन उसी दोस्त की तरह पास-पास होगा। आपकी दोस्त
-पूजा

दूसरा पत्र जो काव्या के नाम लिखा गया था, उसे भी किसलय ने पढ़ा, वह कुछ यूँ
लिखा था-

प्रिय सखी काव्या,
आज सच में मैं बहुत खुश हूँ, क्योंकि जब तुम पत्र पढ़ रही होगी, तब किसलय तुम्हारे साथ होगा। किसलय का तुम्हारे प्रति निश्चछल प्रेम देख मैं खुद को और रोक नहीं पायी और आखिर में मैंने तय किया कि अब बहुत कर ली मैंने। बार-बार गलतियाँ करते-करते मैं थक गयी। ये जानते हुए कि किसलय की दिलचस्पी तुझमें है, मैं निरंतर किसलय को बेपनाह मुहब्बत करती रही। मुहब्बत करना कोई गुनाह नहीं, लेकिन
प्यार में इतनी स्वतंत्रता तो होनी ही चाहिए की सामने वाला भी अपने आप को व्यक्त कर सके, अपने पसंद-नापसंद का इजहार कर सके। एकतरफा प्रेम गलत नहीं, पर इसके लिए बहुत धैर्य की जरूरत होती है, फिर जरूरी नहीं कि इसका सकारात्मक
परिणाम ही मिले। प्यार में ये मायने नहीं रखता आप किससे और कितना प्यार करते हैं, सबसे खास तो ये है कि आपसे कौन प्यार करता है? ऐसा नहीं था कि मैं विचलित थी, लेकिन मुझे अब लगने लगा था कि मेरी वजह से कहीं न कहीं किसलय विचलित
होने लगे थे। इसलिए मैंने तय किया कि अब हमेशा के लिए आप सबों से दूर चली जाऊँ। जहाँ तक मैं समझती हूँ, किसलय को अपनाने से तुम्हारा दिन-प्रतिदिन उत्थान ही होगा। जो व्यक्ति तुम्हारा संग पाने के लिए किसी हद तक जाने को तैयार हो, वह
तुम्हारे कार्य में बाधक कभी नहीं हो सकता। मैं अब तुम लोगो से तब तक नहीं मिलूँगी, जब तक कि तुम लोग एक साथ नहीं
हो जाते। मैं भी भागते-भागते बहुत थक गयी हूँ। कुछ दिन आराम करना चाहती हूँ। इसके बाद वल्र्ड टूर पर निकलूँगी, पूरी दुनिया घूमने की हसरत को अब मैं हकीकत में बदलना चाहती हूँ। उसके बाद मैं पापा के पास आस्ट्रेलिया चली जाऊँगी।
तुम्हारी दोस्त
-पूजा

25

एक सुबह किसलय काव्या से मिलने की बेकरारी के साथ दिल्ली पहुँचा। नई दिल्ली स्टेशन पर पहुँचते ही वह तेजी से स्टेशन से बाहर निकला और जिस हालत में था, उसी हालत में मैले-कुचैले कपड़ों के साथ पहाड़गंज के होटल ‘वेलकम’ की ओर भागा। उसने सरप्राइज देने के चक्कर में कॉल भी नहीं किया। काव्या के कमरे के ठीक सामने पहुँचा, तो उसे बड़ा आश्चर्य हुआ, यह देखकर कि कमरा तो बाहर से बंद पड़ा
है। उसने काउंटर पर इनक्वायरी की, तो पता चला मैडम बाहर किसी काम से निकली हैं। वह वहीं रिसेप्शन में बैठ कर सोचने लगा, क्या करें, कॉल करें या वेट करें? कुछ देर तो बैठकर इंतजार किया, पर अब उससे रहा नहीं जा रहा था। इतना नजदीक
पहुँचकर दूर होना, उसे बहुत साल रहा था। उसने थक-हारकर कॉल किया, पता चला काव्या लोदी गार्डेन में किसी के साथ जरूरी मीटिंग में है। उसने बताया, वह घंटे भर में वापस आ जाएगी। किसलय ने सोचा, अच्छा मौका मिला गया सरप्राइज देने का।
वह ऑटो लिए लोदी गार्डेन पहुँच गया। चेहरे को ढँक वह गार्डेन में घूमने लगा। वह एक छोर से दूसरे छोर तक काव्या को ढूँढ़ता रहा। इस कोने से उस कोने तक एक पूरा राउंड लगाने के बाद एक तरफ उसने एक प्रौढ़ महिला के साथ काव्या को बात
करते देखा। वह पास ही में छुपकर ऐसे बैठ गया कि काव्या उसे देख न सके, पर वह भलिभांति उस पर नजर जमाए रख सके। काव्या से कुछ दूरी पर किसलय बैठा था,
इसलिए बात सुनना और समझना तो बहुत मुश्किल था। हाँ, हाव-भाव स्पष्ट नजर आ रहे थे। काफी देर तक बातें होती रही। उसके बाद जब वह महिला उठकर जाने लगी, तो काव्या भी उनके साथ-साथ चल पड़ी। मुख्य दरवाजे के बाहर एक टैक्सी में बैठकर
जब वह महिला निकल गयी, तो काव्या ने एक बार घड़ी देखा और फिर एक ऑटो वाले को आवाज दी। इतनी ही देर में पीछे से किसी ने काव्या की पलकों को हाथों से कसकर मुँद लिया। उसने हाथों के स्पर्श से पहचान लिया और आश्चर्य के भाव में
कहा, ‘‘आप यहाँ चले आये!’’ ऑटो वाला पास आ चुका था काव्या ने ‘सॉरी’ कहा और फिर दोनों वापस गार्डेन में आ गये। एक तरफ बहुत शांत जगह देख हरी घास पर दोनों इत्मीनान से बैठ गये। बहुत दिनों बाद आज किसलय सामने से काव्या को देख रहा था। उसने अपने आप से कहा, ‘बिल्कुल भी नहीं बदली, वही उत्साह, वही प्रसन्नता, मुखमंडल पर वही आभा।’
‘‘आप तो बहुत दुबले हो गये हैं, क्या खाना नहीं मिल रहा था?’’ काव्या ने बात की शुरुआत करनी चाही।
किसलय ने चुप रह एक बार गहरी निगाहों से काव्या को देखा और मुस्कुरा दिया। किसलय ने अपने आप से कहा, ‘‘अभी बोलने की जरूरत नहीं, बस इस छवि को आँखों के सहारे हृदयंगम कर लो, पता नहीं इसके बाद ये कब मिले? इसके चित का
क्या भरोसा?’’
‘‘यात्रा कैसी रही? बहुत परेशानी तो नहीं हुई?’’
किसलय जब इस बार भी चुप रहा, तो काव्या को ऐसा लगा मानो नाराज हो। उसने ढीठाई करते हुए अपने हाथों से किसलय के पाँव में गुदगुदी की। उसने पाँव समेटा और टकटकी बाँधे ऐसे देखा, जैसे आँखों के रास्ते उसे कहीं दूर कंदरे में कैद
करना चाहता हो।
‘‘आपने कुछ खाया?’’ इस प्रश्न के जवाब में भी जब किसलय मंद-मंद अभय मुद्रा में मुस्कुराता रहा, तो काव्या से अब बर्दाश्त नहीं हुआ। वह पलभर में उठकर खड़ी हो गयी और किसलय का हाथ पकड़ उठाने लगी। किसलय का दिल तेजी से
धड़कने लगा। उसका मन तो कर रहा था कि उसके हाथों को चूम ले, पर वह इस वक्त कोई ओछी हरकत नहीं करना चाहता था। ठीक इसी वक्त किसलय ने पूजा का खत काव्या को दे दिया। काव्या एक बार तो खड़े-खड़े खत को पढ़ गयी और दुबारा
चलते हुए पढ़ती रही। किसलय काव्या के रंग बदलते चेहरे को देखता रहा। दोनों पास के एक ढाबे में बैठ गये और खाना खाने लगे। किसलय चाहता था कि वह उस खत के बारे में अथवा पूजा के बारे में कुछ बोले, पर वह गहरी चुप्पी साधे खाना खाती
रही। खाना खाकर वापस दोनों होटल की ओर चल पड़े। इस पहर तक भीषण गर्मी पड़ने लगी थी। किसलय के गंदे कपड़े और पसीने से लथपथ चेहरे को देख काव्या ने कहा, ‘‘आप चाहें तो स्नान कर लें। उसके बाद बैठकर बातें होंगी।’’ किसलय काफी देर तक नहाता रहा। जब तक नहाकर वापस आता, तब तक काव्या बिस्तर पर पड़े-पड़े ऊँघने लगी थी। वह काव्या को जगाना नहीं चाहता था। वह वहीं पास में रखी
कुर्सी पर बैठ गया। उसने एक बार संजीदगी से काव्या को देखा। उसकी साँसों के साथ गुदाज वक्ष का ऊपर-नीचे होना बड़ा आकर्षक लग रहा था। वह चित लेटी हुई थी, टी-शर्ट मुड़कर नीचे से ऊपर को सरक गया था। उसकी खूबसूरत नाभी साफ दिख रही थी। वह एक पल को कसमसा गया, पर जल्द ही संयत हो कुर्सी की पीठ पर सिर टिकाये ऊपर छत को देखते हुए कुछ सोचने लगा। उसने जब दुबारा काव्या की तरफ देखा, तो सोच में पड़ गया। बेचारी, थक गयी, कितना दौड़ती रहती है, नन्हीं-सी जान को सारी दुनिया की चिंता है, ऐसी तमाम बातें उसके दिमाग में आती रही। उसे काव्या के चेहरे पर बहुत गंभीरता दिखी। इस बार रंग-रूप और सौंदर्य का प्रभाव किसलय पर
ज़रा भी नहीं पड़ा। उसे ऐसा लगा, मानो कोई देवी रूप बदलकर इस पृथ्वी पर लोगों की भलाई के लिए आयी हो। उसे बुरे नजर से देखना भी गुनाह होगा। उसे अब इस हाल में काव्या को छूते हुए भी डर लग रहा था। कुछ सोचकर वह पास ही में रखे कम्बल को काव्या के ऊपर ओढ़ाने लगा। कमरा बहुत ठंडा हो रहा था, ए.सी. का कुलिंग प्वाइंट अपेक्षाकृत कुछ ज्यादा था। बहुत सावधानी से किसलय ने पाँव से लेकर
ऊपर तक ढँकना शुरू किया। जब सीने तक ले जाकर उसने हौले से कम्बल को छोड़ा, तो अचानक से काव्या ने करवट बदली और किसलय के हाथों को पकड़ लिया और खींचकर पास में बैठा लिया। उसने नींद में बड़बड़ाते हुए कहा, ‘‘इतना ज्यादा
देखभाल मत कीजिए पछताना पड़ेगा।’’ किसलय जिस हाल में था, उसी हाल में पास बैठ गया। अब वह काव्या की सांसों को महसूस कर सकता था। किसलय ने बहुत आहिस्ता से काव्या के हाथों को एक तरफ रखा पर ऐसा ज्यादा देर न हो सका और
काव्या किसलय के शरीर पर हाथ फेरने लगी। उसने किसलय के हाथों को होंठ से छूकर अपने सीने पर रख दिया।
किसलय सरककर उसी कम्बल में हो चला। काव्या ने खिसककर अच्छे से जगह बना दिया। उसने किसलय के गले में बाँह डाल दिया और बोली, ‘‘एक वह ज़माना था, जब मेनका ने विश्वामित्र की तपस्या भंग करने की कोशिश की थी और एक यह ज़माना है, जब कोई कामदेव महादेव की बजाय सती की तपस्या में बार-बार खलल डाल रहा।’’
किसलय ने काव्या को अपनी बाहों में भर लिया, अँगुलियाँ कपड़ों से अटखेलियाँ करने लगीं और होंठ……दोनों इस वक्त आनंद के क्षणों को स्वीकार कर रहे थे। कहने के लिए बहुत सी बातें और विचार थे, पर जुबां ने खामोशी की चादर ओढ़ ली थी। आँखें आनंदातिरेक में इतनी डूबीं कि खुलने का नाम ही नहीं ले रही थीं, फिर भी सब कुछ मन की आँखों से महसूस हो रहा था। देर शाम दोनों हाथों में हाथें डाल इंडिया
गेट पर तफरीह कर रहे थे। राजपथ का एक भरपूर चक्कर लगाने के दरमियान दोनों ने जी भर के बातें की थी। अपनी पुरानी यादों के साथ-साथ आगामी भविष्य के सुनहले सपने दोनों की आँखों में तैर रहे थे।
हाँ, रह-रहकर इस बात की टीस किसलय के मन में जरूर उठ रही थी कि बस ये सब आज तक के लिए ही है, क्योंकि कल काव्या यहाँ से हजारों कि.मी. दूर चली जाएगी। किसलय ने एक बार इच्छा जाहिर की कि वह भी साथ चलना चाहता है, पर
काव्या इसे लेकर संशय में थी। उसे दो बातों की चिंता थी। एक तो रिचा शर्मा से अनुमति लेनी होगी और दूसरा किसलय के नहीं रहने पर आश्रम के कार्यक्रम में खलल पहुँचने का भय था। देर रात तक दोनों सैर करते रहे। वापस कमरे पर आते ही दोनों
जल्दी-जल्दी अपने-अपने कमरे में सोने चले गये, पर नींद किसे थी? किसलय रात भर सोचता रहा, उसने छोटे से लेकर बड़े तक सारी बातों को क्रम से सोचा, शादी कब करनी होगी? कहाँ करनी होगी? रहने के लिए एक घर की
व्यवस्था करनी होगी? आख़िर वह हमारे घर ही तो रहने आएगी? क्या पता उसके दिमाग में क्या चल रहा हो? वह मुझे अपने साथ रहने के लिए भी बाध्य कर सकती है। और इधर काव्या कुछ और सोचती रही। उसके दिमाग में कुछ और चलता रहा।
सुबह जल्दी-जल्दी तैयार हो दोनों एयरपोर्ट के लिए चल पड़े। काव्या ने सोचा, यही
उचित समय है सब कुछ कहने का। उसने गाड़ी से उतरते ही एयरपोर्ट परिसर में एक तरफ खाली जगह देख किसलय
को बैठने के लिए कहा। उसने अतिशय गंभीरता के साथ कहा, ‘‘कल पूरी रात मैं सोचती रही, आपको और अपने भविष्य को लेकर…’’ वह रुक-रुककर बहुत आराम से चबा-चबाकर बातों को कह रही थी, ‘‘और आख़िर में मैंने फैसला लिया कि…।’’
किसलय की धड़कन तेज हो गयी, शरीर के सारे रोंगटे खड़े हो गये, जैसे स्वागत के लिए तैयार हों, ऐसा लगा, जैसे कोर्ट का वर्षो से रखा हुआ जजमेंट पढ़ा जाना हो।
‘‘शादी-विवाह और पत्नी धर्म निभाना मेरे बस की बात नहीं। मैं अकेली रहने की आदी हो चुकी हूँ। जिस ज़िंदगी के बारे में आप सोच रहे, शायद उसके लिए मैं बनी ही नहीं। आपको मैं कभी सुखी नहीं रख पाऊँगी। न तो मुझे खाना बनाना आता है,
न अपने पति को खुश रखने के फार्मूले मैं जानती हूँ। आपको बाद में बहुत पछताना पड़ेगा।’’ क्षणभर में किसलय विचलित हो गया। उसकी आँखें भर गयीं। उसके होठ थर्रा उठे।
‘‘मेहरबानी करके आप किसी और से शादी कर लें। आपसे कोई भी लड़की शादी से ऐतराज नहीं करेगी। आप अगर तैयार हो जाएं, तो मैं पूजा को कहीं से भी ढूँढ़ निकालूँगी।’’
किसलय लगभग रोते हुए बोला, ‘‘तुम्हारे पास दिल नाम की चीज़ है भी या नहीं? तुम्हारी सारी भावनाएं कहाँ मर गयीं?’’ उसका पूरा शरीर काँपने लगा था। वह चाहकर भी आगे बोल नहीं पाया।
‘‘आप मेरे चलते पहले ही काफी कष्ट उठा चुके हैं। मुझे लगता है, जिस दुनिया के बारे में मैं कल्पना करती हूँ, वह आपके लायक नहीं। आप आरा लौट जाएं। मुझे अपने सपनों के साथ अपनी दुनिया में रहने दें, जीने दें। मैं अपने सपनों को छोड़ एक
पल भी नहीं जी पाऊँगी।’’
किसलय ने रूँधे गले से बहुत मायूस हो कहा, ‘‘तुम्हें एक बार सोचना चाहिए, तुम्हारे
लिए मैंने सब कुछ छोड़ दिया। मैंने तुम्हारी दुनिया को अपनी दुनिया बना लिया फिर उसका ये कैसा सिला दे रही हो?’’
‘‘आप जानते हैं, मैं दो साल के लिए जा रही। आप कितना इंतजार करेंगे मेरे लिए? और फिर मेरी जिन्दगी भी तो बस तीस साल की है।’’
‘‘क्या तुम इतनी जल्दी भूल गयी कि हम कल साथ में कैसे-कैसे सपने देख रहे थे? तुम्हें अपनी बाहों में भर मुझे ऐसा लगा था, जैसे सारा आकाश हमने कैद कर लिया हो। क्या तुम इतनी जल्दी भूल गयी कि…।’’ वह कुछ बोलते-बोलते रुक गया,
उसका दिमाग सुन्न हो रहा था, वाणी पर संयम और पकड़ जा चुकी थी, फिर भी दुबारा से कहा, ‘‘तुम्हें समझाना बहुत दुरूह है।’’
‘‘कभी-कभी ऐसा भी होता है, जब हम वक्त की आँधी से खुद को बचा नहीं
पाते। हमें संग-संग बहना पड़ता है। पर तूफान थमते ही पुन: शांति कायम हो जाती है। हम पर पुन: हमारा अधिकार हो जाता है। मुझे लगता है हम दोनों को आत्मनिरीक्षण करना चाहिए। संसार में सबके लिए ईश्वर ने अलग-अलग रोल निर्धारित किया है-
शायद मेरे लिए भी और आपके लिए भी, मैं चूल्हा-चौकी और पायल-चूड़ी में बँध नहीं सकती। प्लीज अगर हमने आपको कष्ट दिया हो या जाने-अनजाने आपकी जिंदगी को तोड़ा हो, तो हमे माफ कर दें।’’ उसने हाथ जोड़ लिया। किसलय ने उसके हाथों को खोल दिया और खींचकर अपने सीने से लगा लिया। वह रोते हुए उसे चूमता रहा और बोलता रहा, ‘‘मैं तुम्हारा इंतजार करूँगा मैं…।’’ पास ही में खड़ी रिचा शर्मा जाने कब से यह सब कुछ देख और सुन रही थीं। वह खुद को रोक नहीं पायी और आँचल से आँसू पोंछने लगी। उन्होंने आगे बढ़कर दोनों
के सिर पर हाथ फेरा, तो काव्या ने झुककर पाँव छू लिया। काव्या को ऐसा करते देख किसलय ने भी पाँव छू लिया। रिचा शर्मा ने सब कुछ जान काव्या को बहुत जल्द वापस भारत बुलाने का फैसला कर लिया था। उन्होंने स्पष्ट कर दिया कि कुछ ही दिन
बाद मैं तुम्हारी जगह किसी दूसरे को अफ्रीका भेज दूँगी। वह काव्या और किसलय को साथ-साथ रखना चाहती थी। ताकि ‘आश्रम’ और ‘मुस्कान’ दोनों के कार्य को
देखा जा सके। प्लेन के उड़ान भरने में कुछ ही देर बाकी थे, पर अभी तक तीनों की आँखों से आँसू छलक रहे थे, लेकिन यह खुशी के आँसू थे। देखते ही देखते काव्या प्लेन में सवार हुई और पलभर में आँखों से ओझल हो गयी।
***

समाप्त

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