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– राजीव कुमार

रात तो जैसे-तैसे करके गुजार ली उसने, कपड़े गीले और बिस्तर गीला। सीमा ने सुरेश से स्पष्ट शब्दों में कह दिया, “सुनिए जी, जब तक छत नहीं बनती, तबतक के लिए मैं मायके जा रही हूँ।’’
सुरेश आज चिंतित दिखा। पत्नी की स्पष्टता ने गहरे सोच में डाल दिया था। उसने अपनी जेब टटोली, संदूक खोला तो वह भी खाली। महाजन के पास गया तो खाली हाथ लौटा।
सीमा पैक कर चुके सामान को एक-एक करके आलमारी में रखने लगी, तो सुरेश ने कहा, ” छत की मरम्मत का कोई जुगाड़ नहीं हो पाया है, तुम मायके जाना क्यों निरस्त कर रही हो ?’’
सीमा ने सुरेश को घुरते हुए कहा, “बहुत जल्दी है हमको भगाने की? बारिश तो कुछ ही देर होगी, छत से पानी भी कुछ ही देर टपकेगा मगर …” उसने एक लंबी सांस ली, “मेरी भाभी मुझ पर दिन-रात बरसती रहेगी। बाढ़ में बह जाने से तो अच्छा है न कि थोड़ा सा भींग लिया जाए।’’
छत से पानी फिर टपकने लगा और भींगा बदन लिए सुरेश और सीमा प्रेम फुहार का आनन्द लेने में तल्लीन थे।

– बोकारो स्टील सिटी
झारखण्ड

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