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– अलका मित्तल

ग़ज़ल

इक उम्मीद ज़रूरी है उम्र को बिताने के लिए
जुगनू ही काफ़ी है अंधेरों को मिटाने के लिए

ख़ुशियों का तो दिल से कोई वास्ता ही नहीं
लब हँसे भी तो औरो को दिखाने के लिए।

जीवन भी होता है इक समन्दर की तरह
उतरना पड़ता है उसमें तह को पाने के लिए।

यादें चली आती हैं बिन बुलाये मेहमाँ जैसे
खुद को भूलना पड़ा ग़म को भुलाने के लिए।

आग में तपकर ही तो बनता है खरा सोना
इम्तिहाँ ज़रूरी है खुद को आज़माने के लिए।

सिला मिल न सका हमारी वफ़ाओं का कभी
ताउम्र लगा दी हमने वादे को निभाने के लिए

One thought on “वादे को निभाने के लिए”

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