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     – अपूर्व कुमार

 

अप्रतिम सौष्ठव-सौंदर्य से युक्त 24 वर्षीय गिरिधर बाबू की ललाट पर आज फिर चिंता की रेखाएं उभर आई। अंतिम बातचीत के दौर में वे आज फिर बहन का रिश्ता तय करने में असफल रहे। यद्यपि उनकी बहन एक सुंदर, स्नातक एवं गृह कार्य में दक्ष कन्या थी, फिर भी वे जहां भी उसके रिश्ते के लिए जाते, दहेज देने की असमर्थता से वे असफल लौट आते।

एक अदना सी नौकरी से इतनी राशि कहां बच सकी थी कि वे बहन के अच्छे रिश्ते के लिए भारी-भरकम दहेज दे सकें। अपने माता-पिता को खोने के बाद अपनी शिक्षा के साथ अपने छोटे भाई एवं बहन की अच्छी परवरिश में उन्होने कोई कसर नहीं छोड़ी थी। वे खुद इंटरमीडिएट पास करते हीं 8 वर्ष पूर्व सिंचाई विभाग में एक क्लर्क के पद पर आसीन हो गये थे। शायद इसी सहारे वे अपने भाई-बहन को स्नातक तक की शिक्षा दिलाने में सफल हो पाये थे।

छोटा भाई अब भी बेरोजगार है। माता-पिता की छाया नहीं रहने के कारण वे अब शीघ्र अपनी बहन की शादी किसी अच्छे कुल -खानदान में सुशील, नौकरी वाले लड़के से कर निश्चिंत हो जाना चाहते थे। लेकिन आज दसवीं बार दहेज का दानव उनकी बहन के रिश्ते की राह में खड़ा था। अब क्या करें, इसी उधेड़बुन में वे आकर सोफे पर बैठ सोंच रहे थे, तभी उनकी बहन चाय लेकर आई-

” भैया ! आपके लिए इतने अच्छे रिश्ते आ रहे हैं, कोई स्वीकार क्यों नहीं कर लेते ?”

” इतनी भी क्या जल्दी है ? पहले तुम्हें डोली में विदा तो कर दूं! मुझे कौन सा दहेज लेना है ! तेरे पसंद की किसी गुड़िया को तेरी भाभी बना दूंगा!”

इसी बीच अचानक गिरिधर बाबू  के मन में एक विचार ने जन्म लिया कि क्यों नहीं उस प्रस्तावित रिश्ते पर विचार किया जाए, जिसमें एक बिल्कुल सांवली और दुबली-पतली मगर शालीन लड़की से शादी करने के एवज में उसके  ऑफ़िसर पिता ने हर शर्त मानने की पेशकश  रखी थी। वैसे तो गिरिधर बाबू दहेज मुक्त विवाह के पक्ष में थे । बस हर एक लड़के की भांति उनकी भी इच्छा थी कि उनकी भावी जीवन संगिनी भी आत्मिक सौंदर्य के साथ शारीरिक रूप से भी समाज में ‘सुंदर’ भाववाचक संज्ञा से विभूषित हो। मन में अचानक आए विचार को साकार करने के लिए उन्होंने मन ही मन खुद से एक समझौता किया, जिसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती। उन्होंने अपनी पुरानी स्कूटर स्टार्ट की और तुरंत गजाधर बाबू के ऑफिस पहुंच गए।

“अचानक से कैसे आना हुआ गिरिधर?”

“सर! मैं मालती के साथ रिश्ता करने को तैयार हूं

गजाधर बाबू को अपने कानों पर विश्वास नहीं हुआ! उन्होंने सोचा, इसे तो दहेज की लालच है नहीं ! वैसे भी दर्जनों सुंदरियों और दहेज को ठुकरा कर, भला इतने हैंडसम गिरिधर ने उनकी सांवली बच्ची को क्यों स्वीकार किया, जिसे अयोग्य सांवले लड़के भी नहीं स्वीकार कर सके! वे इसी उधेड़बुन में थे,  तभी गिरिधर बाबू ने पुनः कहा-

“सर ! एक क्षण के लिए आप यह मान लें कि मुझपर भी दहेज का दानव हावी हो गया।”

” नहीं ! ऐसा मैं नहीं मानता ! मैं तुम्हें ही नहीं, तुम्हारे दहेज विरोधी और आदर्शवादी पिता स्वर्गीय बद्रिनाथ बाबू जज को भी जानता था, जिन्होंने अपनी जान इसलिए गंवाई की उन्होंने रिश्वत लेकर मंत्री के अपराधी बेटे के पक्ष में फैसला सुनाना स्वीकार नहीं किया। सच बताओ बेटे बात क्या है?”

ऐसा सुनते ही फफक पड़ा गिरिधर-

“सर आप तो जानते ही हैं, पैतृक संपत्ति के नाम पर मेरे पास मेरे पुरखों के आशीष और उनके दिए संस्कार के अलावे कुछ नहीं है। ”

गजाधर बाबू-“वही तो सबसे बड़ी दौलत है, बेटे !”

गिरिधर-“पर उस दौलत से मैं अपनी बहन का रिश्ता नहीं कर पा रहा।”

“मतलब !”

“मेरे पास दहेज देने को क्या, आज के समय के अनुसार बारात का स्वागत करने के लिए भी पैसे नहीं हैं। ”

” तो फिर क्या चाहते हो ? ”

” यूं समझ लीजिए सौदा !  परिस्थितिवश अपने सिद्धांतों से! अपनी बहन की खुशियों की खातिर।”

“खुल कर कहो ! मैं तुम्हारी भावनाओं की कद्र करता हूं!”

“आपकी बच्ची से मैं विवाह करने को तैयार हूं, वह भी बिना एक रुपए लिए ! लेकिन कुछ शर्तें हैं ।”

गजाधर बाबू आश्चर्यचकित रह गए । क्योंकि उनके ही कार्यालय के नवनियुक्त बेढब से आदेशपाल ने उनके विवाह के प्रस्ताव को दहेज का प्रलोभन देने के बावजूद भी ठुकरा दिया था। इसका कारण यह था कि उसे गोरी लड़की से शादी करनी थी । इसी के साथ गजाधर बाबू को यह आस ही नहीं थी कि कोई उनकी बच्ची को अपनाएगा। अब तो वह हर शर्त मानने को तैयार थे। वे तुरंत बोले-

“बोलो, तुम्हारी हर शर्त मंज़ूर है मुझे।”

गिरिधर-” मैं विवाह मंदिर में बिना किसी सामाजिक आडंबर के करूंगा।”

“मंजूर ! आगे बोलो।”

( कॉपीराइट  कलाकृति – सिद्धेश्वर )

 

“आप अपनी बच्ची को केवल उसके परिधान मात्र में विदा करेंगे।”

“धन्य हो तुम! आगे बोलो।”

“मैं विवाह अपनी बहन के विवाह के बाद करूंगा!”

“और कुछ!”

“हां, आपने जो दहेज में मुझे 10 लाख रुपये देने की पेशकश की थी। मुझे आपसे बहन की शादी के लिए दस लाख रुपए चाहिए। इस पैसे को मैं थोड़ा-थोड़ा कर चुका दुंगा।”

“नहीं बेटे ! उसे लौटाने की कोई जरूरत नहीं !”

“तो फिर मुझे भी आपकी बेटी से रिश्ते में कोई दिलचस्पी नहीं।”

-“नहीं बेटा ऐसा मत कहो । तुम मेरे आशा की अंतिम किरण हो। तुम जैसा कहोगे वैसा ही होगा !”

ऐसा कहते हुए गजाधर बाबू उनकी नैतिकता, बहन के प्रति प्रेम और त्याग की भावना देखकर अत्यन्त भावविह्वल हो गए। चूंकि वह स्वयं एक पुरुष होने के नाते एक पुरुष की भावना को समझते थे कि कुरूप से कुरूप पुरुष भी पत्नी के रूप में अप्सरा की ही चाह रखता है। गिरिधर जैसे योग्य और रूपवान के लिए अप्सरा को भी मात देते दर्जनों रिश्ते आ चुके थे, फिर भी उनसबों को उसने अपने बहन के भविष्य की खातिर मुस्कुराते हुए ठुकरा कर मालती को अपनाने को तैयार है। यह उसकी महानता है।

बस! सबकुछ ठीक वैसे ही हुआ जैसी गिरिधर ने योजना बनाई थी। उन्होने अपनी बहन से कह दिया कि वे मालती के प्रेम में है। वे शादी करेंगे तो उसी से अन्यथा वे आजीवन कंवारा रहेगा। और वे शादी भी उसकी डोली को कांधा देने के बाद ही करेगा। बहन के लाख समझाने पर भी गिरिधर बाबू नहीं माने तो उसकी बहन ने समझ लिया कि –

, “प्रेम अंधा होता है।”

सभी कार्यक्रम सुनियोजित ढंग से संपन्न हो गए।

बहन की शादी और गिरिधर बाबू तथा मालती की शादी के 30 वर्ष बीत चुके हैं। इसी बीच गिरिधर बाबू ने गजाधर बाबू के कर्ज को भी चुका दिये हैं। पढी-लिखी मालती अपने इकलौते बेटे को शहर का नामी वकील बना चुकी है।

आज गिरिधर बाबू और मालती ने अपने वकील बेटे का रिश्ता अनाथालय में पली-बढ़ी रजनी से तय कर दिया। गजाधर बाबू की बूढ़ी आंखें ख़ुशी के मारे एक बार फिर नम हैं। सबसे ज्यादा खुश हैं गिरिधर बाबू और मालती । उनके बीच जो आत्मिक रिश्ता पनप चुका है वह शारीरिक सौंदर्य का मोहताज नहीं है। वैसे भी बाल अब दोनों के सफेद हो चुके हैं। दोनों एक -दूसरे का पूरा ख्याल रखते हैं।

– हाजीपुर; वैशाली

 

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