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सुरेन्द्र कौर बग्गा

दशहरे पर 6 वर्षीय करन अपने मम्मी-पापा के साथ रावण- दहन देखने दशहरा मैदान आया हुआ था।
रावण को देखकर करन बड़ी मासूमियत से अपनी मम्मी से बोला – “मम्मी पिछले साल भी तो ‘रावण अंकल’ को जलाया था ना, फिर ये अंकल वापस कैसे आ गए ? और आज तो ये और भी बहुत बड़े और मोटे -ताजे दिखाई दे रहे हैं ।
बाल – सुलभ अंदाज में वह बोले चला जा रहा था – ” मम्मी जब मेरे दादाजी मरे थे, तब उन्हें भी तो जलाया था ना ? मैंने कितनी बार उन्हें बुलाया ,पर वो तो वापस आए ही नहीं फिर ये रावण हर साल जलने के बाद फिर से जिंदा कैसे हो जाता है ?
मम्मी सोच रही थी कि हम बच्चों को सिखाते हैं कि “दशहरा बुराइयों परअच्छाई की जीत है ” पर बुराईयां तो हर साल रावण के प्रतीक रूप में और भी विकराल रूप में बढ़ती ही जा रही है ।अच्छाई की जीत कहाँ हो रही है ?
अपने मासूम नन्हें के प्रश्न के जवाब में वह निरूत्तर थी ।

 

– 343 विष्णु पुरी एने.
इंदौर
मोबाइल – 9165176399

नोट : कलाकृति – आशीष आनन्द आर्य के द्वारा बनाया हुआ

One thought on “रावण का बढ़ता कद”
  1. हम सिर्फ प्रतीक को जलाते हैं,
    प्रतीत को बढ़ने के लिए छोड़ देते हैं!

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